देस-परदेस : भारत-पाकिस्तान रिश्ते सुधरते क्यों नहीं?

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 12-05-2026
prDes-Pardes: Why Aren't India-Pakistan Relations Improving?
prDes-Pardes: Why Aren't India-Pakistan Relations Improving?

 

प्रमोद जोशी

दो साल पहले सितंबर 2024में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च और सी-वोटर के एक सर्वे के परिणामों की घोषणा की, जिसमें भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों से राय ली गई थी. उसमें एक सवाल था कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते क्या सुधर सकते हैं?

सर्वे में 60प्रतिशत से अधिक भारतीयों और करीब 50प्रतिशत पाकिस्तानियों ने माना कि इस दशक में तो कम से कम नहीं सुधरेंगे. कुछ ने कहा, कभी नहीं सुधरेंगे.सर्वे 2022में हुआ था, उसके परिणाम 2024में जारी किए गए थे. विषय था,'बदलती दुनिया में दक्षिण एशिया: विभाजन के 75साल बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के नागरिक क्या सोचते हैं?'

ff

बातचीत ठप्प

सोशल मीडिया पर एक प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली, ‘पाकिस्तान और भारत कभी दोस्त नहीं हो सकते. यह दुश्मनी उन लोगों के लिए फायदे का सौदा है, जिनका धंधा इसी दुश्मनी से चलता है.’‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वर्षगाँठ के मौके पर अब यह सवाल मन में आता है कि ऐसी क्या बात है, जो टकराव को इस शिद्दत तक ले आई है? पाकिस्तान हमें ‘अज़ली दुश्मन’ क्यों मानता है?

पिछले दस साल से दोनों के बीच कोई उच्च-स्तरीय वार्ता नहीं हुई है. 2019के बाद से दोनों देशों के उच्चायोग बगैर हाई कमिश्नर चल रहे हैं. कारोबारी रिश्ते नहीं के बराबर हैं. ट्रेन बंद, बस बंद और हवाई सेवा भी बंद. सिंधु जल-संधि रद्द कर है. डिप्लोमेसी का लेवल ज़ीरो है.

बेशक अच्छे पड़ोसी बनना दोनों देशों के हित में है, पर रिश्तों को एकतरफा तरीके से बेहतर बनाना संभव नहीं है. पाकिस्तान के मीडिया ही नहीं, पाठ्य-पुस्तकों में भी भारत से जुड़े तमाम गलत तथ्य लिखे जाते हैं.

आर्थिक बदहाली

बेशक वहाँ, तस्वीर के दूसरे पहलू को देखने वाले भी हैं. दिसंबर 2016में पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष क़मर जावेद बाजवा ने अपनी सेना के जवानों को स्टीवन आई विल्किंसन की किताब ‘आर्मी एंड नेशन: द मिलिट्री एंड इंडियन डेमोक्रेसी सिंस इंडिपेंडेंस’ पढ़ने का सुझाव दिया था.

उन्होंने कहा, यह समझने की ज़रूरत है कि भारत ने किस तरह से राजनीति को अपनी सेना से दूर रखा है. इसके बाद मार्च 2021में उन्होंने इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग में उन्होंने कहा, अब अतीत को भुला कर आगे बढ़ने का समय आ गया है.

रक्षा विश्लेषक डॉक्टर आयशा सिद्दीका का कहना था, सेना प्रमुख की पेशकश के पीछे आर्थिक कारक है. अगर शांति बहाली की प्रक्रिया शुरू नहीं होती है और स्थिरता बहाल नहीं हुई, तो हम सड़क पर आ जाएँगे.उन्हीं दिनों पाकिस्तानी सेना का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र निकल कर आया कि आर्थिक-सुरक्षा ही वास्तविक-सुरक्षा है. इन बातों को पाँच बरस हो गए हैं. तल्ख़ी घटने के बजाय, बढ़ती ही गई है.

fff

सेना की भूमिका

पाकिस्तान में विदेश-नीति, खासतौर से भारत से जुड़े मुद्दों पर सेना का ही नियंत्रण है. प्रशासनिक-व्यवस्था पर शुरू से ही सेना हावी है. जनरल बाजवा के बाद जनरल आसिम मुनीर वहाँ के सेनाध्यक्ष बने, जो पिछले साल देश के पहले फील्ड मार्शल भी बन गए हैं.

पिछले साल पहलगाम की घटना के ठीक पहले एक सम्मेलन में आसाम मुनीर ने कहा, ‘हमारे धर्म अलग हैं, हमारे रीति-रिवाज अलग हैं, हमारी परंपराएं अलग हैं, हमारे विचार अलग हैं, हमारी महत्वाकांक्षाएं अलग हैं.’

दो कौमी नज़रिए की बात कहते हुए वे भूल गए कि बलोचिस्तान में वे मुसलमानों के खिलाफ ही लड़ाई चला रहे हैं. पाकिस्तान ‘सिक्योरिटी स्टेट’ है. वहाँ सेना की केंद्रीय-भूमिका है. मान लिया गया है कि उसके अस्तित्व को भारत से खतरा है. इस वजह से पूरे देश को सैनिक-मोर्चे में तब्दील कर दिया गया है.

उधर भारत की पाकिस्तान-नीति का केंद्रीय सूत्र है: आतंक और बातचीत साथ नहीं चल सकते. दक्षिण एशिया का सहयोग संगठन ‘सार्क’ ठप्प पड़ा है, जिसका खामियाजा सभी पड़ोसी देशों को भुगतना पड़ रहा है.

1965 की लड़ाई

हालाँकि असहमतियाँ 1947से ही हैं, पर 1965की लड़ाई से पहले दोनों देशों के बीच लोगों का आना-जाना आज की तुलना में बहुत आसान था. कई मामलों में बिना कड़े वीज़ा नियमों के लोग सीमा पार करते थे.आज ऐसा संभव नहीं है. ऐसा क्यों हुआ? वह सौहार्द खत्म कैसे हो गया? इस सवाल के जवाब के लिए हमें 1965की लड़ाई और उसके पीछे की योजनाओं का अध्ययन करना होगा.

1962की लड़ाई ने भारतीय मनोबल को गिरा दिया था. उसके एक साल बाद ही पाकिस्तान ने कश्मीर की 5,189किमी जमीन चीन को सौंप दी. इस जमीन से होकर चीन के शिनजियांग स्वायत्त क्षेत्र के काशगर शहर से लेकर पाकिस्तान के एबटाबाद तक एक सड़क बनाई गई, जिसे कराकोरम राजमार्ग कहा जाता है.

पाकिस्तान ने कश्मीर के मामले में चीन को तीसरी पार्टी बना दिया. इसीलिए 2019में चीन ने 370के मसले को सुरक्षा परिषद में उठाने की कोशिश की थी.

ff

सांस्कृतिक-संबंध

इतनी राजनीतिक-कड़वाहट के बावज़ूद दोनों देशों के लोगों के बीच जबर्दस्त सांस्कृतिक-संबंध हैं. दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच नागरिकों को वीज़ा देने की प्रक्रियाएँ कठोर होती चली गई है.यह प्रक्रिया आसान कर दी जाए, तो यकीनन जबर्दस्त आवागमन शुरू हो जाएगा. दोनों देशों के लोगों की नज़दीकी रिश्तेदारियाँ हैं, पर चाह कर भी उनका आना-जाना संभव नहीं हो पा रहा है.

भारत की महिलाएँ यूट्यूब पर पाकिस्तानी सीरियलों को बड़े चाव से देखती हैं, पाकिस्तानी सलवार-सूट उन्हें पसंद हैं, वहीं पाकिस्तानी महिलाओं को भारतीय परिधान भाते हैं. हालाँकि भारत से कॉज़्मेटिक्स मँगाने पर आधिकारिक रोक है, पर लाहौर के अनारकली बाज़ार में भारत की चीज़ें खुलेआम बिकती हैं.

दुबई के मार्फत भारतीय सामग्री पाकिस्तान पहुँचती है और ऊँची कीमत पर बिकती है. रोक हट जाए, तो न जाने क्या हो? भारत में बनी जेनरिक दवाओं की पाकिस्तान में भारी माँग है.

दुल्हन का लहँगा

इस साल जनवरी में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के बेटे जुनैद सफदर की शादी में दुल्हन शांज़े अली रोहेल ने भारतीय डिजाइनर सब्यसाची का हरा लहँगा और तरुण तहलियानी की साड़ी पहनी थी.

इसे लेकर वहाँ शोर भी मचा, पर सच यह है कि पाकिस्तानी शादियों में बॉलीवुड की फिल्मों के गीतों पर लोग नाचते हैं. पाकिस्तान में भारत से नफरत करने वालों का एक तबका है, तो पसंद करने वाले भी हैं. यह पसंद शुद्ध सांस्कृतिक है.

2023 में पाकिस्तान के ट्रैवल वी-लॉगर अबरार हसन ने मोटरसाइकिल से भारत का दौरा किया. उनके दौरे की शुरुआत दक्षिण भारत से हुई और वाघा सीमा पर खत्म हुई. उनके वीडियो देखने भर से पता लग जाता है कि दोनों देश के लोगों के मन में कितनी गहरी सदाशयता है.

खानपान, सिनेमा, साहित्य, संगीत, कला और खेल, खासतौर से क्रिकेट ऑर हॉकी दोनों देशों को जोड़ते हैं. दोनों देशों का कोई भी मैच मीडिया के लिए जबर्दस्त खुशखबरी लेकर आता है. हाल के वर्षों में भारतीय अस्पतालों में पाकिस्तान से आए मरीज़ों की तादाद में काफी इज़ाफा हुआ था. भारत आए पाकिस्तानी भारतीय डॉक्टरों को दुआएँ देते जाते थे. फिलहाल यह भी रुका हुआ है.

ddd

तब टकराव क्यों?

जुड़ाव के इतने कारण मौज़ूद हैं, तब टकराव क्यों? पिछले तीन दशक का अनुभव है कि जैसे ही दोनों के रिश्तों में सुधार की संभावनाएँ बनती हैं, कड़वाहट घोलने वाली कोई घटना हो जाती है. यह सिर्फ संयोग नहीं है. कोई है इसके पीछे.

पाकिस्तान की आंतरिक-राजनीति 1947 में हुए विभाजन को सही साबित करने के फेर में ऐसी किसी संभावना को पनपने नहीं देती, जिससे दोनों देशों की जनता को एक-दूसरे के करीब आने का मौका मिले. आज वे मोदी सरकार पर दोषारोपण करते हैं, पर 2014 के पहले भी हालात ऐसे ही थे.

रिश्ते तभी सुधरेंगे, जब पाकिस्तान की ओर से पहल होगी. 2013 में चुनाव जीतने के बाद नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय पत्रकारों से कहा था कि अपने तीसरे कार्यकाल में भारत से रिश्ते सुधारना उनकी प्राथमिकता होगी.

2014 में जब भारत में जब नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीता तो उनके विचार भी ऐसे ही लगे और उन्होंने तुरंत नवाज़ शरीफ को दिल्ली आने का न्यौता दिया था. यह पहला मौक़ा था जब कोई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत के किसी प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुआ था.

25दिसंबर, 2015को पीएम मोदी की लाहौर-यात्रा के बाद, जो रिश्ते बनते-सँवरते लग रहे थे, वे एक हफ्ते बाद 2जनवरी, 2016को पठानकोट पर हुए हमले के बाद टूटते चले गए.

राजनयिक रिश्ते

नवाज़ शरीफ के फैसलों में सेना का अड़ंगा लगता था. चूँकि 2024में शहबाज़ शरीफ के नेतृत्व में आई नई सरकार को सेना का समर्थन भी हासिल है, इसलिए लगा कि सरकारी विसंगतियाँ कम होंगी. उम्मीद थी कि पहला काम राजनयिक-स्तर पर होगा, पर ऐसा हुआ नहीं. 

