
साकिब सलीम
30 सितंबर 2026 को मध्य पूर्व के जॉर्डन के आसमान में एक ऐसा भयावह घटनाक्रम सामने आया, जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान 1073में कथित तौर पर ओमान के एक सह-पायलट ने विमान के कप्तान स्मित मच्छर पर हमला कर दिया। इसके बाद बोइंग 737मैक्स 8अचानक तेजी से नीचे जाने लगा। कुछ ही पलों में विमान हजारों फीट नीचे उतर गया। बाद में ड्यूटी से बाहर मौजूद पायलटों और कुछ साहसी यात्रियों ने कॉकपिट में प्रवेश कर कथित हमलावर को काबू किया। इसके बाद विमान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब के तबूक की ओर मोड़ दिया गया।
एक संभावित बड़े जनहानि वाले हादसे को टाल लिया गया। लेकिन इस घटना के दूरगामी प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। नागरिकों से भरे एक यात्री विमान को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश ने स्वाभाविक रूप से 11सितंबर 2001के हमलों की भयावह यादें ताजा कर दीं।
यह घटना केवल विमानन सुरक्षा पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि आतंकवाद जैसे कृत्य उन उद्देश्यों को भी कितना नुकसान पहुंचाते हैं, जिनके नाम पर उन्हें अंजाम देने का दावा किया जाता है।
अगर फ्लाईदुबई की उड़ान 1073को दुर्घटनाग्रस्त करने की कोशिश सफल हो जाती, तो इसके भू राजनीतिक प्रभाव बेहद गंभीर हो सकते थे। 9/11के हमलों ने उन दावों के मुताबिक, जिनके नाम पर उन्हें अंजाम दिया गया था, न तो उत्पीड़ित मुसलमानों को आजादी दिलाई और न ही उनके लिए न्याय सुनिश्चित किया।
इसके बजाय, इन हमलों के बाद वैश्विक स्तर पर ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ शुरू हुआ। कई मुस्लिम बहुल देशों में विनाशकारी सैन्य हस्तक्षेप हुए और दुनिया के कई हिस्सों में इस्लामोफोबिया की एक तीखी लहर देखने को मिली।
Israeli passengers tell of the horror onboard the Flydubai flight that was diverted after the pilot stabbed his co-pilot in the cockpit.
— Al Jazeera English (@AJEnglish) October 1, 2026
The plane dropped 17,000 feet during the fight from Dubai to Tel Aviv, but landed safely after being diverted to land in Saudi Arabia. pic.twitter.com/rXN4ZHbig0
दुनिया भर में निर्दोष मुसलमानों को संदेह, निगरानी और घृणा अपराधों का सामना करना पड़ा और यह सिलसिला कई जगहों पर आज भी जारी है। अगर 2026में एक और बड़ा सफल विमानन आतंकवादी हमला होता, तो इससे आधुनिक इस्लामोफोबिया को फिर बढ़ावा मिलने की आशंका पैदा हो सकती थी।
इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम समुदायों के प्रति अविश्वास बढ़ सकता था और मुस्लिम समुदायों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए राजनीतिक समर्थन भी मजबूत हो सकता था। इस समय इजरायल की नीतियों, सैन्य कार्रवाइयों और फिलिस्तीनी जनता की लंबे समय से जारी पीड़ा को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में गहरा आक्रोश है।
दुनिया भर में लाखों लोग इजरायली राज्य की कार्रवाइयों को अन्यायपूर्ण और मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस्लामोफोबिया को लेकर भी व्यापक सवाल उठे हैं और बड़ी संख्या में लोग इजरायल तथा जायनिज्म से जुड़े राजनीतिक विचारों और नीतियों पर सवाल कर रहे हैं।
लेकिन ऐसी एक घटना इस बदलते माहौल को उलटने की क्षमता रखती है। यह नैतिक आधार को कमजोर करने वाला कदम होगा। जिस तरह 9/11के हमलों ने मुस्लिम अधिकारों के लिए चलने वाली वैश्विक मुहिम को गंभीर नुकसान पहुंचाया था, उसी तरह फ्लाईदुबई की उड़ान 1073को नष्ट करने की कोशिश फिलिस्तीनी मुद्दे को किसी तरह मदद नहीं करती। इसके उलट, यह उन लोगों के तर्क को मजबूती दे सकती है जो इजरायली नीतियों के हर विरोध को स्वभावतः आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हमले का सटीक मकसद अभी पुष्ट नहीं हुआ है। फ्लाईदुबई ने कहा है कि विवाद के पीछे की वजह फिलहाल स्पष्ट नहीं है और मामले की औपचारिक जांच चल रही है।
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने इसे “जिहादी आतंकवादी हमले की कोशिश” बताया है। वहीं प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि इस स्तर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसमें ईरान की कोई भूमिका थी। फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में ईरान की संलिप्तता स्थापित करने वाला कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
यह सावधानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विमानन आतंकवाद के इतिहास में ऐसे हमलों के प्रभाव तत्काल पीड़ितों तक सीमित नहीं रहे हैं। इनके राजनीतिक और सामाजिक परिणाम अक्सर कहीं ज्यादा व्यापक रहे हैं।
