बृहस्पति का चंद्रमा यूरोपा बन सकता है जीवन के लिए अनुकूल, नया अध्ययन देता है अहम संकेत

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 26-01-2026
Jupiter's moon Europa could be habitable, a new study provides important clues.
Jupiter's moon Europa could be habitable, a new study provides important clues.

 

नई दिल्ली।

बृहस्पति के बर्फीले चंद्रमा यूरोपा को लेकर वैज्ञानिकों की उम्मीदें एक बार फिर मजबूत हुई हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार, यूरोपा की मोटी बर्फीली सतह के नीचे छिपा विशाल महासागर ऐसे रसायनों से भरपूर हो सकता है, जो जीवन के अस्तित्व और विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चंद्रमा सौर मंडल में परग्रही जीवन की खोज के लिए सबसे आशाजनक स्थानों में से एक बनता जा रहा है।

यूरोपा, बृहस्पति के दर्जनों चंद्रमाओं में से एक है और लंबे समय से वैज्ञानिकों की जिज्ञासा का केंद्र रहा है। इसकी सतह पर फैली दरारों और बर्फ की मोटी परत के नीचे एक खारे पानी का विशाल महासागर होने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस महासागर में मौजूद पानी की मात्रा पृथ्वी के सभी महासागरों के कुल जल से भी लगभग दोगुनी हो सकती है।

हालांकि, यूरोपा के महासागर और पृथ्वी के महासागरों के बीच एक बड़ा अंतर है। यूरोपा का महासागर सूर्य के प्रकाश और ऑक्सीजन से पूरी तरह कटा हुआ है। ऐसे में यहां प्रकाश संश्लेषण के जरिए ऊर्जा का उत्पादन संभव नहीं है। इस वातावरण में यदि जीवन मौजूद है, तो उसे जीवित रहने के लिए रासायनिक ऊर्जा पर निर्भर रहना होगा। लंबे समय से वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल बना हुआ था कि यूरोपा की सतह पर बृहस्पति के तीव्र विकिरण से बनने वाले जीवनदायी ऑक्सीकारक तत्व मोटी बर्फ की परत को पार कर नीचे महासागर तक कैसे पहुंचते होंगे।

अब वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाया है। शोध के अनुसार, यूरोपा की सतह पर मौजूद कुछ बर्फ धीरे-धीरे नीचे की ओर धंसती रहती है। यह प्रक्रिया भले ही बेहद धीमी हो, लेकिन लगातार चलने के कारण सतह पर मौजूद रसायनों को बर्फ की परत के भीतर प्रवेश करने और अंततः महासागर तक पहुंचने में मदद करती है।

शोध पत्र के प्रमुख लेखक और वर्तमान में वर्जीनिया टेक में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता ऑस्टिन ग्रीन ने कहा,
“ग्रह विज्ञान में यह एक बिल्कुल नया विचार है, जो पृथ्वी पर पहले से स्थापित एक सिद्धांत से प्रेरित है। सबसे रोमांचक बात यह है कि यह यूरोपा के रहने योग्य वातावरण से जुड़ी एक पुरानी समस्या का समाधान करता है। यह संकेत देता है कि यूरोपा के महासागर में परग्रही जीवन की संभावना वास्तव में मौजूद हो सकती है।”

विभिन्न अंतरिक्ष यानों से प्राप्त तस्वीरों से पहले ही यह स्पष्ट हो चुका है कि बृहस्पति के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल के कारण यूरोपा की सतह भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय है। लेकिन नए अध्ययन के मुताबिक, यह गतिविधि मुख्य रूप से क्षैतिज दिशा में होती है, न कि सीधे नीचे की ओर। अब तक वैज्ञानिकों का मानना था कि बर्फ की मोटी परत में केवल बड़ी दरारों जैसी चरम घटनाओं के जरिए ही सतह की सामग्री नीचे जा सकती है।

हालांकि, इस नए शोध में कंप्यूटर मॉडल के जरिए यह दिखाया गया है कि यूरोपा की सतह के पास मौजूद नमकीन बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े आसपास की शुद्ध बर्फ की तुलना में अधिक घने और कमजोर हो सकते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में ये टुकड़े मुख्य बर्फीली परत से अलग होकर धीरे-धीरे नीचे की ओर डूबने लगते हैं। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने ‘लिथोस्फेरिक फाउंडिंग’ नाम दिया है।

यह प्रक्रिया पृथ्वी पर होने वाली भूवैज्ञानिक घटना से काफी मिलती-जुलती है, जब पृथ्वी की सबसे बाहरी परत का कुछ हिस्सा अंदर की ओर मेंटल में धंस जाता है। गौरतलब है कि 2025 में वैज्ञानिकों ने कैलिफोर्निया के सिएरा नेवादा पर्वत के नीचे इसी तरह की प्रक्रिया के प्रमाण भी पाए थे।

अध्ययन के अनुसार, इस प्रक्रिया के जरिए सतह पर मौजूद रसायनों को महासागर तक पहुंचने में केवल 30,000 वर्ष लग सकते हैं, जो ब्रह्मांडीय समय के पैमाने पर बेहद कम माने जाते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में इस धंसने की प्रक्रिया को शुरू होने में 10 लाख से 30 लाख वर्ष तक का समय लग सकता है, और पूरी बर्फीली परत को पार करने में 50 लाख से 100 लाख वर्ष भी लग सकते हैं। लेकिन जहां बर्फ की परत कमजोर या अधिक क्षतिग्रस्त है, वहां यह प्रक्रिया कहीं अधिक तेज़ हो सकती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तंत्र लगभग हर स्थिति में काम कर सकता है, भले ही नमक की मात्रा कम या अधिक हो, बशर्ते सतह की बर्फ थोड़ी भंगुर हो। इस तरह, यह प्रक्रिया यूरोपा की सतह से नीचे महासागर तक रसायनों को पहुंचाने का एक तेज़ और प्रभावी माध्यम बन सकती है।

आने वाले वर्षों में इस रहस्य से और पर्दा उठने की उम्मीद है। नासा का ‘यूरोपा क्लिपर मिशन’, जिसे 2024 में लॉन्च किया गया था, अप्रैल 2030 में बृहस्पति की कक्षा में पहुंचेगा। चार वर्षों के इस मिशन के दौरान अंतरिक्ष यान यूरोपा के लगभग 50 बार बेहद नज़दीक से गुजरने वाला है। इससे वैज्ञानिकों को महासागर की गहराई मापने और यह आकलन करने में मदद मिलेगी कि यूरोपा वास्तव में जीवन के लिए कितना अनुकूल है।