तरुण नंदी / कोलकाता
आठवीं कक्षा में बंगाली, गणित और फिजिकल साइंस में फेल होने वाला कोई छात्र कुछ साल बाद पीएचडी की डिग्री हासिल करेगा, यह उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा। लेकिन दक्षिण दिनाजपुर के कुशमंडी इलाके के चकदह गांव के मिराजुल इस्लाम ने अपनी मेहनत से यह साबित किया कि शुरुआती असफलता किसी इंसान की पूरी जिंदगी तय नहीं करती। 8 सितंबर 2026 को उन्होंने अपना वाइवा पूरा किया और पीएचडी की डिग्री हासिल की।
मिराजुल इस्लाम का यह सफर किसी आसान रास्ते की कहानी नहीं है। किसान परिवार में जन्मे मिराजुल के सामने बचपन से ही आर्थिक परेशानियां थीं। परिवार में उच्च शिक्षा की कोई पुरानी परंपरा भी नहीं थी। पढ़ाई जारी रखना उनके लिए एक चुनौती थी।
इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव उस समय आया, जब आठवीं कक्षा में असफल होने के बाद उनकी मां ने उनसे कहा, “कम से कम माध्यमिक पास कर लो।” मां के ये शब्द मिराजुल के लिए हौसले का कारण बने।

आठवीं की असफलता बनी बदलाव की वजह
मिराजुल इस्लाम का जन्म 1995 में एक किसान परिवार में हुआ। उनके पिता लतीफुर रहमान की आमदनी सीमित थी। उनकी मां मसरूरा बीबी परिवार की आर्थिक मदद के लिए बत्तख और मुर्गियां पालती थीं। घर का खर्च चलाना आसान नहीं था। बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी परिवार के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी था।
ऐसे माहौल में जब मिराजुल आठवीं कक्षा में फेल हुए तो वह खुद भी काफी निराश हुए। बंगाली, गणित और फिजिकल साइंस में उनके अंक उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। पढ़ाई को लेकर उनका आत्मविश्वास भी प्रभावित हुआ। इसी दौर में मां की कही एक छोटी सी बात ने उन्हें फिर से कोशिश करने की ताकत दी।
उन्होंने मां की बात को चुनौती की तरह लिया। इसके बाद पढ़ाई के प्रति उनका नजरिया बदल गया। उन्होंने अपनी तैयारी शुरू की और धीरे धीरे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने पुराने किताबों से पढ़ाई की। कई बार पढ़ाई के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।
मिराजुल के लिए रोज करीब तीन किलोमीटर पैदल चलना सामान्य बात थी। ट्यूशन के लिए उन्हें करीब 20 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी। इसके लिए कभी साइकिल तो कभी बस का सहारा लेना पड़ा। रास्ते आसान नहीं थे। कई जगह सड़कें कीचड़ से भरी रहती थीं। फिर भी उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।

माध्यमिक से उच्च शिक्षा तक लगातार आगे बढ़े
आठवीं कक्षा की असफलता के बाद मिराजुल ने जिस तरह वापसी की, वह उनके शैक्षणिक सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उन्होंने माध्यमिक और हायर सेकेंडरी की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी से पास कीं। इसके बाद उन्होंने अलीया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उन्होंने बीएड की डिग्री भी हासिल की।
लेकिन उनकी पढ़ाई यहीं नहीं रुकी। आगे चलकर उन्होंने शोध का रास्ता चुना। परिवार में इससे पहले किसी ने उच्च शिक्षा हासिल नहीं की थी। इसलिए उच्च शिक्षा से जुड़ी कई प्रक्रियाएं उनके लिए नई थीं। उन्हें खुद यह समझना पड़ा कि आगे की पढ़ाई के अवसर कहां मिल सकते हैं। किन संस्थानों में आवेदन करना है और शोध के लिए किस तरह आगे बढ़ना है।आर्थिक कठिनाइयां भी उनके सामने बनी रहीं। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई और शोध जारी रखा। धीरे धीरे उनका अकादमिक सफर उन्हें पीएचडी तक ले गया।

