बेघरों के लिए उम्मीद बनकर उभरे कश्मीर के युवा

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 16-06-2026
Kashmir Youth Courage: Musadiq is transforming the lives of the destitute and the mentally ill.
Kashmir Youth Courage: Musadiq is transforming the lives of the destitute and the mentally ill.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

सड़क के किनारे फटे-पुराने कपड़ों में लिपटा, बेतरतीब दाढ़ी बढ़ाए और नंगे पैर एक आदमी बेतहाशा चिल्ला रहा था। उसके सिर पर न कोई छत थी, न कोई अपना। रफ्तार से भागती दुनिया के ज़्यादातर लोग उसे हमेशा की तरह एक 'पागल' या 'भिखारी' समझकर नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ रहे थे, लेकिन स्कूल से घर लौट रहा एक दस साल का मासूम बच्चा उस मंज़र को देखकर ठिठक गया। वह लड़का उस लाचार इंसान को भूल नहीं पाया। वह पल उस बच्चे के ज़हन में हमेशा-हमेशा के लिए एक ऐसी दर्दनाक तस्वीर बनकर दर्ज हो गया, जो यादों में बहुत गहराई तक उतर गई। उस बेसहारा आदमी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था, और दूसरी तरफ वह छोटा सा बच्चा जब अपने घर पहुँचा, तो वहाँ उसका इंतज़ार करता परिवार, साफ़-सुथरे कपड़े और गरमा-गरम खाना मौजूद था।

बरसों बाद, बचपन के उसी वाकये को याद करते हुए मुसादिक बशीर ने आवाज द वॉयस से बातचीत में बताया कि "एक रात जब मैं रात का खाना खाने बैठा, तो सड़क किनारे दिखे उस अधेड़ उम्र के आदमी के बारे में सोचता ही रह गया। उसके कपड़े फटे हुए थे और दाढ़ी बेतरतीब थी। उसे देखकर लगता था कि उसका कोई अपना नहीं है। वहीं दूसरी ओर, मेरे पास सब कुछ था — घर, खाना और परिवार। यह ख्याल मेरे मन से कभी नहीं निकला।" 

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बचपन की धुंधली तस्वीर जब बनी एक बड़ा मकसद

वक्त का चक्का घूमता रहा, साल बीत गए, लेकिन मुसादिक के दिल पर छपी वह तस्वीर धुंधली नहीं हुई। साल 2022 आया। पुलवामा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 22 साल के युवा मुसादिक को अब सड़कों पर अपने बचपन वाले उस लाचार आदमी जैसे कई और लोग दिखने लगे थे। ये वो लोग थे जो खामोश थे, बेतहाशा तकलीफ में थे और जिन्हें समाज की अनदेखी ने 'अदृश्य' बना दिया था। इस बार मुसादिक सिर्फ मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते थे। उन्होंने सड़कों पर घूमना शुरू किया, लेकिन इस बार उनका नज़रिया सिर्फ देखने का नहीं, बल्कि कुछ बड़ा करने का था।

मुसादिक ने अपनी इस बेचैनी को अपने दोस्तों के साथ साझा किया। जो बातचीत पहले सिर्फ चाय की टपरियों पर आम चर्चा जैसी थी, वह धीरे-धीरे एक बेहद संवेदनशील और साझा मकसद में तब्दील हो गई। इन युवाओं ने तय किया कि वे मानसिक रूप से बीमार, बेघर और समाज द्वारा दुत्कारे गए बेसहारा लोगों तक पहुँचेंगे। उन्हें सिर्फ खाना और साफ़ कपड़े ही नहीं देंगे, बल्कि प्यार-भरे दो बोल बोलेंगे और अगर मुमकिन हो सका, तो उनकी घर वापसी का ज़रिया बनेंगे।

'कश्मीर यूथ करेज' का जन्म और बढ़ता कारवां

जैसे-जैसे ये युवा सड़कों पर उतरते गए, हर मुलाकात के साथ कुछ कर गुज़रने की इनकी इच्छा और मज़बूत होती गई। आखिरकार, दोस्तों के इस छोटे से समूह ने अपनी फिक्र को धरातल पर उतारने का फैसला किया। वे रोज़मर्रा की ज़रूरतों का सामान, जैसे खाने-पीने की चीज़ें, साबुन और कंबल के पैकेट लेकर सड़कों पर निकलने लगे। शुरुआत में जिन बेघरों को दुनिया पर भरोसा नहीं था, धीरे-धीरे इन युवाओं के निस्वार्थ भाव को देखकर उनका भरोसा कायम होने लगा। दयालुता और अपनत्व के इन्हीं शुरुआती कदमों ने जन्म दिया एक बड़े आंदोलन को, जिसे नाम दिया गया 'कश्मीर यूथ करेज' (KYC)

