Country and abroad: Trump administration is getting trapped in its own 'chakravyuh'
प्रमोद जोशी
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ़ को अवैध घोषित करके राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की योजना को जहाँ बड़ा धक्का पहुँचाया है, वहीं अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर कई तरह की अनिश्चितताओं को जन्म भी दे दिया है. फैसले का एक निहितार्थ यह भी है कि वृहत स्तर पर अमेरिकी लोकतंत्र दुनिया पर एकपक्षीय राज करने का समर्थक नहीं है. और यह भी कि व्यापार-समझौते दोतरफा साझेदारी से तय होने चाहिए, एकतरफा अकड़ से नहीं.
धक्का लगने के बावज़ूद ट्रंप की आक्रामकता में कमी नहीं आई है. उन्होंने फौरन एक नए आधार पर 10 प्रतिशत सार्वभौमिक टैरिफ की घोषणा कर दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है. पर इससे उनकी आर्थिक-रणनीति का लक्ष्य पूरा नहीं होगा.
ट्रंप के आर्थिक एजेंडा के कारण संघीय बजट में एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का छेद पैदा हो गया है. पिछले साल पदभार संभालने के बाद उन्होंने आयकर में भारी कटौती कर दी थी, जिसे लेकर अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि पहले से ही कर्ज़ में डूबे देश को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.
जवाब में ट्रंप प्रशासन ने व्यापक रणनीति तैयार की, जिसके तहत शेष विश्व से अमेरिकी बाजारों में आने वाली सामग्री पर भारी टैरिफ लगाना शामिल है. इससे दुनियाभर के देशों की आर्थिक-गतिविधियाँ प्रभावित होने के अलावा कुछ बोझ निम्न और मध्यम आय वाले अमेरिकियों पर भी पड़ा, क्योंकि ज़रूरत की चीजें महँगी होने लगीं.
इस मामले में अदालत की राय है कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) में टैरिफ़ का उल्लेख नहीं है और संविधान के अनुसार आयात पर टैरिफ़ लगाने की शक्ति केवल संसद के पास है.बहरहाल 15 प्रतिशत की समान दर के साथ, काफी देश तुलनात्मक रूप से अब बेहतर स्थिति में आ जाएँगे. भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, लगभग पूरा आसियान, कजाकिस्तान, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, लीबिया, ब्राजील, मैक्सिको और कनाडा अब कम दर पर हैं, जो 24 फरवरी से लागू होगी.
क्या रिफंड होगा?
सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यों के पीठ ने यह फ़ैसला 6-3 के बहुमत से किया है, पर अदालत ने स्पष्ट नहीं किया कि पहले से वसूले गए राजस्व को सरकार वापस करेगी या नहीं. अदालत की इस चुप्पी से अनिश्चितता पैदा हुई है. जजों ने इस प्रश्न पर निर्णय निचली अदालत पर छोड़ दिया है. रिफंड की राशि 170 अरब डॉलर तक हो सकती है जो ट्रंप के टैरिफ़ से हासिल कुल राजस्व के आधे से ज़्यादा है.
ट्रंप के पास अभी कुछ विकल्प हैं. सेक्शन 232 जैसे राष्ट्रीय-सुरक्षा प्रावधानों के तहत खास तरह के उद्योगों पर टैरिफ़ जारी रखा जा सकता है. ट्रंप प्रशासन ने ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122 के तहत अस्थायी टैरिफ़ और सेक्शन 301 के तहत देश-विशेष टैरिफ़ जैसे विकल्पों को लागू करने का फ़ैसला किया है.
15 प्रतिशत टैरिफ
अदालती फैसले के बावज़ूद ट्रंप ने पीछे हटने के बजाय उसी रात नया 10 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा कर दी. यह घोषणा अमेरिका के ट्रेड एक्ट (1974) के सेक्शन 122 के तहत की गई है. इसे भी बढ़ाकर उन्होंने 15 प्रतिशत कर दिया. अब हमें समझना होगा कि अदालत ने ट्रंप की शक्तियों को किस हद तक बाधित किया है, और वैकल्पिक टैरिफ का रास्ता कैसे काम करेगा? ट्रंप ने इसकी ओर रुख क्यों किया?
सितंबर 2024 में पेंसिल्वेनिया में उन्होंने अपनी चुनाव-सभा में कहा था, मुझे टैरिफ लगाने के लिए कांग्रेस (संसद) की आवश्यकता नहीं होगी. राष्ट्रपति को उन्हें लगाने का अधिकार है.
