क्या AI बच्चों की सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है ?

Story by  अनिल निगम | Published by  [email protected] | Date 06-09-2026
Is AI affecting children's thinking ability?
Is AI affecting children's thinking ability?

 

hडॉ.अनिल कुमार निगम

आज एआई का युग है। एक छात्र गणित का सवाल हल करते-करते रुकता है और स्मार्टफोन पर AI से उत्तर पूछ लेता है। दूसरा छात्र निबंध लिखने के बजाय AI से पूरा निबंध तैयार करवा लेता है। तीसरा विज्ञान के सवाल का जवाब बिना जांचे सही मान लेता है। काम तीनों का पूरा हो गया, लेकिन सवाल यह है कि इसका छात्रों के जीवन पर क्‍या प्रभाव पड़ेगा? इससे उन्‍होंने क्या सीखा? क्‍या इससे बच्‍चों की सोचने,समझने और सीखने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा?

यही प्रश्‍न और चिंता अब भारत सहित पूरी दुनिया की शिक्षा व्यवस्था के समक्ष है। उल्‍लेखनीय है कि न्यूयॉर्क ने 2026-27सत्र के लिए 2-K से आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों द्वारा जनरेटिव AI के सीधे इस्तेमाल पर एक वर्ष का moratorium लगाया है। यह करीब छह लाख विद्यार्थियों को प्रभावित करता है। हाईस्कूल में AI पर पूर्ण रोक के बजाय उसके नियंत्रित और शिक्षक-निगरानी वाले इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

न्‍यूयॉर्क के इस निर्णय ने एक नई बहस को जन्‍म दिया है। सवाल यह भी है कि क्‍या एआई के प्रयोग पर रोक लगानी चाहिए? इसको इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए जहां पर आज स्‍मार्ट फोन अधिसंख्‍य बच्‍चों के पास है, क्‍या वहां पर इसे नियंत्रित या संयमित करना संभव है? हालांकि न्यूयॉर्क में लिए गए इस निर्णय को इस तरह से देखना चाहिए कि बच्चे को हर सवाल का तत्काल उत्तर नहीं, बल्कि सवाल से जूझने का अवसर भी चाहिए।

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भारत के सामने चुनौती है और बड़ी

भारत में AI के विस्तार के साथ स्मार्टफोन पहले ही बच्चों की दुनिया में गहराई से प्रवेश कर चुका है। ASER 2024के अनुसार ग्रामीण भारत में 14-16वर्ष के 94.3प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन इस्तेमाल करना जानते हैं और 96.7प्रतिशत बच्चों के घर में स्मार्टफोन उपलब्ध हैं। जबकि लगभग 35प्रतिशत बच्चों के पास खुद के स्मार्टफोन हैं।

स्मार्टफोन का उपयोग पढ़ाई के साथ मनोरंजन और सोशल मीडिया के लिए भी हो रहा है। इस आयु वर्ग में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले 90प्रतिशत से अधिक बच्चों ने पिछले सप्ताह सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया था।

नि:संदेह यह आंकड़े सीधे GenAI उपयोग के नहीं हैं, लेकिन वे एक महत्वपूर्ण वास्तविकता बताते हैं। कहने का आशय है कि बच्चे की जेब में वह उपकरण पहले से मौजूद है जिसके जरिए AI तक पहुंच कुछ सेकंड की दूरी पर है। इसलिए भारत में केवल यह कहना कि “बच्चों को AI से दूर रखो” व्यावहारिक समाधान नहीं है।

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सोचने की आदत का कमजोर होना

बच्चे की शिक्षा केवल सही उत्तर याद करने से नहीं होती। वह सवाल पूछने, बार-बार गलती करने, तर्क करने और समाधान खोजने से सीखता है। AI यदि हर बार सही उत्तर दे देगा तो बच्चा धीरे-धीरे समस्या हल करने के बजाय समस्या से बचने का रास्ता चुन सकता है।

