Mohammed Hussamuddin: From practicing punches in a graveyard to the World Championships—the journey of an Arjuna Awardee.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
जिस शहर में एक मुक्केबाज के पास अभ्यास के लिए ढंग का मैदान तक न हो, वहां से अगर कोई खिलाड़ी विश्व चैंपियनशिप के पोडियम तक पहुंच जाए, तो यह सिर्फ खेल की कहानी नहीं होती, यह जिद और जुनून की कहानी होती है। तेलंगाना के निजामाबाद के मोहम्मद हुसामुद्दीन का सफर कुछ ऐसा ही है। कभी वह स्थानीय कब्रिस्तान में अभ्यास करते थे, क्योंकि उनके शहर में बॉक्सिंग के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं।
आज वही मुक्केबाज भारत के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया और 2023 के अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित हुए।
खिलाड़ी का परिचय
मोहम्मद हुसामुद्दीन का जन्म 12 अप्रैल 1994 को निजामाबाद, तेलंगाना में हुआ। वे 57 किलोग्राम वर्ग में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्षिणपंथी नहीं बल्कि साउथपॉ स्टांस वाले मुक्केबाज हैं। बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार वे छह भाइयों में सबसे छोटे हैं और उनके परिवार के कई सदस्य बॉक्सिंग से जुड़े रहे हैं। उ
नके पिता मोहम्मद शम्सुद्दीन खुद बॉक्सर रहे और बाद में कोच बने। हुसामुद्दीन का परिवार उनके लिए पहला बॉक्सिंग स्कूल था। उनके बड़े भाइयों ने भी इस खेल में नाम बनाया।
इस माहौल ने उन्हें खेल की बारीकियों को करीब से समझने का मौका दिया, लेकिन शुरुआत में खुद हुसामुद्दीन बॉक्सिंग ग्लव्स पहनने से डरते थे। उनके पिता ने इस डर को दूर किया और निजामाबाद के कलेक्टरेट मैदान में उन्हें बॉक्सिंग की शुरुआती ट्रेनिंग दी।
शुरुआती जीवन और संघर्ष
हुसामुद्दीन की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उनके पास शुरुआत से आधुनिक बॉक्सिंग सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। निजामाबाद में बॉक्सिंग के लिए उचित मैदान और संसाधनों की कमी थी।
उनके पिता ने खुद रिंग और जरूरी उपकरणों की व्यवस्था की और बच्चों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। कई बार हुसामुद्दीन को अभ्यास के लिए स्थानीय कब्रिस्तान तक का सहारा लेना पड़ा।
यही परिस्थितियां उनके संघर्ष की पहचान बन गईं। एक ओर सीमित सुविधाएं थीं, दूसरी ओर परिवार की उम्मीदें और खुद को साबित करने की इच्छा। शुरुआत में बॉक्सिंग से डरने वाला लड़का धीरे-धीरे रिंग में अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देने लगा।
हुसामुद्दीन ने कम उम्र में ही प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। 2009 जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता। इसके बाद सीनियर नेशनल स्तर पर अपने पदार्पण में ही स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का संकेत दे दिया।
खेल करियर की शुरुआत
हुसामुद्दीन की प्रतिभा पर चयनकर्ताओं की नजर जल्दी पड़ गई। वर्ष 2011 में उन्हें प्रशिक्षण और प्रतियोगिता के लिए क्यूबा के हवाना भेजा गया। इसके बाद उन्होंने फिनलैंड के Tammer Tournament और 2012 Youth World Championships जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनुभव हासिल किया।
हालांकि शुरुआती अंतरराष्ट्रीय दौर में उन्हें तुरंत बड़ी सफलता नहीं मिली। लेकिन उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी। वर्ष 2015 Military World Games में कांस्य पदक ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को नई दिशा दी। इसके बाद उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार दिखाई दिया और वे भारत के प्रमुख 57 किलोग्राम मुक्केबाजों में शामिल हो गए।
कॉमनवेल्थ से विश्व चैंपियनशिप तक
हुसामुद्दीन ने 2018 गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीता। उसी साल उन्होंने Chemistry Cup में स्वर्ण पदक भी हासिल किया। 2019 में Gee Bee Boxing Tournament में रजत पदक और 2021 Boxam International में भी रजत पदक उनके खाते में आया।
इसके बाद 2022 में उन्होंने बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में 57 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता। उसी वर्ष एशियाई चैंपियनशिप में भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया। इस लगातार प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय बॉक्सिंग टीम के भरोसेमंद खिलाड़ियों में स्थापित कर दिया।
विश्व चैंपियनशिप में ऐतिहासिक पदक
साल 2023 हुसामुद्दीन के करियर का बेहद महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। ताशकंद में आयोजित IBA Men's World Boxing Championships में उन्होंने 57 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक सुनिश्चित किया। क्वार्टर फाइनल में शानदार जीत के बाद वे सेमीफाइनल तक पहुंचे। लेकिन घुटने की चोट के कारण वे सेमीफाइनल मुकाबले में उतर नहीं सके और उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। इसके बावजूद विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बन गया। भारतीय पुरुष मुक्केबाजी में वे विश्व चैंपियनशिप पदक जीतने वाले चुनिंदा भारतीय मुक्केबाजों में शामिल हुए।
देश के लिए उपलब्धियां
मोहम्मद हुसामुद्दीन ने भारतीय बॉक्सिंग को कई बड़े मंचों पर गौरवान्वित किया। उनके नाम 2018 और 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स के कांस्य पदक, 2022 एशियन चैंपियनशिप का कांस्य और 2023 विश्व चैंपियनशिप का कांस्य पदक प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं।
इसके अलावा वे Chemistry Cup में स्वर्ण, Gee Bee Tournament और Boxam International में रजत जैसे अंतरराष्ट्रीय पदक भी जीत चुके हैं। उनकी उपलब्धियां केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं हैं। लंबे समय तक भारतीय टीम के 57 किलोग्राम वर्ग के प्रमुख मुक्केबाज बने रहना और बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में लगातार प्रदर्शन करना उनके करियर की निरंतरता को दर्शाता है।
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
हुसामुद्दीन के लिए 2023 सिर्फ विश्व चैंपियनशिप पदक का साल नहीं था, बल्कि उनके खेल जीवन को राष्ट्रीय सम्मान मिलने का भी साल था। भारत सरकार ने उन्हें 2023 के अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना। Boxing Federation of India की आधिकारिक सूची में भी मोहम्मद हुसामुद्दीन का नाम वर्ष 2023 के अर्जुन अवॉर्ड विजेताओं में दर्ज है।
9 जनवरी 2024 को उन्हें अर्जुन अवॉर्ड प्रदान किया गया। उनके लिए यह सम्मान वर्षों की मेहनत, संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों की राष्ट्रीय मान्यता थी। हुसामुद्दीन ने इस सम्मान को अपने लिए बड़ी प्रेरणा बताया था, खासकर इसलिए क्योंकि यह उनके पेरिस ओलंपिक क्वालिफिकेशन अभियान के समय आया था।
कब्रिस्तान से रिंग तक की सबसे प्रेरक कहानी
मोहम्मद हुसामुद्दीन की कहानी में शायद सबसे ज्यादा याद किया जाने वाला अध्याय उनका कब्रिस्तान में प्रशिक्षण है। निजामाबाद में पर्याप्त बॉक्सिंग सुविधाएं नहीं थीं। ऐसे में जिस जगह को आमतौर पर लोग अभ्यास के लिए सोच भी नहीं सकते, वहीं उन्होंने अपने सपनों को आकार दिया।
उनके पिता ने अपनी तरफ से रिंग और उपकरण जुटाए और बच्चों को प्रशिक्षण दिया। हुसामुद्दीन ने कठिन परिस्थितियों को बहाना बनाने के बजाय उन्हें अपनी यात्रा का हिस्सा बनाया। यही कारण है कि जब उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में पदक जीता, तो वह पदक केवल एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था; वह निजामाबाद की सीमित सुविधाओं के बीच पले एक सपने की जीत भी था।
पिता बने पहले कोच और सबसे बड़ा सहारा
हुसामुद्दीन के करियर में उनके पिता मोहम्मद शम्सुद्दीन की भूमिका बेहद अहम रही। खुद बॉक्सिंग से जुड़े रहे शम्सुद्दीन ने बेटे के डर को आत्मविश्वास में बदला। शुरुआत में ग्लव्स पहनने से डरने वाला हुसामुद्दीन आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिंग में भारत की चुनौती बन गया। यह परिवार उनके लिए सिर्फ भावनात्मक सहारा नहीं था, बल्कि बॉक्सिंग की पहली पाठशाला भी था। हुसामुद्दीन छह भाइयों में सबसे छोटे हैं और परिवार के कई सदस्य इस खेल से जुड़े रहे हैं।
आज मोहम्मद हुसामुद्दीन क्या कर रहे हैं?
मोहम्मद हुसामुद्दीन का अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग करियर 2024 तक जारी रहा। वे पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफिकेशन की कोशिशों में भी शामिल रहे, हालांकि 2024 में ओलंपिक क्वालिफायर में उनकी चुनौती समाप्त हो गई।
उपलब्ध हालिया रिकॉर्ड उन्हें अभी भी भारतीय प्रतिस्पर्धी बॉक्सिंग से जुड़े खिलाड़ी के रूप में दिखाते हैं। उनकी सबसे बड़ी इच्छा अपने गृह शहर निजामाबाद में बेहतर बॉक्सिंग सुविधाएं विकसित होते देखना रही है। उन्होंने 2018 से राज्य सरकार से बॉक्सिंग अकादमी के लिए जमीन उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही थी। उनका सपना है कि आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों को वे सुविधाओं की कमी न झेलनी पड़े, जो उन्होंने खुद अपने शुरुआती दिनों में झेली थीं।
हुसामुद्दीन की कहानी का संदेश
मोहम्मद हुसामुद्दीन का सफर बताता है कि किसी खिलाड़ी की शुरुआत भले ही कितनी साधारण जगह से हो, लेकिन उसके सपने छोटे नहीं होने चाहिए। निजामाबाद के सीमित संसाधनों से निकलकर कब्रिस्तान में अभ्यास करने वाला एक युवा मुक्केबाज जब विश्व चैंपियनशिप के पोडियम तक पहुंचता है और अर्जुन अवॉर्ड हासिल करता है, तो उसकी कहानी हजारों युवाओं को यह भरोसा देती है कि सुविधाओं की कमी मंजिल की गारंटी नहीं छीन सकती, अगर मेहनत और हौसला कायम हो।
मोहम्मद हुसामुद्दीन ने रिंग में सिर्फ मुक्के नहीं चलाए, उन्होंने हर उस धारणा को चुनौती दी कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े शहर और बड़ी सुविधाएं जरूरी हैं। उनका सफर निजामाबाद से शुरू हुआ, लेकिन उनकी पहचान भारतीय बॉक्सिंग के बड़े मंच तक पहुंची और यही उनकी कहानी को खास बनाता है।