एम श्रीलता
सुबह तड़के जब हम गहरी नींद में होते हैं तब कोई शहर की सड़कों पर झाड़ू लगा रहा होता है। हर घर और दुकान से रोज क्विंटल कचरा निकलता है। इसके बावजूद शहर डंपयार्ड में नहीं बदलता। क्या आपने कभी सोचा है कि यह सब इतनी सहजता से कैसे हो जाता है। सार्वजनिक व्यवस्था की यह मशीनरी पर्दे के पीछे लगातार चलती रहती है।
कल्याणकारी योजनाएं सही लोगों तक पहुंचती हैं। दफ्तरों में फाइलें आगे बढ़ती हैं। इन सबके पीछे कुछ ऐसे प्रशासनिक अधिकारी होते हैं जो केवल बंद कमरों में फैसले नहीं लेते। वे जमीन पर काम करने वाले हजारों कर्मचारियों को एक सूत्र में पिरोते हैं। केरल कैडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी डॉ. अदीला अब्दुल्ला इसी श्रेणी की अधिकारी हैं।

अदीला अब्दुल्ला (Dr Adeela Abdulla) को केरल में मालाबार क्षेत्र से सिविल सेवा में आने वाली शुरुआती मुस्लिम महिलाओं में गिना जाता है। वर्तमान में वह केरल सरकार के सामाजिक न्याय विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात हैं। यह विभाग सीधे तौर पर समाज के सबसे संवेदनशील और कमजोर तबके के लिए काम करता है। नीतिगत फैसलों को मानवीय संवेदनाओं के साथ जमीन पर उतारना इस विभाग की मुख्य चुनौती है।
सामाजिक न्याय विभाग उन लोगों के लिए काम करता है जो अक्सर समाज की मुख्यधारा से कटे रहते हैं। इसमें दिव्यांगजन, बुजुर्ग और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग शामिल हैं। ये लोग केवल राज्य की सहायता पर निर्भर नहीं हैं बल्कि वे अपनी गरिमा की तलाश में सरकार की तरफ देखते हैं। इस जगह पर बैठकर केवल फाइलों को आगे बढ़ाना काफी नहीं होता। अदीला का मुख्य काम यह देखना है कि सरकारी नीतियां जमीन पर सचमुच असर दिखा रही हैं या नहीं।
इस काम में चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। एक तरफ जहां लाभार्थियों की संख्या बहुत अधिक है वहीं दूसरी तरफ उनकी जरूरतें अलग हैं। अदीला अब्दुल्ला यहां योजनाओं और जनता के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम करती हैं। उनका पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ लक्षित समूह को बिना किसी रुकावट के मिले।
इस जिम्मेदारी से पहले डॉ. अदीला केरल की एक बहुत बड़ी योजना का हिस्सा थीं। वह केरल ठोस कचरा प्रबंधन परियोजना की कमान संभाल रही थीं। यह शहरी प्रशासन की एक बेहद जटिल योजना थी। इस परियोजना का मकसद कचरा संग्रहण, पृथक्करण, प्रसंस्करण और उसके सुरक्षित निपटान की पूरी कलाई को दुरुस्त करना था।
यह काम केरल के 93शहरी स्थानीय निकायों में फैला हुआ था। इसमें राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भी सहयोग मिल रहा था। अदीला ने इस पूरे अभियान को एक सूत्रधार की तरह संभाला ताकि व्यवस्था की हर कड़ी आपस में जुड़ी रहे। सरकारी पत्रिका केरल कॉलिंग में छपे अपने एक लेख में उन्होंने इस परियोजना की चुनौतियों का जिक्र किया था।
उनका मानना था कि कचरा प्रबंधन को रोज-रोज के संकट की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे और क्षमता निर्माण की जरूरत होती है जो दशकों तक काम आ सके। समाज कल्याण के क्षेत्र में अदीला का मौजूदा काम भी इसी तरह के तालमेल की मांग करता है।
सरकारी नीतियों को लोगों के जीवन के वास्तविक अनुभवों में बदलना एक लंबी प्रक्रिया है। इन कार्यक्रमों की सफलता का पता एक दिन में नहीं चलता। यह काम आने वाले दस सालों में राज्य की दिशा और दशा तय करेगा। पर्दे के पीछे काम करने वाले इन अधिकारियों को न तो कोई बड़ी पब्लिसिटी मिलती है और न ही तालियां। लेकिन अदीला बचपन से ही इसी तरह की बड़ी भूमिकाओं के लिए खुद को तैयार कर रही थीं।
हाल ही में उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में अपनी मां को याद किया। बचपन में एक बार उनकी मां ने सड़क पर बेघर लोगों को खुले में सोते हुए देखा था। तब मां ने अदीला से कहा था कि जब तुम बड़ी हो जाओ और तुम्हारे पास कोई ताकत आए तो इन बेघरों के लिए कुछ जरूर करना।
आज सामाजिक न्याय विभाग की विशेष सचिव के रूप में अदीला को लगता है कि वह अपनी मां की उसी इच्छा को पूरा कर रही हैं। उनका मानना है कि हर मां का अपने बच्चों के लिए यही सपना होना चाहिए कि समाज में कोई भी बेघर सड़क पर न सोए। शहरी बेघरों के लिए उन्होंने जो योजना तैयार की उसकी प्रेरणा उन्हें बचपन में मां से मिली उसी बातचीत से मिली थी।
अदीला अपने जीवन में मिलने वाली हर सकारात्मक प्रेरणा को सहेज कर रखती हैं। यही बातें उन्हें एक रचनात्मक और सकारात्मक बदलाव लाने वाला इंसान बनाती हैं। कुछ समय पहले जब वह शहरी विकास विभाग का नेतृत्व कर रही थीं तब उन्होंने अपने सबसे बड़े प्रेरणास्रोत के बारे में लिखा था।

