मदीना में मिला खलीफा उमर का प्राचीन शिलालेख, शुरुआती इस्लाम के खुले राज

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 13-06-2026
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आवाज द वाॅयस/ रियाद

सऊदी अरब के मदीना क्षेत्र में हुई एक हालिया खुदाई ने पूरी दुनिया के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को हैरान कर दिया है। मदीना के अल-महद गवर्नरेट में चल रहे एक बड़े सर्वेक्षण के दौरान रेत और चट्टानों के बीच से एक बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक शिलालेख मिला है। इस पत्थर पर प्राचीन अरबी लिपि में कुछ ऐसा उकेरा गया है जो सीधे इस्लाम के शुरुआती दौर और उसके सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक से जुड़ा है। इस प्राचीन शिलालेख पर इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर इब्न अल-खत्ताब का नाम साफ तौर पर लिखा हुआ मिला है।
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क्या लिखा है इस ऐतिहासिक पत्थर पर?

सऊदी हेरिटेज कमीशन के विशेषज्ञों के मुताबिक यह खोज ऐतिहासिक रूप से बहुत कीमती है। इस पत्थर पर जो लिखावट मिली है वह प्राचीन हिजाज़ी लिपि में है। हिजाज़ी लिपि शुरुआती इस्लामी काल में इस्तेमाल होने वाली सबसे पुरानी अरबी लिपियों में से एक मानी जाती है। पत्थर पर उकेरी गई इस तहरीर का हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है:

    "अल्लाह इस दुनिया और परलोक (आखिरत) में उमर इब्न अल-खत्ताब का संरक्षक है, और अल्लाह के सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। मुहम्मद ﷺ अल्लाह के पैगंबर हैं।"

यह पंक्तियां उस समय के समाज, आस्था और इस्लामी राज्य की मजबूत नींव को बहुत स्पष्ट रूप से बयां करती हैं। इतिहासकार इस खोज को इसलिए भी बड़ा मान रहे हैं क्योंकि यह पैगंबर मुहम्मद के सबसे करीबी साथियों में से एक और उनके शासनकाल के दस्तावेजी सबूत के रूप में सामने आई है। खलीफा उमर ने 634 से 644 ईस्वी तक मुस्लिम साम्राज्य का नेतृत्व किया था और उनके समय में ही इस्लामी साम्राज्य का सबसे तेजी से विस्तार हुआ था।

मदीना के अल-महद में पुरातात्विक खोजों का अंबार

सऊदी हेरिटेज कमीशन ने अपनी इस खोज को लेकर कई अहम आंकड़े भी जारी किए हैं। अल-महद के तीन प्रमुख इलाकों अल-सुवैरीकिया, अल-मुवैहिया और हधाह में बड़े पैमाने पर सर्वे अभियान चलाया गया था। इस अभियान के पहले और दूसरे चरण में कुल मिलाकर 1,774 नई पुरातात्विक खोजें दर्ज की गई हैं। इन खोजों ने इस पूरे इलाके की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।

सर्वेक्षण टीमों ने इस दौरान 173 ऐसे प्राचीन स्थलों का पता लगाया है जो अब तक दुनिया की नजरों से पूरी तरह छिपे हुए थे। इन अज्ञात जगहों पर प्राचीन सभ्यताओं के रहने और वहां से गुजरने के पुख्ता सबूत मिले हैं।
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सिर्फ शिलालेख नहीं, इतिहास का पूरा खजाना मिला

सऊदी अरब के रेगिस्तान में छिपे इस खजाने में केवल खलीफा उमर के नाम का शिलालेख ही अकेला नहीं है। हेरिटेज कमीशन की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार इस पूरी खुदाई और सर्वे में कई तरह की प्राचीन चीजें मिली हैं।चट्टानों पर उकेरी गई आकृतियों और प्राचीन कलाकृतियों में 1,259 रॉक आर्ट चित्र मिले हैं जो उस दौर के इंसानों की जीवनशैली और पशु-पक्षियों को दर्शाते हैं। इसके अलावा 461 इस्लामी शिलालेख मिले हैं जो शुरुआती अरबी लिखावट के विकास को समझने में मदद करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि यहां इस्लाम के आगमन से भी पुरानी थमुद भाषा के 34 शिलालेख मिले हैं।

इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कई संरचनाएं भी जमीन के नीचे से निकाली गई हैं। इनमें पत्थरों से बने 11 प्राचीन ढांचे, तीन ऐतिहासिक महल और उनके अवशेष, पुराने समय के व्यापारिक रास्तों पर दूरी मापने के लिए इस्तेमाल होने वाले कारवां मार्गों के दो मील के पत्थर और पानी की व्यवस्था को दर्शाने वाले चार कुएं शामिल हैं।

व्यापार और तीर्थयात्रा का सबसे बड़ा केंद्र

ऐतिहासिक रूप से मदीना प्रांत और विशेष रूप से अल-महद का यह इलाका प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क और शुरुआती इस्लामी तीर्थयात्रा मार्गों का एक मुख्य चौराहा हुआ करता था। सदियों से इस बेहद कठिन और रेतीले रास्तों से होकर बड़े-बड़े व्यापारियों के कारवां, बंजारे और यात्री गुजरा करते थे।

ये मुसाफिर लंबी यात्राओं के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज कराने, अपने ईश्वर से प्रार्थना करने या अपने पीछे आने वाले साथी यात्रियों के लिए संदेश छोड़ने के लिए इन चट्टानों पर नक्काशी कर दिया करते थे। इन Corridor या रास्तों पर इतनी बड़ी संख्या में शिलालेखों का मिलना यह साबित करता है कि यह पूरा क्षेत्र शुरुआती इस्लामी दुनिया में व्यापारिक और आध्यात्मिक दोनों ही रूपों से कितना सक्रिय और महत्वपूर्ण था।

 

सऊदी विज़न 2030 और विरासत का संरक्षण

सऊदी अरब इस समय अपने 'विज़न 2030' के तहत अपनी अर्थव्यवस्था और समाज को पूरी तरह बदल रहा है। इस विज़न का एक बहुत बड़ा हिस्सा देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को सहेजना और उसे दुनिया के सामने लाना भी है। हेरिटेज कमीशन का कहना है कि वे पूरे देश में इस तरह के पुरातात्विक सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण के कार्यक्रमों को लगातार जारी रखेंगे।

इन खोजों का केवल शैक्षणिक या ऐतिहासिक महत्व ही नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को यह भी याद दिलाती हैं कि उनका इतिहास केवल किताबों के पन्नों में बंद नहीं है, बल्कि उनके देश की मिट्टी और पत्थरों पर हमेशा के लिए उकेरा हुआ है। मदीना में मिली यह दुर्लभ लिखावट इस बात का सबसे बड़ा और ताजा प्रमाण है।