प्रमोद जोशी
अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अब किसी भी क्षण हो सकता है. फिर भी दोनों ने अपने हाथ खींच रखे हैं. इसके पीछे दो कारण नज़र आते हैं.एक तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बना ले, वहीं ईरान का नेतृत्व दो हिस्सों में बँटा हुआ है. वहाँ का अनुदार तबका छूट देना नहीं चाहता.
अमेरिका इसे और व्यापक आधार देना चाहता है, जिसमें इसराइल की समस्या का समाधान भी है. वह मुस्लिम देशों से इसराइल को मान्यता दिलाना चाहता है, जो इस लड़ाई की बुनियाद में है.बहरहाल दोनों देशों की सहमतियों के बावज़ूद, समझौता अटका हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को वाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने प्रमुख सलाहकारों के साथ बैठक की, लेकिन उन्होंने अंतिम फैसला टाल दिया.
इस कक्ष का इस्तेमाल बड़े संकटों से निपटने की रणनीति बनाने या चर्चा करने के लिए होता है. अभी स्पष्ट नहीं है कि समझौते की घोषणा कब होगी, होगी भी या नहीं.ईरान के मुख्य वार्ताकार, जनरल मोहम्मद बग़ेर ग़ालिबफ़ ने दिन में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, तेहरान को वाशिंगटन पर भरोसा नहीं है. उनके किसी कदम के बिना, हम पहला कदम नहीं उठाएँगे.

फ़्रेमवर्क तैयार
इससे पहले गुरुवार को अमेरिका और ईरान ने मिलकर एक शुरुआती समझौते का फ़्रेमवर्क तैयार किया था, जिसे ‘मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग’ कहा गया है. यह समझौता लागू हुआ, तो युद्धविराम को 60दिन और बढ़ाया जाएगा.
इसके साथ ही, ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर बातचीत शुरू करने की योजना है. उधर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने खबर दी है कि ईरान के कट्टरपंथी गुट ने अमेरिका को किसी किस्म की रियायत देने का खुला विरोध किया है.
ईरान में आंतरिक राजनीतिक-संघर्ष चल रहा है. सरकारी टेलीविजन, कट्टरपंथियों के नियंत्रण में है। उसने मतभेदों को मुखर करते हुए वार्ताओं को विफल बताया है. पिछले सोमवार को राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक में सरकारी टीवी को फटकार लगाई और कहा कि कलह पैदा करने से बचो. पेज़ेश्कियान ने कहा कि पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई इस बात से सहमत थे कि हमें बातचीत की मेज पर जाना चाहिए। लेकिन लोग प्रचार कर रहे हैं कि हमें बातचीत नहीं करनी चाहिए.
विरोधी रैली
शुक्रवार को तेहरान में कट्टरपंथियों की भारी रैली हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग झंडे लहराते हुए और विरोध के नारे लगाते हुए नज़र आए. सरकारी टेलीविजन के एक रिपोर्टर ने कुछ उपस्थित लोगों से बात की.एक महिला ने कहा, हम चाहते हैं कि उन्हें करारा जवाब मिले. एक व्यक्ति ने कहा, जमे रहो, हम अपने खून की आखिरी बूँद तक तुम्हारे साथ हैं.
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समितियों के प्रमुख और रूढ़िवादी सांसद इब्राहिम अजीजी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, ‘ट्रंप को पता होना चाहिए कि ईरान, विजेता देश के रूप में, शर्तें तय करता है.’
तेहरान के एक राजनीतिक विश्लेषक मेहदी रहमती के अनुसार, इस गुट को बहुमत ईरानियों का समर्थन प्राप्त नहीं है. उनकी असहमति के बावजूद परमाणु वार्ता जारी है.नए सर्वोच्च नेता, आयतुल्ला मोज़्तबा खामनेई से भी कट्टरपंथी नाराज़ हैं.
गुरुवार को, एक कट्टरपंथी सांसद और धर्मगुरु हामिद रसाई ने सोशल मीडिया पर ‘सर्वोच्च नेतृत्व के योग्य कौन है?’ शीर्षक से एक पोस्ट लिखकर आयतुल्ला पर निशाना साधा.बाद में रसाई ने एक अन्य पोस्ट में अपने बयान से पलटते हुए कहा कि कुछ शरारती तत्वों ने उनकी टिप्पणियों का गलत अर्थ निकाला है.