अगस्त 2019में अनुच्छेद 370को निष्प्रभावी करने के भारतीय फैसले के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को तोड़ लिया और दिल्ली स्थित अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लिया. जब तक इन दोनों फैसलों को वापस नहीं लिया जाएगा, तब तक रिश्तों को सुधारने की बात कैसे होगी? 

2024में एक उम्मीद जागी थी, जब फरवरी में साद अहमद वाराइच ने नई दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग में नए उप-उच्चायुक्त (चार्ज डी अफेयर) का कार्यभार संभाला. यह नियुक्ति तीन साल के लिए हुई थी. उसके पहले तक उच्चायोग के प्रभारी एजाज़ खान अस्थायी नियुक्ति पर थे.

वाराइच, काफी वरिष्ठ राजनयिक हैं. माना जा रहा था कि उन्हें ही उच्चायुक्त घोषित किया जा सकता है. इस तरह कम से कम राजनयिक स्तर पर संपर्क बेहतर हो जाएगा.हो सकता है कि किसी स्तर पर ऐसा विचार रहा हो, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. उसके एक साल बाद ही, अप्रेल 2025में पहलगाम की घटना हो गई.

dd

उल्टा चोर…

पाकिस्तान ने पहलगाम की जिम्मेदारी नहीं ली, बल्कि उल्टा भारत पर इल्ज़ाम लगाया. मुंबई हमले से लेकर पुलवामा और पहलगाम तक की घटनाओं को स्वीकार करने के बजाय पाकिस्तान, उनका दोष भारत पर मढ़ता रहा है.

उसने लश्कर-ए-तैयबा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की, जिसे 2008के मुंबई हमलों समेत भारत में कई हमलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है. इस संगठन को अब जमात-उत-दावा के नाम से जाना जाता है.

पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने पिछले महीने कहा कि ऐसी खबरें हैं कि भारत किसी झूठी घटना (फॉल्ज़ फ्लैग ऑपरेशन) को बहाना बनाकर पाकिस्तान पर हमला करने वाला है. ऐसा हुआ, तो हम कोलकाता तक जाकर मार करेंगे. इस किस्म की बातें वहाँ के नेता अक्सर कहते रहते हैं.

अगस्त 2024में बांग्लादेश में हुए सत्ता-परिवर्तन के बाद पाकिस्तान का हौसला बढ़ा. फिर पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और खासतौर से आसिम मुनीर को वाइट हाउस में दिए गए लंच ने उसके हौसलों को और बढ़ाया.

भारतीय रणनीति

पाकिस्तान के रिश्ते काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेंगे कि आने वाले समय में दोनों देशों की आर्थिक-हैसियत कैसी होगी. इस मामले में दोनों का कोई मुकाबला नहीं है, पर पाकिस्तानी ‘डीप स्टेट’ में कोई समूह किसी भी कीमत पर भारत से टकराव जारी रखना चाहता है. रणनीति है कि भारत की पीठ पर घाव लगाते जाओ.  

2016के बाद से भारत ने भी पाकिस्तान से किसी प्रकार का संबंध न रखने और उसे वैश्विक-मंच पर अलग-थलग करने की रणनीति को अपनाया है. पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन का पल्लू पकड़ कर नए तरीके अपनाए हैं, पर उसकी आर्थिक-बदहाली बढ़ती जा रही है.

वैश्विक-ताकतें अपने हितों के मद्देनज़र पाकिस्तान की अनदेखी करती हैं. इससे उसके हौसले बढ़ते हैं. यह बात 1948के बाद कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में देखी जा सकती है. 

दिसंबर 2025में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने चीन के सहयोग से दक्षिण एशिया में एक नए क्षेत्रीय गुट के गठन की संभावना का संकेत दिया. यह संकेत पाकिस्तान की उस दीर्घकालिक नीति को दर्शाता है, जिसके तहत वह चाहता है कि भारत के सामने सुरक्षा-चुनौतियाँ खड़ी रहें. 

f

ALSO READ अमीरात के हटने से ‘ओपेक’ में दरार का अंदेशा