चौथाई सदी के बाद

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 07-09-2026
After a quarter of a century
After a quarter of a century

 

 हरजिंदर

वह मौका था जब पूरी दुनिया ही हिल गई थी। अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को अलकायदा द्वारा किए गए हमलों ने सिर्फ दुनिया की राजनीति को ही नहीं बदला बल्कि लोगों की मानसिकता और उनके सोचने समझने के ढंग को भी बदल दिया था। खासकर अमेरिका में जहां मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने कई तरह के दबाव महसूस किए।

आज भी ये दबाव जारी हैं।आज जब इस वारदात के 25 साल पूरे हो रहे हैं तो उन बदलावांें पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। और वे हालात कहां तक पंहुच गए हैं यह देखना भी।बेशक इन वारदात के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हल्ला बोला।

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बरसों तक उसकी सेनाएं वहां तैनात रहीं लेकिन उसके बाद हार मानकर वैसे ही लौट आईं, जैसे कि इतिहास के एक बड़े हिस्से में समय-समय पर तमाम महाशक्तियों की सेनाएं काबुल से अपमानति होकर लौटती रही हैं।

अमेरिका ने अपनी सीमाओं के बाहर क्या किया इसके बजाए हम सिर्फ इस पर विचार करेंगे कि उसके भीतर समाज में क्या हुआ। 9/11 की वारदात ने खासकर वहां रहने वाले मुसलमानों के मन पर क्या असर डाला?

उस दौर के तमाम सर्वे और रिपोर्ट यह बताती हैं कि अमेरिका में मुसलमानों को लेकर शक और शुबहे बढ़े। उन्हें हिंसक माना जाने लगा। उन पर कईं हमले भी हुए। यहां तक कि वेशभूषा की वजह से कईं सिखों को भी मुसलमान मानकर उन्हें निशाना बनाया गया। हिंसा का शिकार बनने वाले इन सिखों में एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर भी थे।

ठीक यहीं पर हमें पिछले 25 साल में अमेेरिकी समाज में हुए एक और बदलाव पर नजर डालनी चाहिए। 2001 में अमेरिका के प्रतिनिधि सदन कांग्रेस में एक भी सदस्य मुसलमान नहीं था। इस समय वहां पांच मुसलमान चुन कर आ चुके हैं।

फिर हम न्यूयाॅर्क जैसे दुनिया के सबसे आधुनिक शहर में मेयर का ओहदा संभालने वाले जोहरान ममदानी को कैसे भूल सकते हैं। उन्हें वोट देने वालों में मुसलमानों से ज्यादा दूसरे समुदायों के लोग थे।

अमेरिका के लोग अगर अपने प्रतिनिधि के रूप में मुसलमानों को चुना रहे हैं तो क्या हम यह मान लें कि अमेरिकी समाज की धारणाएं बदल रही हैं़? क्या समाज ने मुसलमानों को अपने एक हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है?

आंकड़ें कुछ और ही कहानी कहते हैं।अमेरिका की प्रतिष्ठित शोध एजेंसी प्यू रिसर्च ने इस पर कईं सर्वे किए हैं। यहां एक बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि प्यू रिसर्च की स्थापना 2004 में हुई थी। यानी 2001 में या उसके तुरंत बाद का उसका कोई सर्वे उपलब्ध नहीं है।

लेकिन उसने हर थोड़े अंतराल में जो सर्वे किए हैं वे यह तो बताते ही हैं कि अमेरिकी समाज का रुझान किस तरह का है।मसलन, 2007 का उसका सर्वे यह बताता है कि 40 फीसदी मुसलमानों ने यह महसूस किया कि उनके साथ भेदभाव का बर्ताव हो रहा है। 2011 में यह संख्या बढ़कर 43 फीसदी हो गई और 2017 में 48 फीसदी। अब 2026 में यह आंकड़ा बढ़ता हुआ 59 फीसदी हो चुका है।

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इसके अलावा हम पुलिस में दर्ज मुसलमानों पर हुए हमलों को देखें तो 2001 में ऐसे मामलों की संख्या सबसे ज्यादा 450 से अधिक थी। उसके बाद से ये संख्या लगातार घटती बढ़ती रही है।
इन सारे आंकड़ों और तथ्यों से हम एक उलझन की स्थिति में पहंुच जाते हैं।

एक तरफ तो अमेरिकी मुसलमानों में असुरक्षा का भाव बढ़ा है तो दूसरी तरफ वहां के लोग योग्य मुसलमानों को अपना प्रतिनिधि चुनने में कोई गुरेज नहीं कर रहे। जहां उनका प्रतिनिधि चुना जाना एक उम्मीद देता है तो वहीं लगातार बढ़ता असुरक्षा भाव परेशान करने वाला भी है।यह ऐसा विरोधाभास है जिस आगे चलकर अमेरिकी समाज और वहां के मुसलमानों को ही सुलझाना होगा। 

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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