पहला अदालती धक्का
पिछले साल जब उन्होंने टैरिफ लगाना शुरू किया था, तब 28 मई को अमेरिका के कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड (सीआईटी) के तीन न्यायाधीशों के पैनल ने 1977 के आईईईपीए के अंतर्गत उनके लगाए गए सभी टैरिफ को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया.
अदालत के आदेश के बावज़ूद फौरी तौर पर ट्रंप के फैसले ज़ारी रहे, क्योंकि एक दिन बाद ही गुरुवार को देश की फेडरल अपील कोर्ट ने ट्रंप-प्रशासन को राहत देते हुए ट्रेड कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी. अपीलीय अदालत ने कहा कि तत्काल प्रशासनिक रोक के अनुरोध को स्वीकार किया जाता है, पर यह आदेश तब तक लागू होगा, जब तक अदालत इस पर आगे विचार नहीं करती. अब उस अदालत का भी फैसला आ गया है.
टैरिफ दीवार दरकी
अदालत ने अब आईईईपीए का उपयोग करके बनाई गई ट्रंप की टैरिफ दीवार पर कड़ा प्रहार कर दिया है. इस कानून का उपयोग इसके पहले किसी भी पूर्व राष्ट्रपति ने टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया था. अब अदालत ने व्यापार नीति में अमेरिकी कांग्रेस की प्रधानता को बहाल कर दिया है. उसने ट्रंप के पारस्परिक टैरिफ और प्रमुख व्यापारिक भागीदारों से आयात पर लगाए गए फेंटेनाइल-लिंक्ड कर्तव्यों को अमान्य कर दिया.
चीफ़ जस्टिस ने अपने फ़ैसले में लिखा है, अगर संसद टैरिफ़ लगाने जैसी असाधारण शक्ति देना चाहती, तो वह इसे स्पष्ट रूप से कर सकती है. उन्होंने यह भी लिखा कि ट्रंप प्रशासन के क़ानूनी तर्कों को स्वीकार करना ‘व्यापार नीति पर कार्यपालिका और विधायिका के लंबे सहयोग को समाप्त कर राष्ट्रपति को अनियंत्रित ताक़त देना होगा.’सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ घंटों बाद, ट्रंप ने धारा 122 के तहत लगभग सभी आयातों पर 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी.
क्या है धारा 122?
यह धारा 150 दिनों तक के लिए 15 प्रतिशत टैरिफ को अस्थायी रूप से लगाने की अनुमति देती है. इसके साथ, दो अन्य प्रावधान, 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 और 1974 व्यापार अधिनियम की धारा 301 का आधार भी उन्हें मिला है, जो पहले से ही उपयोग में हैं.
1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर टैरिफ कार्रवाई की अनुमति देती है. इसे स्टील, एल्युमिनियम, सेमीकंडक्टर और अन्य उत्पादों के मामले में पहले ही लागू किया जा चुका है. ट्रंप प्रशासन इस सूची का विस्तार करना चाहता है.
अदालत के फैसले और 10 प्रतिशत के नए टैरिफ ने ज्यादातर देशों को संशय में डाल दिया है. ब्रिटेन, जापान, यूरोपीय संघ, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम के साथ अमेरिका के हालिया व्यापार सौदों और भारत के साथ प्रस्तावित समझौते को लेकर संशय है.
अस्थायी समाधान
उपरोक्त सभी देशों पर, अब 15 फीसदी टैरिफ लगेगा, जो अभी तक आईईईपीए के तहत ट्रंप का 10 फीसदी बेसलाइन टैरिफ था. इससे ट्रंप प्रशासन को कुछ राहत और कुछ समय मिल जाएगा. पर, इस व्यवस्था को भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.
पाँच महीने बाद क्या होगा? तब प्रशासन को अमेरिकी संसद के पास जाना होगा, पर मध्यावधि चुनाव से ठीक पहले प्रशासन को टैरिफ के राजनीतिक निहितार्थ की तरफ ध्यान देना होगा. अमेरिकी जनता मानती है कि टैरिफ के कारण कीमतें बढ़ी हैं.
ट्रंप और उनके प्रशासन को अब अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए कुछ करना होगा. आईईईपीए का इस्तेमाल अब हो नहीं सकेगा. धारा 122 का उपयोग अस्थायी है. धारा 232 और धारा 301 का उपयोग करने के पहले औपचारिक जाँच ज़रूरी है.
