ढाई - चाल : अल्पसंख्यकों के लिए आर्थिक नीतियों पर बदलती सोच

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] • 1 Years ago
ढाई - चाल : अल्पसंख्यकों के लिए आर्थिक नीतियों पर बदलती सोच
ढाई - चाल : अल्पसंख्यकों के लिए आर्थिक नीतियों पर बदलती सोच

 

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फरवरी का पहला हफ्ता बजट के लिए होता है. इस दौरान पूरे संसद में पेश किए गए बजट पर ही पूरे देश में चर्चा होती है. इस बार हालांकि बजट से ज्यादा चर्चा अडानी घराने के कारोबार को मिल गई. इसके मुकाबले बजट पर चर्चा बहुत ही कम हुई. और इससे भी कम चर्चा हुई बजट में अल्पसंख्यकों के लिए किए जाने वाले प्रावधानों पर.

कुछ विपक्षी राजनीतिक दलों ने तो इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की, लेकिन आम अल्पसंख्यकों ने इसे लेकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. शायद इसलिए कि बजट जैसी चीजों से अब वे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं बांधते. हालांकि बजट में  अल्पसंख्यकों के लिए किए जाने वाले प्रावधानों में बहुत बड़ी कटौती की गई है.
 
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कटौती के ये आंकड़े अगले दिन ही जगह-जगह दिखने लगे थे. मसलन मदरसों और अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थानों पर होने वाले खर्च में 93 फीसदी तक की कटौती की गई. जबकि अल्पसंख्यक छात्रों के मिलने वाले वजीफों में 70 फीसदी की कटौती हुई. अल्पसंख्यक मंत्रालय का बजट भी कम हुआ. पिछले साल बजट में जो प्रावधान थे उनमें पूरा पैसा खर्च नहीं हुआ.
 
सरकार की अति-महत्वपूर्ण योजनाओं में जिन्हें बजट की भाषा में कोर आॅफ द कोर स्कीम्स कहा जाता है, एक योजना है अल्पसंख्यक विकास का अंबे्रला कार्यक्रम. पिछले साल के बजट में इस योजना के लिए 1810 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया था. लेकिन संशोधित अनुमान में बताया गया कि इनमें से सिर्फ 530 करोड़ रुपये ही खर्च होंगे. इस बार इस योजना के लिए सिर्फ 610 करोड़ का प्रावधान रखा गया है.
 
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इसके पीछे जो सोच है उसकी तरफ केंद्र के कुछ मंत्रियों और भाजपा के कुछ नेताओं ने समय-समय पर इशारा भी किया है. उनका कहना है कि सरकार की जो भी कल्याण योजनाएं हैं,  जैसे गरीबों के लिए मुफ्त अनाज योजना, उज्जवला योजना, आयुष योजना वगैरह, इनमें सभी के लिए समान अवसर हैं. इनका लाभ जितना बहुसंख्यकों को मिलता है उतना ही अल्पसंख्यकों को भी मिलेगा.
 
जाहिर है कि उन्हें एक मुख्यधारा का हिस्सा मान कर ही सरकार सबके साथ समान अवसर देना चाहती है. लेकिन ठीक यहीं पर एक दूसरी बात की ओर भी दिया जाना चाहिए कि रवैया अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए बनने वाली योजनाओं के बारे में नहीं अपनाया गया है. उनके लिए चलने वाली योजनाओं और कार्यक्रमों में पहले की तरह ही बढ़ोतरी जारी रखी गई है.
 
लेकिन ऐसा सिर्फ केंद्र सरकार के या भाजपा शासित राज्यों में ही नहीं हो रहा. अल्पसंख्यकों के लिए बजट प्रावधानों को पूरी तरह न खर्च करने के उदाहरण कईं अन्य राज्यों में भी हैं.संसद में केंद्रीय बजट पेश होने के अलगे ही दिन दो फरवरी को तेलंगाना राज्य का बजट पेश हुआ.
 
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वहां भी यही पाया गया कि बजट में अल्पसंख्यकों के लिए जितने धन का प्रावधान था उसे पूरा नहीं खर्च किया गया और अगले साल के कुछ प्रावधान में भी कटौती की गई.कभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है. पिछले आठ साल में बजट की सोच अब उससे काफी बदल चुकी है और अल्पसंख्यक भी इसे धीरे-धीरे स्वीकार करने लगे हैं. 
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )