देस-परदेस : पश्चिम एशिया को ‘भँवर’ से निकालना मुश्किल होगा

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 03-03-2026
Country-Pardes: It will be difficult to pull West Asia out of the 'whirlpool'
Country-Pardes: It will be difficult to pull West Asia out of the 'whirlpool'

 

dप्रमोद जोशी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करके, जो लंबा दाँव खेला है, उसके कारण पश्चिम एशिया का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नज़र आने लगा है.उनका यह ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' नए क्षेत्रीय संघर्षों को भी जन्म दे सकता है, जिनमें अमेरिका फँसा तो उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता को संबोधित करते हुए, कहा देश की सत्ता पर ‘आपको कब्ज़ा करना होगा. यह संभवतः पीढ़ियों के लिए आपको मिला एकमात्र मौका है.’

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य एक वैचारिक प्रणाली है, जिसमें बहुस्तरीय अभिजात वर्ग और समर्थन का आधार है. हो सकता है कि हाल के वर्षों में यह समर्थन कम हुआ हो, पर वह सत्ता बनाए रखने की ताकत रखता है. बमबारी से पस्त और घायल होने के बावज़ूद यह धार्मिक व्यवस्था खड़ी रहेगी.

इस आक्रमण के बाद जहाँ पूरा यूरोप, अमेरिका और इसराइल के साथ खड़ा नज़र आ रहा है, वहीं रूस और चीन ने आयतुल्ला खामनेई की हत्या की निंदा की है. चीन ने इसे 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के ख़िलाफ़' बताया और कहा कि हम इसका सख़्त विरोध और कड़ी निंदा करते हैं.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी खामनेई की मौत पर संवेदना व्यक्त की है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से पुतिन ने कहा, अली खामनेई और उनके परिवार के लोगों की मौत 'मानवीय नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के खिलाफ़ एक हत्या' है.

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भारतीय नज़रिया

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार रात सुरक्षा पर कैबिनेट समिति की बैठक की अध्यक्षता की. इसके पहले देश के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को ही खाड़ी क्षेत्र के हालात पर चिंता जताते हुए एक बयान जारी किया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार देर रात इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से फ़ोन पर बात की और मौजूदा स्थिति पर चर्चा की. उन्होंने ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि मैंने हाल के घटनाक्रम पर भारत की चिंता ज़ाहिर की और कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. उन्होंने इस बात को भी दोहराया कि जल्द से जल्द संघर्ष रोकना ज़रूरी है.

इससे पहले प्रधानमंत्री ने रविवार रात संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाह्यान से भी बात की. उन्होंने यूएई पर हुए हमलों की निंदा की है और यूएई में रह रहे भारतीय समुदाय का ख्याल रखने के लिए शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाह्यान के धन्यवाद दिया.

पश्चिम एशियाई में रहने वाले करीब नब्बे लाख भारतीयों के हितों की रक्षा के अलावा भी देश की डिप्लोमेसी के सामने कई तरह की चुनौतियाँ हैं. ईरान और अरब देशों के अलावा हमारे इसराइल के साथ भी विशेष संबंध हैं. ऐसे में हमारा नज़रिया आत्यंतिक या एकतरफा नहीं हो सकता. अलबत्ता हम इस इलाके में जल्द से जल्द शांति की अपेक्षा कर सकते हैं.

ईरान में रेजीम चेंज

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल है कि क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन किया जा सकेगा, जिसका दावा डॉनल्ड ट्रंप कर रहे हैं. ऐसा नहीं हो पाया, तब और हो गया तब भी अनिश्चय के बादल छँटने में समय लगेगा.इस इलाके में लड़ाई होने का मतलब है, पेट्रोलियम आपूर्ति में व्यवधान. ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले टैंकरों को रोकने की घोषणा कर दी है. इससे तेल की कीमतें 100डॉलर या उससे ऊपर तक जा सकती हैं.

इसराइली सूत्रों के अनुसार हमले की तारीख पर दो हफ्ते पहले ही सहमति बन गई थी. इसका फैसला दो हफ्ते पहले नेतन्याहू की वाशिंगटन यात्रा के दौरान कर लिया गया था.