इसके अलावा, इस तरह की घटनाओं को ‘जिहाद’ के नाम से परिभाषित करना इस्लामी धार्मिक अवधारणा का गंभीर विकृतिकरण है। इस्लामी परंपरा में ‘जिहाद’ का शाब्दिक अर्थ संघर्ष या प्रयास करना है।
इसमें व्यक्ति का अपने अहंकार और बुराइयों के खिलाफ आध्यात्मिक संघर्ष भी शामिल है। वहीं सशस्त्र संघर्ष के लिए इस्लामी परंपरा में ‘किताल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। आत्मरक्षा या अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की स्थिति में भी इस्लामी कानून युद्ध के संचालन पर कड़े नियम लागू करता है और गैर लड़ाकों को निशाना बनाने की अनुमति नहीं देता।
कुरआन मानव जीवन की पवित्रता को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। सूरह अल माइदा (5:32) में कहा गया है:
“जिसने किसी व्यक्ति की हत्या की, बिना इसके कि उसने किसी की हत्या की हो या धरती में فسادफैलाया हो, तो मानो उसने पूरी मानवता की हत्या कर दी। और जिसने किसी एक व्यक्ति की जान बचाई, तो मानो उसने पूरी मानवता की जान बचाई।”
इसी तरह युद्ध की स्थिति में भी कुरआन अति और आक्रामकता से रोकता है। सूरह अल बकरा (2:190) में कहा गया है:
“और अल्लाह की राह में उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, लेकिन ज्यादती न करो। निस्संदेह, अल्लाह ज्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।”
इस्लामी विद्वानों ने इस ‘ज्यादती’ की अवधारणा में गैर लड़ाकों को निशाना बनाने को शामिल किया है। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और युद्ध में शामिल नहीं लोगों की हत्या को इस्लामी युद्ध नैतिकता के खिलाफ माना गया है।
पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने भी गैर लड़ाकों की हत्या से सख्ती से मना किया। सुनन अबू दाऊद में उनसे संबंधित एक हदीस में बुजुर्ग, बच्चे और महिलाओं को न मारने की हिदायत का उल्लेख मिलता है।
इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र से भी युद्ध के दौरान नागरिकों को नुकसान न पहुंचाने से संबंधित निर्देश मंसूब हैं। इनमें नागरिकों को नुकसान न पहुंचाना, इबादतगाहों को नष्ट न करना और फलदार पेड़ों को न काटना जैसे निर्देश शामिल बताए जाते हैं।
ऐसे में नागरिक यात्रियों से भरे एक यात्री विमान को जानबूझकर दुर्घटनाग्रस्त करने की कोशिश उस ‘ज्यादती’ की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है, जिसकी कुरआन निंदा करता है। इसे जिहाद कहना इस्लामी सिद्धांतों के साथ न्याय नहीं करता। ऐसी कार्रवाई को इस्लामी कानूनी परंपरा में ‘हिराबा’ यानी सशस्त्र हिंसा, भय पैदा करने और गंभीर अपराध की श्रेणी से जोड़कर देखा जा सकता है।
🚨 One of the Israeli heroes from the flight meets Prime Minister Benjamin Netanyahu at Ben Gurion Airport after the rescue flight landed safely in Israel. https://t.co/tq5wJbI4eR pic.twitter.com/F133ng9NNO
— Raylan Givens (@JewishWarrior13) September 30, 2026
आधुनिक आतंकवाद की विचारधारा को खारिज करने में कई प्रमुख मुस्लिम विद्वानों और धार्मिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मॉरिटानिया के प्रमुख इस्लामी विद्वान और फोरम फॉर प्रमोटिंग पीस इन मुस्लिम सोसाइटीज के अध्यक्ष शेख अब्दुल्लाह बिन बय्याह ने आतंकवाद को जिहाद से अलग बताते हुए इसकी निंदा की है।
इसी तरह सुन्नी इस्लामी दुनिया के प्रमुख धार्मिक संस्थानों में से एक अल अजहर के ग्रैंड इमाम शेख अहमद अल तैयब ने भी नागरिकों पर हमलों की लगातार निंदा की है। उनका कहना रहा है कि राजनीतिक परिस्थितियां चाहे जो हों, निर्दोष लोगों को निशाना बनाना इस्लामी कानून के अनुरूप नहीं है।
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2010 में प्रमुख इस्लामी विद्वान मुहम्मद ताहिर उल कादरी ने आतंकवाद और आत्मघाती हमलों पर लगभग 600पन्नों का एक विस्तृत फतवा प्रकाशित किया था। इसमें उन्होंने पारंपरिक इस्लामी स्रोतों के आधार पर यह तर्क दिया कि जिहाद के नाम पर आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने आतंकवाद और निर्दोष लोगों की हत्या को इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ बताया।
फ्लाईदुबई की उड़ान 1073से जुड़ी घटना के पीछे अगर वास्तव में नागरिक विमान को नुकसान पहुंचाने की मंशा थी, तो इसकी निंदा केवल अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं, बल्कि इस्लामी नैतिक और कानूनी सिद्धांतों के संदर्भ में भी की जानी चाहिए।
सच्चे अर्थों में जिहाद का संबंध आत्मसंघर्ष, न्याय, साहस और कमजोरों की रक्षा से जोड़ा जाता है। निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाना इसका हिस्सा नहीं हो सकता। न्याय की मंजिल हासिल करने के लिए अपनाए जाने वाले रास्ते भी न्यायपूर्ण और नैतिक होने चाहिए।