देस-परदेस : वैश्विक आर्थिक-प्रशासन को ब्रिक्स की चुनौती

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 08-09-2026
Domestic  Global: BRICS' Challenge to Global Economic Governance
Domestic Global: BRICS' Challenge to Global Economic Governance

 

प्रमोद जोशी

विश्व-व्यवस्था की बदलती तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है. दुनिया के देशों के तीन महत्त्वपूर्ण समूहों के इर्द-गिर्द चल रही गतिविधियों से इस बदलाव के संकेत मिल रहे हैं.हमारी दृष्टि में इन गतिविधियों में भारत की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है. खासतौर से ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका और भारत-चीन संबंध नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं.

ये तीन समूह हैं, जी7, जी20और ब्रिक्स. इनके मार्फत बड़े देशों के बीच ऊर्जा संसाधनों, टेक्नोलॉजी और वित्तीय प्रभाव के मद्देनज़र बढ़ती प्रतिस्पर्धा की झलक नज़र आ रही है. देखना होगा कि भारत को यह स्पर्धा कितना प्रभावित करेगी. 

इनमें जी7और ब्रिक्स दो ध्रुवों पर हैं और जी20बीच में है, जिसमें अमेरिका और चीन-रूस दोनों हैं. 12-13सितंबर को ब्रिक्स के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और इस साल जी20की अमेरिकी अध्यक्षता के साथ इन गतिविधियों की आहट सुनाई पड़ने लगी है.  

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ब्रिक्स की सफलता

हालाँकि पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले जी7का वित्त और उन्नत प्रौद्योगिकी में अभी तक दबदबा है, पर जनसंख्या, पीपीपी-आधारित आर्थिक शक्ति, विनिर्माण और बहुध्रुवीय विश्व का झंडा ब्रिक्स बुलंद कर रहा है.

ताज़ा खबर है कि विस्तारित ब्रिक्स ब्लॉक ने पर्चेज़िंग पावर पैरिटी के आधार पर जी7को आधिकारिक तौर पर पीछे छोड़ दिया है. जहाँ पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ मात्र 1%की धीमी वार्षिक दर से आगे बढ़ रही हैं, वहीं ब्रिक्स ब्लॉक 4%से अधिक की दर से तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग 40%और विश्व की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है.

एक समय तक ब्रिक्स को उभरते बाजारों के लिए अनौपचारिक चर्चा मंच के रूप में देखा गया था, पर अब वह पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के खिलाफ एक दुर्जेय, बहु-महाद्वीपीय प्रति-संतुलनकारी ताकत के रूप में खड़ा हो रहा है.

भारत की भूमिका

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हमें ग्लोबल साउथ में अपनी राजनयिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर प्रदान करेगा. बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक शासन में अस्थिरता के बीच, यह सम्मेलन ब्रिक्स देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नया रूप देने की अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का मौका भी देगा.

होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर जहाजों के आवागमन जैसे ज्वलंत मुद्दों के अलावा, इस वर्ष के शिखर सम्मेलन में भारत की प्राथमिकताओं से प्रेरित विषयों और मुख्य बिंदुओं पर भी चर्चा होगी.

सवाल यह भी है कि क्या ‘ग्रेटर ब्रिक्स’ पूरी ताकत के साथ इसमें शामिल होगा? अध्यक्षता संभालने के बाद से, भारत ने इस शिखर सम्मेलन को साल का अपना सबसे महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय राजनयिक कार्यक्रम माना है.

पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात में ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक का दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र सुचारू रूप से चल रहा है, और देश के राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में ‘ब्रिक्स डिविडेंड’ और ‘ब्रिक्स अपॉर्चुनिटीज़’ की चर्चाएँ जोर पकड़ रही हैं.

इस पृष्ठभूमि में, भारत सभी ब्रिक्स सदस्य और सहयोगी देशों के नेताओं को शिखर सम्मेलन में लाने का प्रयास कर रहा है, ताकि ग्लोबल साउथ में भारत की आयोजन क्षमता और नेतृत्व को उजागर किया जा सके.