भारत का मामला
सवाल है कि भारत-अमेरिका समझौते का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के तुरंत बाद हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जब ट्रंप से यही सवाल किया गया तो बोले, कुछ भी नहीं बदला है. पहले अमेरिका टैरिफ़ देता था, अब भारत देगा.शनिवार को भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा था कि हम अमेरिकी घोषणा के निहितार्थ को ‘स्टडी’ कर रहे हैं. अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत करने का फैसला कर ही लिया था, पर उस फैसले की औपचारिकता नहीं हुई है. अब मान सकते हैं कि यह घटकर 15 फीसदी हो जाएगा.
इस किस्म का भ्रम सिर्फ भारत तक ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, जापान और यूरोपीय संघ या दूसरे ऐसे देशों तक भी फैला हुआ है, जिन्होंने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. बहरहाल भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की रूपरेखा बदलना तय है. दोनों ने अभी तक कानूनी तौर पर समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. अंतिम समझौता अब टल गया है. अमेरिका जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल का दौरा स्थगित हो गया है. कहना मुश्किल है कि रूसी पेट्रोलियम की खरीद के मामले में भारत पर दबाव बना रहेगा या हट जाएगा.
अमेरिकी न्याय
इस फैसले ने अमेरिकी लोकतंत्र की ‘चैक्स एंड बैलेंसेज़’ व्यवस्था को साबित ज़रूर किया है, पर बदलते समय के साथ कुछ नई पेचीदगियों को जन्म भी दिया है. विस्मय की बात है कि जिस अदालत में कंज़र्वेटिव जजों की संख्या ज्यादा है, उसने ट्रंप के फैसले को पलट दिया.
जब से ट्रंप ने एक साल पहले पदभार संभाला है, सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में लगातार फैसले किए हैं. इस बार ट्रंप के टैरिफ़ को रद्द करने वाले छह जजों में तीन कंज़र्वेटिव और तीन लिबरल खेमों से थे. लिबरल खेमे के तीन जज एलिना कागान, सोनिया सोटोमेयोर और केटांजी ब्राउन जैक्सन डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों से नियुक्ति-प्राप्त थे. इनका विरोध समझ में आता है.
शेष तीन जजों को भी रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किया था. चीफ़ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने फैसला लिखा, जिन्हें जॉर्ज बुश ने नियुक्त किया था. जज नील गोरसुक और एमी कोनी बैरेट को ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में नियुक्त किया था.ट्रंप ने अब उन कंज़र्वेटिव जजों को लताड़ा है, जिन्होंने टैरिफ पर उनके खिलाफ वोट दिया. सोशल मीडिया पोस्ट में, ट्रंप ने लिखा कि मेरे नियुक्त दो न्यायाधीश, नील गोरसुक और एमी कोनी बैरेट, डेमोक्रेटिक पूर्ववर्तियों द्वारा नियुक्त जजों की तुलना में विश्वासघाती साबित हुए हैं.
सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया आमतौर पर राजनीति से प्रेरित और प्रभावित होता है. जजों की राजनीतिक प्रतिबद्धता और विचारधारा स्पष्ट होती है, क्योंकि उनकी नियुक्ति राजनीतिक प्रक्रिया के तहत होती है. राष्ट्रपति अपनी विचारधारा के अनुसार जजों को नामांकित करते हैं. पर लगता है कि इस बार जजों ने राजनीतिक-विचारधारा के स्थान पर लोकतांत्रिक और संवैधानिक-मूल्यों को ऊपर रखा.
कमज़ोर पड़ेंगे ट्रंप?
क्या अब ट्रंप की टैरिफ धमकियाँ कमज़ोर पड़ जाएँगी और वैश्विक कारोबार में उनका प्रताप फीका पड़ जाएगा? जिन देशों के साथ समझौते हुए थे, वे अब पुनर्विचार करेंगे या समझौतों को तोड़ देंगे? बाकी बातों का पता नहीं. पर इतना स्पष्ट है कि भविष्य में अमेरिकी टैरिफ नीति में अचानक बदलाव बहुत आसान नहीं होगा.
पर्यवेक्षक मानते हैं कि दुनिया के देश अभी इंतज़ार करेंगे. जिन देशों ने ट्रंप-सरकार के साथ समझौते किए हैं, वे भी समझ नहीं पा रहे हैं कि समझौते को निरस्त कराया जाए या फिर से बातचीत की जाए. ऐसी कोशिश करने पर ट्रंप का गुस्सा भड़क भी सकता है.
( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)