समझौते की संभावना
हर रोज़ खबर आती है कि समझौता होने ही वाला है, पर होता नहीं है. ट्रंप खुद कहते हैं कि समझौता हुआ ही समझो, पर यह खबर भी आती है कि उसे ट्रंप ही रोके बैठे हैं.शुक्रवार को अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि समझौता होने जा रहा है, जिससे तेल और गैस की ढुलाई के महत्वपूर्ण जलमार्ग, होर्मुज को फिर से खोला जा सकता है और युद्धविराम को बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे बातचीत का रास्ता खुलेगा.
दूसरी तरफ दोनों पक्षों के बीच हाल में गोलीबारी हुई है. ट्रंप ने बार-बार बड़े पैमाने पर युद्ध की धमकी दी है. समझौता हुआ, तो ट्रंप को उस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता मिल जाएगा, जिसने तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है और अमेरिका में उनकी लोकप्रियता गिरती जा रही है.
इस समझौते से ईरान की अपनी विदेशी संपत्तियों तक पहुँच हो जाएगी और अरबों डॉलर के तेल राजस्व का प्रवाह फिर से शुरू करने का रास्ता भी खुल जाएगा.गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हालांकि दोनों पक्ष समझौते के ‘बहुत करीब’ हैं, फिर भी हम ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सवालों के अलावा समझौते की सटीक भाषा पर विचार-विमर्श कर रहे हैं.
कैसा समझौता
यह एक प्रारंभिक प्रारूप होगा, जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य, देश पर अमेरिकी प्रतिबंधों और युद्ध की औपचारिक समाप्ति को निर्धारित करने के लिए अधिक ठोस, और संभवतः लंबे समय तक चलने वाली, वार्ताओं का मार्ग प्रशस्त करेगा.वार्ता में शामिल राजनयिकों ने कहा कि मोल-भाव जितना लंबा चलेगा, दोनों पक्ष उतने ही हताश भी होंगे. गोलीबारी भी हो सकती है, जिससे राजनयिक प्रयासों को धक्का लगेगा.
BREAKING: 🇮🇷🇺🇸
— IRAN ARMY ☫ (@IranArmySpoofX) June 1, 2026
Reports indicate that Iran has rejected Trump's proposals and declared its readiness for war.
This is being portrayed as a hostile propaganda message calling for the escalation of the use of force and the launching of attacks, with a warning that Iran is no… pic.twitter.com/30ONrXnJCQ
नवीनतम प्रस्ताव में जिन बातों पर चर्चा हो रही है, उनमें से कुछ यह हैं:
• इसमें वाशिंगटन और तेहरान के बीच अनाक्रमण-संधि की शर्तें तय हो सकती हैं.
• मध्यस्थों का कहना है कि इसमें क्षेत्रीय पहलू भी शामिल हो सकते हैं, जिसमें लेबनान में लड़ाई रोकना भी शामिल है.
• मोटे तौर पर युद्ध-विराम 60दिन के लिए बढ़ाया जा सकता है.
• होर्मुज़ के रास्ते मुक्त-आवागमन शुरू हो सकता है.
• इसमें ईरान के लिए 300अरब डॉलर के युद्धोत्तर निवेश कोष की स्थापना भी संभव है. इसे पुनर्निर्माण-कार्यक्रम भी कह सकते हैं.
• इस कोष के सहारे अमेरिकी तेल और ऊर्जा कंपनियों को ईरान में प्रवेश मिल सकता है.
• एक ईरानी अधिकारी के अनुसार, ईरान पर मौजूदा अमेरिकी प्रतिबंध, जो मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम के जवाब में लगाए गए थे, अंतिम समझौते पर पहुँचने की स्थिति में हटा लिए जाएँगे. ईरान को अंततः अरबों डॉलर की फ्रीज़ की गई संपत्तियाँ मिल जाएँगी.
• विदेशी बैंकों में ईरान की अनुमानित 24अरब डॉलर की धनराशि फँसी हुई है.
नाभिकीय सामग्री
ईरानी अधिकारी द्वारा वर्णित मसौदा समझौते के अनुसार, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को निलंबित कर देगा, जिसके बदले में वाशिंगटन वादा करेगा कि अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी होने तक प्रतिबंधों में वृद्धि नहीं होगी.
नाभिकीय सामग्री पर वार्ताएँ दूसरे चरण में होंगी. इनमें ईरान के मौजूदा 970पाउंड यूरेनियम के भंडार को निपटाने के तरीके पर चर्चा होगी, जिसे तेजी से हथियार बनाने लायक बनाया जा सकता है. इसके अलावा, दस टन लोअर ग्रेड परमाणु सामग्री भी है.