काजी नजरुल इस्लाम की नज्म नहीं, गद्य बना शोध का विषय
मिराजुल इस्लाम के डॉक्टरेट शोध का विषय भी उनकी अलग रुचि को सामने लाता है। उनके शोध का विषय था, “काजी नजरुल इस्लाम: नसर निगार के रूप में एक सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन।”
काजी नजरुल इस्लाम को आम तौर पर कवि और गीतकार के रूप में जाना जाता है। लेकिन मिराजुल की दिलचस्पी उनकी गद्य रचनाओं में बढ़ी। उन्होंने नजरुल इस्लाम के लेखों, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, भाषणों और पत्रों का अध्ययन किया।
इन रचनाओं में समाज, संस्कृति, समानता और मानवता से जुड़े विचारों ने मिराजुल को प्रभावित किया। इसी रुचि ने उन्हें शोध की ओर आगे बढ़ाया। उन्होंने नजरुल इस्लाम के गद्य साहित्य को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समझने की कोशिश की।
यह शोध उनके लिए केवल अकादमिक काम नहीं था। इसके पीछे साहित्य को एक अलग नजरिए से समझने की कोशिश भी थी। एक ऐसे लेखक के गद्य को केंद्र में रखना, जिसे आम तौर पर कविता और संगीत के लिए अधिक याद किया जाता है, उनके शोध की खास बात रही।

चार साल का लक्ष्य, छह साल से ज्यादा का सफर
मिराजुल ने शुरुआत में अपनी पीएचडी की रिसर्च को चार साल में पूरा करने की योजना बनाई थी। लेकिन परिस्थितियां उनके अनुमान के मुताबिक नहीं रहीं। शोध पूरा होने में छह साल से अधिक समय लगा।
इस दौरान उन्हें प्रशासनिक स्तर पर भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, एक समय उनका शोध प्रबंध अस्वीकार भी कर दिया गया था। इसके बाद उन्हें आगे की प्रक्रिया में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कुलपति और रजिस्ट्रार के हस्तक्षेप के बाद इन समस्याओं का समाधान हुआ।
लंबे इंतजार और लगातार प्रयास के बाद आखिर वह दिन आया, जिसका मिराजुल को लंबे समय से इंतजार था। 8 सितंबर 2026 को उन्होंने अपना वाइवा पूरा किया और पीएचडी हासिल करने का सपना पूरा किया।
आठवीं कक्षा में असफल होने वाले छात्र से पीएचडी शोधकर्ता तक का यह सफर करीब एक दशक की पढ़ाई और संघर्ष से बना। इस दौरान आर्थिक समस्या, संसाधनों की कमी, लंबी यात्राएं और शोध से जुड़ी अड़चनें उनके सामने आती रहीं। लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ा।
अब दूसरे छात्रों की मदद कर रहे मिराजुल
मिराजुल इस्लाम की कहानी केवल उनकी अपनी शिक्षा तक सीमित नहीं है। पढ़ाई और शोध के साथ वह ऐसे छात्रों की मदद करने से भी जुड़े रहे हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर या सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं।
उनका अनुभव उन्हें यह समझने में मदद करता है कि कमजोर आर्थिक स्थिति में पढ़ने वाले छात्रों को किन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए वह जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा से जुड़े अवसरों और आगे की राह तलाशने में मदद कर रहे हैं।
मिराजुल की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी शुरुआत किसी बड़ी सफलता से नहीं हुई थी। वह आठवीं कक्षा में फेल हुए थे। उस समय शायद पीएचडी तक पहुंचने की कल्पना भी मुश्किल थी। लेकिन उन्होंने उस असफलता को अंतिम फैसला नहीं बनने दिया।
उनकी मां का एक छोटा सा वाक्य उनके लिए प्रेरणा बन गया। “कम से कम माध्यमिक पास कर लो।” इसी बात से शुरू हुई कोशिश आगे चलकर प्रथम श्रेणी, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, बीएड और फिर पीएचडी तक पहुंची।
दक्षिण दिनाजपुर के एक किसान परिवार से निकलकर पीएचडी हासिल करने वाले मिराजुल इस्लाम की कहानी शिक्षा, संघर्ष और लगातार प्रयास की कहानी है। यह कहानी यह भी दिखाती है कि किसी छात्र की शुरुआती परीक्षा का परिणाम उसके पूरे भविष्य की तस्वीर नहीं होता। आठवीं में मिली असफलता के बाद मिराजुल ने पढ़ाई जारी रखी और आखिरकार 8 सितंबर 2026 को डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर ली।
आज उनका लक्ष्य केवल अपनी शैक्षणिक उपलब्धि तक सीमित नहीं है। वह उन विद्यार्थियों के लिए भी रास्ता तलाशने में मदद कर रहे हैं, जिन्हें आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण उच्च शिक्षा तक पहुंचने में कठिनाई होती है। उनकी अपनी जिंदगी का अनुभव अब दूसरों के लिए मार्गदर्शन का आधार बन रहा है।