ट्रंप को उम्मीद है कि बड़ी संख्या में ईरानी धार्मिक सत्ता को समाप्त कर देंगे. यह अभियान है, एकाकी हमला नहीं कि किया और रोक दिया. कोई अंतिम तिथि निर्धारित नहीं की गई है, इसलिए किसी निर्णायक परिस्थिति का इंतज़ार करना होगा.

हालाँकि इस इलाके में ईरान पहले से ‘काँटे’ की तरह चुभ रहा था, पर 7अक्तूबर 2023की हमास की कार्रवाई के बाद वह पूरी तरह निशाने पर आ गया. यह वह वक्त था, जब अरब देशों का इसराइल के साथ कोई महत्त्वपूर्ण समझौता होने जा रहा था. उस समझौते में हमास के हमले ने पलीता लगा दिया. इसके पीछे ईरान का हाथ दिखाई पड़ रहा था.

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अरब देशों की भूमिका

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) यानी अरब देश, इस वक्त बजाय अमेरिकी हमले की निंदा करने के ईरान की निंदा कर रहे हैं. जीसीसी के सदस्य देशों की रविवार को हुई बैठक में इन देशों पर हुए ईरानी हमलों से हुए नुक़सान पर चर्चा की गई.

जीसीसी में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, क़तर और कुवैत शामिल हैं. इस अर्थ में, इसराइल अकेला नहीं है. उसके साथ न केवल अमेरिका है, बल्कि बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात सहित उनके कई अरब पड़ोसी भी हैं.दूसरी तरफ संभवतः खाड़ी देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान पर किसी भी हमले में सीधे भाग नहीं लेंगे. अलबत्ता अमेरिकी सेंट्रल कमांड साझेदारों के रूप में वे संभवतः तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं.

तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ

आयतुल्ला अली खामनेई की हत्या के बाद बुनियादी तौर पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ हैं. पहली प्रतिक्रिया अमेरिकी दादागीरी को लेकर है. हाल में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ कर ले जाने के बाद से वैश्विक स्तर पर पहले से ही अमेरिका की थू-थू हो रही है.

अब इस हत्याकांड ने उस आलोचना को और ऊँचे धरातल पर पहुँचा दिया है. एक संप्रभु देश के सुप्रीम नेता की ऐसे खुलेआम हत्या मंज़ूर नहीं है. यह प्रतिक्रिया निष्पक्ष रूप से सोचने वाले लोगों की है, जो विश्व-व्यवस्था के समर्थक हैं.

ट्रंप ने ईरान को ‘वैश्विक खतरा’ भी बताया था. यदि वह वैश्विक खतरा है, तो उस पर हमले का प्रस्ताव संरा सुरक्षा परिषद से पास होना चाहिए. बेशक ईरान का इस्लामी शासन उनका शत्रु है, लेकिन उसे भी आत्मरक्षा का अधिकार है.

दूसरी प्रतिक्रिया दुनिया भर के मुसलमानों की है, जिनमें ज्यादा बड़ी संख्या शिया मुसलमानों की है, जो ईरान के सर्वोच्च नेता को अपना धर्मगुरु मानते हैं. उन्हें गहरा धक्का लगा है और इस नाराज़गी का प्रदर्शन उन्होंने ईरान के बाहर इराक़, पाकिस्तान के कराची और भारत में लखनऊ, हैदराबाद और श्रीनगर में जैसे शहरों में किया है, जहाँ बड़ी संख्या में शिया रहते हैं.

केवल मुसलमान ही नहीं, गैर-मुसलमान नागरिकों ने भी नाराज़गी व्यक्त की है, जो अमेरिकी दादागीरी को पसंद नहीं करते. पिछले कुछ समय से ट्रंप की बातों ने भारत के नागरिकों के मन में पहले से ट्रंप के प्रति नाराज़गी भर दी है, जो इस समय व्यक्त हो रही है

तीसरी प्रतिक्रिया इस मौत का जश्न मनाने वालों की भी है. न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार ईरानियों की बड़ी भीड़ रात भर तेहरान और ईरान के अन्य शहरों की सड़कों पर उमड़ी और इस मौत का जश्न मनाया. ऐसी खबरें दुनिया के कुछ और देशों से भी मिली हैं. सवाल है कि ईरानी के भीतर जश्न मनाने वाले क्या इतने हैं कि वे देश पर काबिज़ धार्मिक सत्ता को उखाड़ फेंकें?