शुरू में ट्रंप ने कहा था कि यूरेनियम के ये भंडार अमेरिका को भेजे जाने चाहिए, जबकि ईरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की देखरेख में अपने देश में ही समृद्ध यूरेनियम के एक हिस्से को कम करना चाहता है और बाकी किसी तीसरे देश को भेजना चाहता है.
पिछले हफ्ते सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की देखरेख में संवर्धन को कम करना या इसे किसी तीसरे देश को भेजना भी मंज़ूर है, लेकिन बुधवार को कहा कि रूस या चीन को देना मंज़ूर नहीं.
अब्राहम समझौता
ट्रंप ने 25 मई को पश्चिम एशियाई देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आह्वान किया. इसराइल को मान्यता दिलाने के लिहाज से यह महत्त्वपूर्ण बात है.अब्राहम समझौते अमेरिका की मध्यस्थता से इसराइल और कई अन्य देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने पहले कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक उपलब्धियों में से एक बताया था.
ट्रंप ने अब सोशल मीडिया पर कहा कि अगर और देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो पश्चिम एशिया में सहयोग और भी मजबूत होगा. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ईरान भी उनमें से एक हो सकता है.उन्होंने एक अलग पोस्ट में इस आह्वान को दोहराते हुए कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वे समझौते पर हस्ताक्षर करने के मन बनाएँ.
आधी सहमति
2020में वाइट हाउस के लॉन में हस्ताक्षरित, अब्राहम एकॉर्ड के नाम से प्रसिद्ध इस समझौते ने इसराइल और खाड़ी के दो अरब देशों, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के बीच राजनयिक संबंध स्थापित किए.इसके तुरंत बाद मोरक्को के साथ भी इसी तरह का समझौता हुआ. पिछले साल नवंबर में, कजाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गया. उसके इसराइल के साथ पहले से ही पूर्ण राजनयिक संबंध थे.
तब तक, केवल मिस्र और जॉर्डन ही ऐसे अरब देश थे जिन्होंने औपचारिक रूप से इसराइल को मान्यता दी थी. बाकी ज्यादातर देशों ने फलस्तीनी राज्य के गठन तक इसराइल को मान्यता न देने का निश्चय किया था.
अमेरिकी राजनीति
ज़्यादा देश इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, तो अमेरिका की आंतरिक राजनीति में, ईरान के कट्टर विरोधी शांत होंगे, जिन्होंने शांति-समझौते की कोशिशों की आलोचना की है.दक्षिण कैरलीना के रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने हाल में कई चेतावनियाँ जारी की हैं, लेकिन उन्होंने सऊदी अरब और अन्य अरब देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने की संभावना का स्वागत किया.
उन्होंने कहा, यह ऐतिहासिक होगा और इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक होगा. उन्होंने आगे कहा, पूरा लक्ष्य हमेशा से ईरान को अलग-थलग करना रहा है.विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा जल्द होने की संभावना नहीं है. ट्रंप वर्तमान अस्थिरता का इस्तेमाल करते बड़ा समझौता करना चाहते हैं, जो पश्चिम एशिया की एक मूल समस्या को संबोधित करता है.
फलस्तीन का सवाल
क्या वे इसमें सफल होंगे? इसमें सऊदी अरब शामिल हुआ, तो पाकिस्तान जैसे देश के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी. पाकिस्तानी दृष्टिकोण है कि जब तक फलस्तीनियों के लिए स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य के निर्माण पर स्पष्टता नहीं होती, इसराइल को मान्यता नहीं दी जा सकती.
उधर इसराइल ने इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ने की बहुत कम इच्छा दिखाई है. उसके कब्जे वाले क्षेत्र में यहूदी बस्तियों का विस्तार जारी है. गज़ा का इलाका बमबारी से तबाह हो गया है. जॉर्डन नदी के पश्चिमी किनारे में हिंसा जारी है.
ऐसी परिस्थितियों में ट्रंप की नए सिरे से रुचि इसराइली लॉबी के प्रभाव को दर्शाती है. सरकारें रणनीतिक कारणों से इस किस्म की डिप्लोमेसी में शामिल हो सकती हैं, पर आम लोग फलस्तीनी समस्या को पश्चिम एशिया में न्यायपूर्ण समझौते के रूप में देखना चाहते हैं.
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