मुसादिक बशीर ने आवाज द वॉयस से बातचीत में बताया की पहले हमने जमनीन कराई पर ली थे लेकिन बाद में हमने अपना खुद का शेल्टर होम बनाया जिसमें इन सभी जरूरतमंद लोगों के लिए साड़ी व्यवस्थाएं की गई हैं। लेकिन अभी हमें प्रोफेशनल टीम मेंबर्स की जरुरत है क्यूंकी जयादा लोग यहां मानसिक तोर पर बीमार हैं। 
 
शुरुआत में सिर्फ 21 सक्रिय और समर्पित सदस्यों की टीम के साथ शुरू हुई इस मुहिम ने देखते ही देखते पूरे कश्मीर में 45 से ज़्यादा लोगों की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया। इनमें से कुछ को उनके बरसों से बिछड़े परिवारों से मिलाया गया, तो कुछ को सालों की उपेक्षा और अंधेरे के बाद सुरक्षित आश्रय और मानवीय देखभाल दी गई। कुछ दोस्तों के बीच शुरू हुई यह अनौपचारिक कोशिश इतनी तेज़ी से आगे बढ़ी कि लोगों को इसके बारे में पता चलने लगा। लोग उन बेसहारा लोगों की बदलती हालत देख रहे थे और उन युवा स्वयंसेवकों के जज़्बे को भी, जो बिना किसी भेदभाव, जाति या फ़ैसले के हर किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ा रहे थे। देखते ही देखते, आज KYC का यह मानवीय नेटवर्क कश्मीर के हर ज़िले में फैल चुका है और इसमें 500 से 600 सदस्य शामिल हो चुके हैं। अपने वॉलिंटियर्स के इस जज़्बे पर गर्व करते हुए मुसादिक कहते हैं, "वे यह काम करने के लिए तैयार हैं। उन्हें लोगों की परवाह है।"
 
In less than two years, KYC has helped over 45 abandoned or mentally unwell individuals across Kashmir.
 
किराये की छत में पनपता अपनत्व और भरोसे की नींव

आज KYC संस्था किराये की एक बेहद साधारण सी जगह से अपना काम संचालित करती है। यह जगह इन बेघरों के लिए रहने का आशियाना भी है और एक कम्युनिटी सेंटर भी। किसी भी समय इस किराये के शेल्टर होम में लगभग 10 से 15 लोग रहते हैं, जिन्हें न सिर्फ भरपेट खाना और सुरक्षा मिलती है, बल्कि वह अपनत्व मिलता है जिसके लिए वे बरसों तरसे हैं। हर दिन, इन युवाओं की टोली सड़कों पर निकलती है और उन चेहरों को ढूंढती है जिन्हें इस समाज ने जीते जी भुला दिया है जैसे गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग, अपनों के द्वारा ही बेदर्दी से छोड़ दिए गए लोग, या फिर वे जो भटककर कहीं खो गए हैं।

इस पूरी मुहिम का सबसे मुश्किल और संवेदनशील हिस्सा है 'भरोसा जीतना'। KYC की टीम अच्छी तरह समझती है कि सड़कों पर रहने वाले इन लोगों ने सालों तक सिर्फ लोगों की नफ़रत, शक, गालियां और बुरा बर्ताव ही झेला है। इसलिए ये युवा उन पर कोई निर्देश नहीं थोपते, बल्कि सिर्फ उनके पास जाकर चुपचाप बैठ जाते हैं। मुसादिक इस जादुई बदलाव के बारे में बताते हैं, "बहुत से लोग गुस्से की उम्मीद करते हैं। लेकिन जब हम दयालुता दिखाते हैं, तो वे धीरे-धीरे हम पर भरोसा करने लगते हैं।"

संस्था के एक सक्रिय वॉलंटियर, यावर रशीद इस पूरी प्रक्रिया की संवेदनशीलता को समझाते हुए बताते हैं कि जब कोई परेशान परिवार उनसे संपर्क करता है, तो वे कैसे कदम बढ़ाते हैं: "हम व्यक्ति की हालत का अंदाज़ा लगाने के लिए एक फ़ोटो मांगते हैं। फिर हम धीरे-धीरे उनके पास जाने और उन्हें हमारे साथ आने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। इसमें समय और सब्र की ज़रूरत होती है।"