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आगे क्या होगा?

इसमें दो राय नहीं कि इसराइल और अमेरिका की इंटेलिजेंस बेहद कामयाब है. ईरान के चप्पे-चप्पे में उनके एजेंट हैं और आकाश में उड़ते उनके विमानों की निगाहें कोने-कोने पर हैं.केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन नहीं होता. 2003में इराक में सद्दाम हुसैन के शासन का पतन भी अमेरिका के नेतृत्व वाले एक बड़े जमीनी युद्ध का परिणाम था, जिसमें करीब डेढ़ महीने का समय लगा था.

लीबिया की विद्रोही सेनाएं 2011में मुअम्मार गद्दाफी की सरकार को तभी उखाड़ कर फेंक पाईं, जब उन्हें नाटो और कुछ अरब देशों से लगातार हवाई सहायता मिली. दोनों ही मामलों में, राजव्यवस्था टूटी, गृहयुद्ध छिड़ा और हजारों लोगों की मौत हुई.

लीबिया आज भी विफल राज्य बना हुआ है, और इराक व्यापक रक्तपात से जूझ रहा है. ईरान में सत्ता परिवर्तन हो भी जाए, तब भी इस बात की गारंटी नहीं कि मौजूदा इस्लामी सरकार की जगह मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली कोई उदार लोकतांत्रिक सरकार स्थापित हो जाएगी.

अमेरिका वहाँ उदार लोकतांत्रिक सरकार चाहता है या अपनी पिट्ठू सरकार? पचास के दशक में अमेरिका ने ही ईरान में लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर उसकी जगह शाह की सरकार स्थापित की थी.

दायरा बढ़ेगा

अमेरिका और इसराइल ने इन हमलों को ‘पेशबंदी’ बताया है, पर लगता नहीं कि ऐसा किसी तात्कालिक खतरे के जवाब में किया गया है, जैसा कि 'पेशबंदी' शब्द से प्रतीत होता है. ईरान छोटा देश नहीं है कि उसपर आसानी से कब्ज़ा कर लिया जाए.

86वर्षीय खामनेई तीन दशकों से सत्ता में थे, जो दुनिया के सबसे लंबे शासन कालों में से एक है. 1979की इस्लामी क्रांति के बाद से, ईरान में केवल दो सर्वोच्च नेता रहे हैं: आयतुल्ला रूहोल्ला खुमैनी और आयतुल्ला अली खामनेई.

इस पद में सभी शक्तियाँ निहित हैं; सर्वोच्च नेता राज्य के प्रमुख और क्रांतिकारी गार्डों सहित सभी सशस्त्र बलों के वे कमांडर भी होते हैं. ईरान के सत्ता के केंद्रों में उनका ऐसा स्थान है, जहाँ वे सरकारी नीतियों को वीटो कर सकते हैं और यहाँ तक कि सरकारी पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन भी स्वयं कर सकते हैं.

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विरोध प्रदर्शन

2019में, जब ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, तो खामनेई ने प्रदर्शनों को रोकने के प्रयास में कई दिनों तक इंटरनेट बंद कर दिया. एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मशीन गनों से मार डाला.

हालाँकि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर लगे उन प्रतिबंधों को हटा दिया जो उनके पूर्ववर्ती आयतुल्ला ने लगाए थे, लेकिन वे लैंगिक समानता के समर्थक नहीं थे. उनके शासनकाल में हिजाब के खिलाफ अभियान चलाने वाली महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया और तनहाई में रखा गया.

2022 में घटी एक घटना इस्लामी क्रांति के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक साबित हुई. यह घटना पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत थी, जिन्हें हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, हत्या के बाद हुए प्रदर्शनों में सुरक्षा बलों ने 550लोगों को मार डाला और लगभग 20,000प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)

 

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