ब्रिक्स का विस्तार

कई चरणों के विस्तार के बाद, ब्रिक्स 11पूर्ण सदस्यों तथा अन्य साझेदारों को मिलाकर 20या 21देशों का एक ‘ग्रेटर ब्रिक्स’ समूह बन गया है. इस समूह को और बड़ा करने के बाद इसे और मजबूत कैसे बनाया जाएगा, यह बहस का विषय है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इसे अमेरिका-विरोधी गठबंधन मानते हैं, फिर भी, इस धारणा ने ग्लोबल साउथ के देशों को ब्रिक्स की ओर आकर्षित होने से नहीं रोका है.इराक और मैडागास्कर के नेताओं ने, अन्य लोगों के साथ, ब्रिक्स के सदस्य बनने में रुचि दिखाई है. मलेशिया ने, जो पहले से ही पार्टनर सदस्य है, पूर्ण सदस्य बनने की इच्छा जताई है.

ब्रिक्स के पीछे मुख्य प्रेरक शक्ति चीन को माना जाता है. भारत, इसमें चीन का प्रति-संतुलनकारी देश है. जैसे-जैसे दोनों देशों के संबंध सामान्य हो रहे हैं, ब्रिक्स की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है.

इसका यह अर्थ नहीं है कि चीन के साथ भारत अपनी प्रतिस्पर्धा कम कर देगा. शिखर सम्मेलन की मेजबानी के मार्फत ग्लोबल साउथ पर उसका प्रभाव बढ़ेगा, जो चीन से प्रतिस्पर्धा है. 

सऊदी अरब का नाम हालाँकि सदस्य के रूप में दर्ज है, पर वह खुद को पूर्ण सदस्य नहीं कहता. संभवतः उसके शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस सम्मेलन में नहीं आएँगे. रूस और ईरान दोनों ही भू-राजनीतिक संघर्षों में उलझे हुए हैं. उनके राष्ट्रपतियों की उपस्थिति ध्यान खींचेगी.

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डीडॉलराइज़ेशन

अमेरिका के सामने सबसे बड़ा खतरा है, डॉलर की क्षीण होती प्रासंगिकता. वैश्विक लेन-देन में जिस दिन डॉलर का इस्तेमाल खत्म होगा, उसी दिन अमेरिका की आर्थिक पाबंदियों का असर कम हो जाएगा. 

राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को ‘डॉलर-मुक्ति’ के लिए दंडित करने की धमकी दी है. ऐसे में मेजबान के रूप में भारत किस तरह ब्रिक्स की बदलती वित्तीय संरचना में भूमिका निभाएगा, यह इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगी.

नवंबर 2024में, ट्रंप ने धमकी दी थी कि ब्रिक्स देश डॉलर से अलग होंगे, तो उन पर 100%टैरिफ लगाया जाएगा. पिछले साल रियो शिखर सम्मेलन के दौरान ‘अमेरिका विरोधी’ ब्रिक्स नीतियों का समर्थन करने वाले देशों पर 10%अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी गई. बहरहाल ये धमकियाँ अमल में नहीं आईं.

भुगतान प्रणाली

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए, अमेरिकी डॉलर, यूरो और जापानी येन जैसी कुछ प्रमुख मुद्राओं में भुगतान करने से देश उन देशों की मौद्रिक नीतियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं जो उन्हें जारी करते हैं.

रूस की अध्यक्षता में 2024की ब्रिक्स रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि वित्तीय प्रणाली का यह हिस्सा एक ही संस्था द्वारा एकाधिकार प्राप्त है, जिससे लेनदेन की लागत बढ़ जाती है.

इस प्रणाली के विकल्पों में यह कमी है कि उपयोगी होने से पहले उन्हें बड़ी संख्या में बैंकों और नियामकों को इसमें शामिल होने के लिए राजी करना होगा. रूस द्वारा ‘ब्रिक्स ब्रिज’ प्रणाली स्थापित करने के प्रस्ताव के बाद, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ब्रिक्स मुद्रा के निर्माण का आह्वान किया है.इस बीच, सदस्य देशों के राजनीतिक और शैक्षणिक हल्कों ने ब्रिक्स मौद्रिक कोष और अन्य पहलों के लिए प्रस्ताव रखे हैं.

यह सब होते हुए भी ब्रिक्स की भुगतान प्रणाली स्थापित करना आसान काम नहीं है, क्योंकि सदस्य देशों की नीतिगत प्राथमिकताएँ भिन्न-भिन्न हैं और इस समूह के पास न तो कोई स्थिर मुद्रा है और न आधिकारिक वित्तीय संस्थानों और सूचनाओं का समर्थन.

