देस-परदेस : ईरान-युद्ध और भारत का ‘डिप्लोमैटिक-कैलकुलेशन’

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 17-03-2026
Global Affairs: The Iran War and India’s ‘Diplomatic Calculation’
Global Affairs: The Iran War and India’s ‘Diplomatic Calculation’

 

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प्रमोद जोशी

पश्चिम एशिया की लड़ाई अब तीसरे हफ्ते में है. इसके साथ जुड़े भारत के गहरे हित नज़र आने लगे हैं. वहाँ रहने वाले एक करोड़ भारतीयों के अलावा ऊर्जा आवश्यकताओं, पूँजी निवेश और रक्षा-तकनीक से जुड़े मसलों के कारण भी हमारी दिलचस्पी इस इलाके में रही है और रहेगी.

हमारी विदेश-नीति, सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के अलावा सकल राष्ट्रीय हितों के लिहाज से निर्धारित होती है. यह गणित यानी ‘कैलकुलेशन’ है, जो दीर्घकालीन हितों पर आधारित होता है. 

इस गणित का सहारा सभी देश लेते हैं, और इसी गणित का परिणाम है कि जबर्दस्त ‘फायर वर्क्स’ के बीच से पेट्रोलियम और एलपीजी के कुछ टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हुए भारत आने में कामयाब हुए हैं. यही गणित हमें मुखर होने और कई बार खामोश रहने का सुझाव देता है.

हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को 30दिन के लिए निलंबित करने का निर्णय ऐसे ही गणित के तहत ही किया है. ट्रंप के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को आकार देने में तेल समृद्ध रूस के महत्त्व के प्रति वाशिंगटन की व्यावहारिक समझ व्यक्त होती है.

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खाड़ी देशों का महत्त्व

भारत का खाड़ी देशों के साथ लगभग 200अरब डॉलर का व्यापार है, ऊर्जा आपूर्ति के लिए हम इस क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर हैं. करीब एक करोड़ भारतीय इस इलाके में रोज़ी-रोटी हासिल कर रहे हैं. ये बातें हमारे लिए सर्वोपरि हैं.

स्वतंत्र भारत की विदेश-नीति की शुरुआत में ही अरबों को राजनीतिक समर्थन देना एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया गया था. मौजूदा संकट भी अंततः खत्म होगा, पर इस इलाके के साथ हमारी पारस्परिक निर्भरता लंबे समय तक जारी रहेगी.

केवल तेल या प्राकृतिक गैस का मसला ही नहीं है, अरब देश अगले बीस-तीस वर्षों की ‘पोस्ट पेट्रोलियम’ व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं, जिसमें भारत भी भागीदार है.

भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने बयानबाज़ी से खुद को अलग रखा है, ‘बैकरूम’ गतिविधियों से नहीं. बयानों का प्रचारात्मक महत्त्व होता है, जो जनमत को प्रभावित करते हैं. पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत ने कुछ सोचकर ही ईरान के प्रति अपनी हमदर्दी का साफ तौर पर इज़हार नहीं किया है.

यह दोहरा मापदंड अंतरराष्ट्रीय राजनय की खासियत है. भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की आलोचना नहीं की थी. इसके पहले 1979में अफगानिस्तान में  सोवियत सेना की कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र में भारत ने रूस की निंदा करने वाले प्रस्ताव पर मतदान नहीं किया.

उस समय सोवियत कार्रवाइयों की आलोचना करने में भारत की अनिच्छा ने इस्लामी जगत में उसकी साख को नुकसान पहुँचाया था. बावज़ूद इसके रूस के साथ जुड़े अपने हितों के कारण भारत ने उस जोखिम को उठाया.

हालाँकि चीन और रूस ने इस समय ईरान पर हमलों की आलोचना की है, पर व्यापक स्तर पर उनका रुख भी ‘कैलकुलेटेड’ और काफी दबा हुआ ही है. ज्यादातर देश लड़ाई की अंतिम परिणति का इंतज़ार कर रहे हैं.

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ब्रिक्स की पहल

ईरान ने भारत से अनुरोध किया है कि ब्रिक्स समूह की ओर से बयान जारी करने की पहल करे, जिसमें अमेरिका और इसराइल और इसराइल के हमलों की निंदा की जाए. इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है, इसलिए यह अनुरोध भारत से किया गया है. भारत क्या ऐसा करेगा?