वह कोई और नहीं बल्कि उनके पिता थे जिन्हें वह प्यार से ओशो अब्दुल्ला कहती हैं। फेसबुक पर लिखी उनकी एक पोस्ट पिता के संस्मरण की तरह है।उन्होंने लिखा था कि मैंने अपने पूरे जीवन में पिता को केवल एक बार ईद की नमाज पढ़ते देखा। लेकिन वह हमेशा दूसरों को मस्जिद जाने के लिए प्रेरित करते थे।
मैंने कभी उन्हें किसी की बुराई करते या किसी का मजाक उड़ाते नहीं सुना। उनकी मां दिन में पांच वक्त की नमाज पढ़ती थीं लेकिन पिता को इससे कभी कोई शिकायत नहीं रही। दोनों के बीच एक बेहद खूबसूरत और आपसी समझ का रिश्ता था।
अदीला की यादें मालाबार की पृष्ठभूमि में लिखे किसी शानदार उपन्यास के अध्याय जैसी लगती हैं। वह लिखती हैं कि माहे की यात्रा के दौरान उनके पिता पत्तों में लिपटे तले हुए साबूदाने के स्नैक्स लाते थे। स्नैक्स के साथ कहानियों का एक लंबा दौर शुरू होता था। वह रात में पिता का इंतजार करती थीं क्योंकि वही कहानियों का समय होता था। बातचीत का यह सिलसिला तब तक चलता जब तक कि नींद न आ जाए।
रात के उन सन्नाटों में पिता और बेटी तब तक बैठते जब तक पिता सो नहीं जाते। उन्हीं रातों में अदीला का परिचय हरमन हेसे की किताब सिद्धार्थ, एमटी वासुदेवन नायर की कहानियों, पुनाथिल कुंजब्दुल्ला और खुशवंत सिंह के लेखन से हुआ। वह जागती रहतीं, स्नैक्स खातीं और पिता की जुबानी साहित्य की दुनिया को समझती रहती थीं। इस तरह एक बहुत बड़ी और खूबसूरत दुनिया उनके सामने खुल गई।
इन कहानियों ने अदीला की सोच को गहराई से प्रभावित किया। सोशल मीडिया पर उनके नियमित लेखन में इसकी झलक साफ देखी जा सकती है। वह बताती हैं कि उनके जीवन में दो लोग ऐसे थे जिन्होंने बचपन में ही कह दिया था कि वह बड़ी होकर नाम कमाएंगी। पहले उनके पिता जिन्हें वह कुंजप्पा कहती थीं और दूसरे उनके पड़ोसी पप्पेत्तन।
पप्पेत्तन ज्योतिष का अध्ययन करते थे और मद्रास में लंबे समय तक रहे थे। उन दिनों गूगल या इंटरनेट जैसी चीजें नहीं होती थीं। पिता और पप्पेत्तन के साथ होने वाली बातचीत ही अदीला के लिए बाहरी दुनिया की खिड़की थी। उन दोनों के जरिए अदीला ने उन देशों, लोगों और कहानियों को देखा जिनसे वह कभी असल में नहीं मिली थीं।

इसी माहौल ने उनके भीतर सिविल सेवा में जाने के विचार को जन्म दिया। उन मुलाकातों ने प्रशासनिक सेवा में आने से बहुत पहले ही उनकी सोच को एक आकार दे दिया था। वह आज भी उन मूल्यों को अपने जीवन में बनाए रखने की कोशिश करती हैं। वे मूल्य उन्हें मुश्किल समय में हिम्मत देते हैं। अदीला का मानना है कि ये बातें किसी भी लड़की को आगे बढ़ने का हौसला दे सकती हैं।
उन्होंने उन सिद्धांतों को भी साझा किया जो उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले थे। वह उम्मीद और उदारता के शब्दों में अपनी ताकत ढूंढती हैं। उनके पिता ने उनसे कहा था कि अगर धरती पर एक भी इंसान जिंदा है तो उम्मीद हमेशा बची रहती है। इस दुनिया में कोई भी अनिवार्य नहीं है क्योंकि जिंदगी किसी के होने या न होने से नहीं रुकती।
विफलता तब तक अस्तित्व में नहीं आती जब तक आप उसे अंतिम परिणाम के रूप में स्वीकार नहीं कर लेते। इंसान को जीवनभर सीखते रहना चाहिए और जब तक सांस है तब तक दूसरों का भला करना चाहिए। अदीला इन नसीहतों को मोती मानकर अपने दिल के करीब रखती हैं। समाज के सबसे कमजोर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की इस नौकरी में पिता के ये अनमोल शब्द आज भी उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।