मंसूरूद्दीन फरीदी/ नई दिल्ली/नूह, हरियाणा
हरियाणा के नूह जिले के मेवात क्षेत्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो आज के दौर में उम्मीद जगाती है। जब देश में अक्सर धर्म और पहचान को लेकर बहसें होती हैं, तब मेवात के कुछ गांवों ने इंसानियत, भाईचारे और आपसी सम्मान की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा दूर दूर तक हो रही है।
ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा यात्रा के दौरान मेवात के नेमका और बछोर गांवों में मुस्लिम परिवारों ने अपने घर, स्कूल और संसाधन तीर्थयात्रियों के लिए खोल दिए। इस पहल ने न केवल यात्रियों का दिल जीता बल्कि यह भी दिखाया कि जमीनी स्तर पर लोगों के रिश्ते आज भी प्रेम और विश्वास पर टिके हुए हैं।
इन दिनों मेवात क्षेत्र से होकर गुजर रही ब्रज मंडल यात्रा में हजारों श्रद्धालु भाग ले रहे हैं। यात्रा के दौरान ठहरने, भोजन और आराम की व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में स्थानीय लोगों ने आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभाली और आने वाले यात्रियों को मेहमान की तरह सम्मान दिया।
नेमका गांव के निवासी और डीसीएम पब्लिक स्कूल के संस्थापक आरिफ खान इस पहल के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने अपने स्कूल के सभी कमरे तीर्थयात्रियों के लिए उपलब्ध करा दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपना निजी घर भी श्रद्धालुओं को सौंप दिया और स्वयं अपने परिवार के साथ गांव के दूसरे मकान में रहने चले गए।
स्कूल परिसर में सैकड़ों यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था की गई। कमरों में बिजली, पंखे, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा गया। दिन भर यात्रा करने के बाद श्रद्धालुओं को आरामदायक वातावरण मिल सके, इसके लिए स्थानीय लोगों ने लगातार मेहनत की।
आरिफ खान बताते हैं कि यात्रा के दौरान कई बार देर रात तक नए श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में उनकी टीम उनके लिए जगह और अन्य सुविधाओं का इंतजाम करती है। उनका मानना है कि मेहमान की सेवा करना इंसानियत का सबसे बड़ा धर्म है।
उन्होंने तीर्थयात्रियों के लिए अपनी रसोई भी खोल दी। आटा, दूध, चाय और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराया गया। मोबाइल फोन चार्ज करने की व्यवस्था से लेकर आरामदायक ठहराव तक हर छोटी बड़ी जरूरत का ख्याल रखा गया।
यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं ने इन व्यवस्थाओं की खुलकर सराहना की। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आए कई यात्रियों ने कहा कि उन्हें यहां किसी तरह का भेदभाव महसूस नहीं हुआ। स्थानीय मुस्लिम परिवारों ने उन्हें अपने परिवार के सदस्य जैसा सम्मान दिया।
एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि इंसानियत और प्रेम सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने बताया कि गांव के लोगों ने जिस आत्मीयता से स्वागत किया, उसने उनके मन में मेवात की नई छवि बनाई है। नेमका गांव में ही रहने वाले मुश्ताक खान ने भी अपने घर के दरवाजे यात्रियों के लिए खोल दिए। उन्होंने और उनके परिवार ने स्वयं दूसरे घर में रहने का फैसला किया ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
घर की दोनों मंजिलों पर यात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था की गई। महिला श्रद्धालु वहीं सामूहिक रूप से भोजन तैयार करती नजर आईं। कई लोग सेवा कार्य में लगे हुए थे। माहौल किसी धार्मिक आयोजन से ज्यादा एक बड़े पारिवारिक मिलन जैसा दिखाई दे रहा था।
मध्य प्रदेश के सागर से आई सविता ने बताया कि उनके तेरह सदस्यीय समूह को यहां रहने की पूरी सुविधा मिली। सामान रखने के लिए जगह दी गई। भोजन बनाने में मदद की गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि स्थानीय लोगों ने उन्हें कभी बाहरी व्यक्ति महसूस नहीं होने दिया।
यात्री नीरज कुमार शर्मा का कहना है कि यदि स्थानीय मुस्लिम परिवार सहयोग नहीं करते तो इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की व्यवस्था करना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह अनुभव उनके जीवन की यादगार घटनाओं में शामिल रहेगा।
उधर बछोर गांव में भी भाईचारे की एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली जिसने लोगों को भावुक कर दिया। ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा यात्रा पर निकलने से पहले अधिवक्ता परशुराम गौतम ने गांव के वरिष्ठ मुस्लिम नागरिक इकबाल जेलदार के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए खास था। परशुराम गौतम ने कहा कि उनके जीवन में इकबाल जेलदार की भूमिका केवल एक पड़ोसी की नहीं रही। उन्होंने उन्हें हमेशा मार्गदर्शन दिया और पिता समान स्नेह दिया।
उन्होंने कहा कि जैसे भगवान कृष्ण के जीवन में नंद बाबा का विशेष स्थान था, वैसे ही उनके जीवन में इकबाल जेलदार का स्थान है। इसलिए यात्रा पर निकलने से पहले उनका आशीर्वाद लेना जरूरी था।इकबाल जेलदार भी भावुक हो गए। उन्होंने परशुराम गौतम को गले लगाया और यात्रा की सफलता के लिए दुआ की। साथ ही प्रेम और शुभकामना के प्रतीक के रूप में उन्हें एक हजार रुपये भेंट किए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मेवात की पहचान केवल भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं है। यह साझा संस्कृति, आपसी सम्मान और सामाजिक सद्भाव की भूमि रही है। यहां वर्षों से हिंदू और मुस्लिम समुदाय एक दूसरे के त्योहारों, सामाजिक कार्यक्रमों और पारिवारिक अवसरों में भाग लेते रहे हैं।
ब्रज मंडल यात्रा के दौरान सामने आई ये तस्वीरें उसी परंपरा की जीवंत झलक हैं। यहां लोगों ने यह साबित किया कि समाज की असली ताकत धर्म के नाम पर खड़ी दीवारों में नहीं बल्कि दिलों को जोड़ने वाले रिश्तों में होती है।
ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े पवित्र स्थलों की यात्रा मानी जाती है। यह यात्रा नूह के नल्हड़ मंदिर से शुरू होकर विभिन्न धार्मिक स्थलों से गुजरते हुए सिंगार क्षेत्र तक पहुंचती है। विश्व हिंदू परिषद इसके प्रमुख आयोजकों में शामिल है।
इस वर्ष यात्रा के दौरान मेवात से जो संदेश निकला है, वह केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह संदेश है आपसी विश्वास का। यह संदेश है साझा विरासत का। और सबसे बढ़कर यह संदेश है कि इंसानियत आज भी जिंदा है।
नेमका और बछोर के लोगों ने दिखा दिया कि जब दिल खुले हों तो घरों के दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं। यही मेवात की असली पहचान है। यही भारत की साझी संस्कृति की सबसे खूबसूरत तस्वीर भी।