ब्रिक्स समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (मूल पाँच देश) के साथ-साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल हैं. ऐसे में कोई भी वक्तव्य असमंजस पैदा करेगा.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, जहाँ अमेरिकी सैन्य अड्डे और कर्मी मौजूद हैं, ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों का निशाना बने हैं. इन तीनों देशों के ब्रिक्स समूह में होने के कारण भारत के सामने राजनयिक संबंधों में संतुलन बनाने की चुनौती है.

भारत का पक्ष

भारत ने अभी तक मौजूदा संघर्ष में किसी का पक्ष नहीं लिया है. पर सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव का साथ दिया है, जिसमें ईरान की तरफ से पड़ोसी देशों पर हो रहे हमलों की निंदा की गई है.इसके पहले प्रधानमंत्री ने उन अरब देशों के नेताओं से बात की थी, जिनपर ईरान ने हमले किए हैं. उन्होंने हमलों की निंदा की और ‘इस कठिन समय में’ भारतीय समुदाय की देखभाल करने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया.

गुरुवार रात को मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से भी बात की और ‘तनाव बढ़ने और नागरिकों की जान जाने के साथ-साथ नागरिक बुनियादी ढाँचे को हुए नुकसान पर गहरी चिंता’ व्यक्त की.

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संवाद का आग्रह

फोन कॉल के बाद एक्स पर एक पोस्ट में, मोदी ने कहा कि उन्होंने ‘संवाद और डिप्लोमेसी का आग्रह किया’ और ‘शांति और स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया’.इसके साथ ही विदेशमंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार की रात अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराग़ची से भी बात की. 28फरवरी को हमलों के शुरू होने के बाद से यह उनकी चौथी बातचीत थी.

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई के निधन के पाँच दिन बाद भारत की ओर से उन्हें औपचारिक तौर पर श्रद्धांजलि दी गई. इन बातों को देखते हुए सवाल किया जा रहा है कि क्या भारत ने ईरान से बात करने में देरी की है?

फोन कॉल के ईरानी विवरण के अनुसार, जयशंकर ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग विकसित करने के लिए भारत की तत्परता की घोषणा करते हुए, ‘क्षेत्र में स्थिरता और स्थायी सुरक्षा को मजबूत करने का रास्ता खोजने’ के महत्व पर भी जोर दिया, क्योंकि यह एक सामूहिक आवश्यकता है.

इसराइल-यात्रा

कुछ पर्यवेक्षकों ने लड़ाई शुरू होने के ठीक पहले पीएम मोदी की इसराइल-यात्रा को लेकर टीका-टिप्पणियाँ की हैं. उस यात्रा के ठीक पहले भारत में अरब देशों के विदेशमंत्रियों का सम्मेलन हुआ था. उस दौरान भारत के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ सदस्यों ने ईरान की यात्रा भी की.

लड़ाई शुरू होने के बाद भारत ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की सीधे निंदा नहीं की. नीतिगत अस्पष्टता आमतौर पर एकतरफा संबद्धता का इशारा करने की तुलना में राष्ट्रीय हितों की ओर संकेत करती है.

भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण रहे हैं, लेकिन भारत को ईरान के समर्थन से जुड़े जोखिमों का हिसाब भी रखना है. यह भी सही है कि हाल में ट्रंप के व्यवहार के कारण भारत को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता अभी तक हुआ नहीं हैं. 

हाल में पीएम मोदी ने भारत की यात्रा पर आए फिनलैंड के राष्ट्रपति से कहा कि ‘युद्ध से कुछ हल नहीं होता.’ प्रकारांतर से यह संदेश अमेरिका और इसराइल के लिए भी था.

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पश्चिम एशिया कॉरिडोर

हमारे राजनयिकों को इस बात का आभास था कि कुछ होने वाला है. यह भी साफ लग रहा था कि अरब देशों और इसराइल के बीच किसी किस्म की सहमति बन रही है. यह सहमति 2023में ही बन गई थी, शायद उसकी पेशबंदी में ही 7अक्तूबर को हमास का हमला हुआ था.