जब आईने में खुद को देख रो पड़ा डिप्रेशन में डूबा बिज़नेसमैन

सड़कों से इन लोगों को रेस्क्यू करना कभी आसान नहीं होता। कई बार वॉलंटियर्स को हिंसक विरोध और गहरे सदमे का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक झकझोर देने वाला मामला श्रीनगर के एक प्रतिष्ठित बिज़नेसमैन का था। उन्होंने नेपाल में एक व्यापार शुरू किया था, जिसमें उन्हें 20-30 लाख रुपये का भारी नुकसान हो गया। इस आर्थिक सदमे ने उन्हें गहरे डिप्रेशन (अवसाद) के दलदल में धकेल दिया। मानसिक संतुलन ऐसा बिगड़ा कि उन्होंने अपने हँसते-खेलते परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लिए और सड़कों पर कंगाली और अकेलेपन की ज़िंदगी जीने लगे।

मुसादिक उस रूह कंपा देने वाले रेस्क्यू को याद करते हुए कहते हैं, "जब हमें वे मिले, तो वे गुस्से में थे और डरे हुए थे। वे अपनी पत्नी के लिए चिल्ला रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि कोई उन्हें छुए या उनसे बात करे। लेकिन हम उनके साथ बने रहे।" वॉलंटियर्स ने उन पर कोई ज़बरदस्ती नहीं की। उन्हें थोड़ा समय और स्पेस दिया, फिर धीरे-धीरे मदद का हाथ बढ़ाया। उनके बाल काटे गए, उनकी दाढ़ी साफ़ की गई, उन्हें सुरक्षित ढंग से नहलाया गया और साफ़-सुथरे कपड़े पहनाए गए। इसके बाद जब उनके सामने एक आईना रखा गया, तो मुसादिक भावुक होकर याद करते हैं, "जब उन्होंने खुद को देखा, तो कुछ बदला। ऐसा लगा जैसे उन्हें याद आ गया हो कि किसी की परवाह किए जाने पर कैसा महसूस होता है।"

उलझन से लेकर जन-आंदोलन तक: समाज की बदलती सोच

शुरुआत में जब इन कम उम्र के लड़कों ने यह काम शुरू किया, तो समाज के लोग उलझन में पड़ गए। कुछ लोगों ने तीखे सवाल दागे कि आखिर ये युवा लड़के उन मामलों में क्यों टांग अड़ा रहे हैं जो उनकी ज़िम्मेदारी ही नहीं हैं? कुछ को इस बात पर भी शक था कि क्या मुट्ठी भर लड़कों के इस काम से समाज में कोई बड़ा बदलाव आ सकता है? लेकिन जैसे-जैसे एक-एक करके इंसानी जिंदगियां सुधरने लगीं, कहानियाँ आग की तरह फैलने लगीं। यह बदलाव सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि मोहल्लों, दुकानदारों, पड़ोसियों और आम परिवारों की रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गया।

इस बदलाव की गवाही देते हुए श्रीनगर के एक आम निवासी कहते हैं, "पहले हम बेघर लोगों को नज़रअंदाज़ कर देते थे। अब हम उन्हें ऐसे लोगों के तौर पर देखते हैं जिन्हें मदद की ज़रूरत है।" वहीं पुलवामा के एक स्थानीय दुकानदार भावुक होकर बताते हैं कि उन्होंने अपनी आँखों से इन युवाओं को बदलते देखा है, "वे सिर्फ़ बदलाव की बातें नहीं करते। वे असल में काम करते हैं।" वे अक्सर इन वॉलंटियर्स को बेघर लोगों के लिए अपनी जेब से नियमित रूप से खाना खरीदते देखते थे।

सोच में आया यही बदलाव इस संस्था की सबसे बड़ी जीत है। अब समाज इन्हें शक की निगाह से नहीं देखता। लोग खुद आगे बढ़कर कपड़े, खाना और राशन दान कर रहे हैं। दुकानदारों ने इन युवाओं के लिए सामानों पर छूट देनी शुरू कर दी है, और स्कूल-कॉलेज के छात्रों से लेकर नौकरीपेशा लोग तक अपना समय निकालकर वॉलंटियर बनने के लिए कतारों में खड़े हैं। जो शुरुआत एक छोटी सी मानवीय लहर से हुई थी, वह आज कश्मीर में एक जन-आंदोलन बन चुकी है।