यही “सोचने का काम तकनीक के हवाले कर देने” का खतरा है। यह मानसिक काम का बढ़ता हिस्सा मशीन को सौंप देना है। आज बच्चा AI से होमवर्क करवाएगा, कल प्रोजेक्‍ट और प्रेजेंटेंसन भी। परिणाम यह होगा कि उसके पास अंक तो होंगे, लेकिन स्वतंत्र सोचने की क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो जाएगी।

छोटी उम्र में कहानी लिखना, कविता बनाना, चित्र का विचार सोचना या अपने शब्दों में उत्तर देना केवल होमवर्क नहीं है। निरंतर अभ्यास भाषा, कल्पना और मौलिकता विकसित करता है। सोचिए, यदि हर कहानी AI लिखेगा और हर प्रस्तुति AI बनाएगा तो बच्चे की अपनी आवाज कहां बचेगी?

भारत जैसे बहुभाषी देश में यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण है। बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी और अपनी मातृ भाषा में स्वयं विचार व्यक्त करने का पर्याप्त अवसर मिलना जरूरी है।

गलत जानकारी का खतरा

AI हमेशा सही नहीं होता। वह गलत जानकारी को भी आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकता है। एक छोटे बच्चे के लिए यह पहचानना कठिन है कि स्क्रीन पर दिखाई दे रहा उत्तर तथ्य है या त्रुटि। इसलिए AI literacy का अर्थ केवल PROMT लिखना सिखाना नहीं है। बच्चे को यह भी सिखाना है कि AI के उत्तर पर सवाल कैसे उठाएं, स्रोत कैसे देखें और तथ्य की पुष्टि कैसे करें।

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AI-free नहीं, AI-wise शिक्षा

सही मायने में देखा जाए तो एआई के उपयोग के अपने अनेक लाभ भी हैं। ऐसे में एआई को पूरी तरह रोकना शायद न संभव है, न दीर्घकालिक रूप से उपयोगी। आज स्मार्टफोन है, कल AI-enabled earbuds, glasses और दूसरे उपकरण होंगे। तकनीक से बच्चों को हमेशा दूर रखना संभव नहीं होगा।

इसलिए भारत के सामने विकल्प AI-free education और AI-controlled education में से एक चुनने का नहीं है। बेहतर विकल्प है AI-wise education। बच्चों को यह सिखाना होगा कि एआई उनकी जगह सोचने के लिए नहीं है। वह उनके विचारों को चुनौती देने, विकल्प देने और सीखने में सहायता करने वाला उपकरण है।

भारत में इसके लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी है। पहला उम्र आधारित नियम, दूसरा, अभिभावक-शिक्षक निगरानी और तीसरा है अनिवार्य AI literacy। छोटी कक्षाओं में किताब, शिक्षक, खेल, बातचीत और हाथ से किए जाने वाले काम को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। किशोरावस्था में एआई की समझ और जिम्मेदार उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

आखिरकार शिक्षा का उद्देश्य केवल सही उत्तर प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य ऐसा व्यक्ति बनाना है जो सही प्रश्न पूछ सके, गलत उत्तर पहचान सके और कठिन परिस्थिति में स्वयं सोच सके। न्यूयॉर्क का फैसला इसी मूल प्रश्न को सामने लाता है।

भारत के लिए भी यह समय केवल यह पूछने का नहीं है कि “बच्चे एआई कब इस्तेमाल करें?” बल्कि यह पूछने का है कि हम ऐसी कौन-सी शिक्षा दें कि एआई बच्चे का दिमाग इस्तेमाल न करे, बल्कि बच्चा एआई का समझदारी से इस्तेमाल करे? यह पूरी तरह से सच है कि आने वाली दुनिया में एआई से परिचित होना जरूरी होगा, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी होगा-एआई के बावजूद अपने विवेक से सोचना।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार है।)