हमास का इसराइल पर किया गया आतंकी हमला भारत-पश्चिम एशिया कॉरिडोर के लिए भी बड़ा झटका था. इसे व्यापार गलियारे के रूप में विकसित करने के तरीकों पर चर्चा शुरू हो ही रही थी कि गज़ा-संकट ने उसे पीछे कर दिया. फिलहाल दुनिया के बड़े पूँजीपति यहाँ निवेश का जोखिम नहीं उठाएँगे.

इसका यह मतलब नहीं कि इस इलाके में शतरंज का खेल पूरी तरह खुल चुका है. खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह सदस्य भी अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं. विदेश-नीति संबंधी विवादों के कारण इन देशों के अमीरों या बादशाहों के बीच वर्षों से तनाव बना हुआ है, पर अब ईरान के युद्ध ने उनके बीच एक आम सहमति को जन्म दिया है.

इन देशों के बीच एक सामान्य मुद्रा और अरब प्रायद्वीप में रेलवे लाइन बिछाने की योजनाएँ दशकों से लटकी पड़ी हैं. इलाके के ज्यादातर देश अगले बीस-तीस वर्षों की आर्थिक-परिवर्तनों के बारे में विचार कर रहे हैं, जब पेट्रोलियम का कारोबार खत्म होने वाला होगा. सऊदी अरब ने अपना विज़न 2030घोषित भी कर रखा है.

अब क्या होगा?

खाड़ी देशों के लिए युद्ध में शामिल होना अस्वीकार्य जोखिम साबित हो रहा है. उन्होंने भी अपने गणित के आधार पर खुद को खतरे में डाला है, पर सवाल दूसरे भी हैं. क्या अमेरिका पीछे हटेगा? क्या डॉनल्ड ट्रंप को अमेरिका की आंतरिक राजनीति में समर्थन मिलेगा?

लड़ाई शुरू करना आसान है, खत्म करना मुश्किल है. खासकर तब जब युद्ध का कोई स्पष्ट उद्देश्य न हो. राष्ट्रपति ट्रंप लगातार विरोधाभासी बयान दे रहे हैं. अब जब अचानक किसी दिन कुछ हो जाएगा, तभी पता लगेगा कि मामला किस दिशा में जाने वाला है.

सवाल है कि ईरान की वर्तमान नेतृत्व-संरचना क्या कायम रहेगी? सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने युद्ध से पहले ईरानी राजव्यवस्था के साथ अपने कभी शत्रुतापूर्ण रहे संबंधों को सुधारने के लिए प्रयास किए थे.

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अरब अंतर्विरोध

कतर ने लंबे समय से ईरान के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाकर भी रखे हैं, फिर भी सभी पर ईरान ने हमले किए. अमेरिका के घोषित उद्देश्यों में एक ईरान में लोकतांत्रिक-व्यवस्था की स्थापना का है. खाड़ी देशों की राजशाही व्यवस्था से उसे शिकायत नहीं है.

इन देशों के भीतर भी जनमत बदल रहा है. मसलन बहरीन के शिया बहुसंख्यक समुदाय ने लंबे समय से सुन्नी शासकों के भेदभावपूर्ण व्यवहार की शिकायत की है. 2011में हुए जन प्रदर्शनों को बहरीन की पुलिस और अन्य खाड़ी देशों की सेनाओं ने दबा दिया था. ये शिकायतें खत्म नहीं हुई हैं. 

कारोबारी जगत में भी असंतोष है. दुबई के अरबपति कारोबारी खलफ अल-हबतूर ने सोशल मीडिया पर युद्ध की आलोचना करते हुए कुछ पोस्ट किए, जिनमें उन्होंने अमेरिका पर खाड़ी देशों को खतरे में डालने का आरोप लगाया. बाद में उन्हें डिलीट कर दिया.

उनके ये पोस्ट संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी और उसके व्यापारिक केंद्र दुबई के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को उजागर करते हैं. अबू धाबी आक्रामक विदेश नीति अपनाता है और ईरान को एक खतरा मानता है, जबकि दुबई तटस्थ रहना पसंद करता है.

ईरानी मनी लॉन्ड्रिंग और उसपर लगी अमेरिकी आर्थिक पाबंदियों को नजरअंदाज करने के कारण अक्सर अमेरिकी वित्त मंत्रालय उसकी आलोचना करता रहा है. ऐसी तमाम बातें, हालात की जटिलता को बयान कर रही हैं.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)

 

 

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