खोई हुई इज़्ज़त और ज़िंदगी का दूसरा मौका

'कश्मीर यूथ करेज' का मकसद सिर्फ किसी को एक वक्त का खाना देकर अपने फर्ज से इतिश्री कर लेना नहीं है। उनका अंतिम लक्ष्य है इन भटके हुए लोगों की खोई हुई मानवीय इज़्ज़त (Dignity) को वापस दिलाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। संस्था की पहली प्राथमिकता होती है कि उन्हें उनके परिवारों से मिलाया जाए। लेकिन जो लोग किसी मानसिक आघात या सामाजिक परिस्थितियों के कारण घर नहीं लौट सकते या नहीं लौटना चाहते, KYC उन्हें न सिर्फ छत देती है, बल्कि जीने का एक नया मकसद भी देती है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अधेड़ उम्र के 'समीर' (बदला हुआ नाम), जो स्किज़ोफ्रेनिया (एक गंभीर मानसिक बीमारी) से पीड़ित हैं। जब बीमारी बढ़ी, तो उनके सगे परिवार ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। जब KYC की टीम को समीर सड़क किनारे मिले, तो वे बेहद डरे हुए और आक्रामक थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ये लड़के उनके साथ क्या करना चाहते हैं। लेकिन युवाओं ने हार नहीं मानी। बिना किसी दबाव के, सिर्फ प्यार, सब्र और अपनत्व की बदौलत धीरे-धीरे समीर का दिल जीत लिया गया। आज समीर न सिर्फ पूरी तरह सुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि वे इस संस्था के सबसे समर्पित और कर्मठ वॉलंटियर्स में से एक बन चुके हैं। समीर की आँखों में आज एक नई चमक है, वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, "फिर से किसी काम का महसूस होना अच्छा लगता है। उन्होंने मुझे ज़िंदगी का दूसरा मौका दिया।"

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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"अब नज़रें फेर लेना कोई विकल्प नहीं है"

मुसादिक बशीर का मानना है कि यह मानवीय दर्द और यह प्रयास किसी एक संगठन, ज़िले या राज्य तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वे चाहते हैं कि KYC के इस निस्वार्थ मॉडल को देश के कोने-कोने में अपनाया जाए, क्योंकि यह समस्या सिर्फ कश्मीर की नहीं है। वे कहते हैं, "यह सिर्फ़ एक जगह की बात नहीं है। हर जगह ऐसे लोग हैं जिन्हें उनके परिवारों ने छोड़ दिया है। अगर हम यहाँ मदद कर सकते हैं, तो दूसरे लोग दूसरी जगहों पर मदद कर सकते हैं।"

हालाँकि, इस नेक रास्ते पर कांटों की कमी नहीं है। आज भी यह संस्था बेहद सीमित संसाधनों के बीच जूझ रही है। उनके शेल्टर होम में जगह बहुत छोटी है, बेघरों की संख्या के हिसाब से मेडिकल सप्लाई और दवाइयां मिलना अक्सर एक बड़ी चुनौती बन जाता है। यह पूरी संस्था किसी सरकारी मदद पर नहीं, बल्कि आम जनता के छोटे-छोटे स्वैच्छिक योगदान और इन युवाओं की जेब से मिलने वाले पैसों पर टिकी है।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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पूरी दुनिया से अपील करते हुए मुसादिक कहते हैं, "छोटी-छोटी मदद भी काम आती है। लेकिन अगर आप पैसे नहीं दे सकते, तो अपना समय दें। इन लोगों के बारे में सोचें। अगर आप किसी को सड़क पर पड़ा हुआ देखें, तो उन्हें खाना दें। वे भी हमारी तरह इंसान हैं।"

आज की इस भागदौड़ भरी, स्वार्थी दुनिया में जहाँ किसी के दुख-दर्द को देखकर आँखें चुरा लेना और आगे बढ़ जाना सबसे आसान रास्ता माना जाता है, वहाँ 'कश्मीर यूथ करेज' के ये नौजवान रुकने, ठहरने, दर्द को महसूस करने और ज़िम्मेदारी उठाने का कड़ा रास्ता चुन रहे हैं। ये युवा साबित कर रहे हैं कि पुनर्वास का मतलब सिर्फ किसी के जिस्म को ढकना नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को सम्मान, इज़्ज़त और जीने की नई उम्मीद लौटाना है।

मुसादिक बशीर ने आवाज द वॉयस से बातचीत में बताया कि उन्हें अपने इस कार्य में लोकल सरकारी बॉडी का भी पूर्ण सहयोग प्राप्त है लेकिन वे चाहते हैं की भविष्य में इस योजना के विस्तार के लिए सरकार को भी अहम कदम उठाना होगा। सिर्फ सोशल मीडिया और क्राउड फंडिंग के जरिए हम ज्यादा लम्बे समय इस तरह से नहीं चल सकेंगें। मुसादिक के दिल से निकली एक अंतिम बात आज हम सभी के बंद दरवाज़ों को खटखटाती है: "अगर हम उन लोगों की मदद नहीं करेंगे जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है, तो फिर कौन करेगा?"