लेन-देन की व्यवस्था

एक देश से दूसरे देश में पैसा भेजने के लिए लेन-देन की एक शृंखला बनती है.  मान लीजिए, केप टाउन का एक आयातक चेन्नई के एक निर्यातक से कारें खरीद रहा है. भुगतान सीधे दक्षिण अफ्रीकी बैंक से भारतीय बैंक में नहीं जाता है. यह कई मध्यस्थ बैंकों के माध्यम से जाता है, जिनके एक-दूसरे के साथ खाते होते हैं.

चूँकि बहुत कम बैंक रुपये और रैंड दोनों मुद्राएं रखते हैं, इसलिए भुगतान में रैंड को डॉलर में और डॉलर को रुपये में परिवर्तित करना शामिल होता है, जहाँ मूल रूप से डॉलर एक वाहन मुद्रा के रूप में कार्य करता है, भले ही इस व्यापार में कोई अमेरिकी शामिल न हो.

यह विचार भी किया जा रहा है कि ऐसी भुगतान प्रणाली विकसित की जाए जिसमें राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियाँ सीधे एक-दूसरे से जुड़ जाएँ. ऐसा भारत और सिंगापुर ने किया है, जिसमें भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और सिंगापुर की पेनाउ प्रणाली को जोड़ा गया है.

स्विफ्ट प्रणाली

पैसों के अलावा, बैंकों के बीच निर्देश भी भेजे जाते हैं. इसका प्रबंधन स्विफ्ट (सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन) द्वारा किया जाता है, जो बेल्जियम स्थित एक सहकारी संस्था है. बेल्जियम के राष्ट्रीय बैंक के साथ-साथ जी10केंद्रीय बैंक, जिनमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी शामिल है, इसकी देखरेख करते हैं. 

इसका उपयोग 200से अधिक देशों में 11,000से अधिक संस्थान सीधे तौर पर करते हैं. छोटे बैंक स्विफ्ट नेटवर्क का हिस्सा रहे बड़े बैंकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ते हैं, यही कारण है कि यह इतना महत्वपूर्ण है और इसे हटाना मुश्किल है.

प्रत्येक मध्यस्थ शुल्क लेता है और मुद्राओं का दो बार रूपांतरण होता है (रैंड से डॉलर और डॉलर से रुपये में). इस प्रकार विदेशी मुद्रा मार्जिन दो बार चुकाया जाता है.

यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद 2022में कई रूसी बैंकों को स्विफ्ट से अलग कर दिया गया था. प्रतिबंधों का सामना कर रहे रूस ने एक वैकल्पिक प्रणाली के लिए सबसे अधिक दबाव डाला है, पर अन्य देश इसमें शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं.

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आईएमएफ का कोटा

ब्रिक्स का उद्देश्य 80वर्षों से अधिक समय से चली आ रही ब्रेटन वुड्स प्रणाली में सुधार के लिए दबाव डालना भी है, ताकि इसे अधिक समावेशी और न्यायसंगत बनाया जा सके.अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) में, उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है. दिसंबर 2023में समाप्त हुई 16वीं कोटा समीक्षा में केवल सभी देशों के कोटे में समान रूप से 50%की वृद्धि की गई थी, लेकिन उनके हिस्से में कोई बदलाव नहीं हुआ था.

इसी पृष्ठभूमि में, आईएमएफ के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने जून 2025तक एक नया कोटा फॉर्मूला और दृष्टिकोण विकसित करने का निर्देश दिया था, ताकि 17वीं समीक्षा के तहत कोटा सुधारों को सही मायने में लागू किया जा सके.

कोटे की सामान्य समीक्षा हर पाँच साल में की जाती है. चूंकि इसकी पिछली (16वीं) समीक्षा दिसंबर 2023में समाप्त हुई थी, इसलिए नियमानुसार 17वीं समीक्षा को जनवरी 2028तक पूरा किया जाना है.

ब्रिक्स देश इसमें अपने प्रयासों को तेज करेंगे और आईएमएफ से एक नया कोटा फॉर्मूला अपनाने का आग्रह करेंगे, जो विश्व भर में आर्थिक शक्ति के वितरण को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करे.

भारत, चीन और ब्राजील जैसे तेजी से बढ़ते उभरते बाजारों का तर्क है कि वर्तमान कोटा प्रणाली उनके वास्तविक आर्थिक वजन को नहीं दर्शाती है. आईएमएफ की 17वीं सामान्य कोटा समीक्षा की प्रक्रिया को 2028तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

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