नई दिल्ली:
आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक ज़्यादातर लोग मोबाइल फोन के साथ ही समय बिताते हैं। खासकर सोने से पहले फोन चलाना, सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना या मैसेज भेजना कई लोगों की आदत बन चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सोने से ठीक पहले स्क्रीन देखने की यह आदत आपकी नींद और सेहत दोनों को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा सकती है?
विशेषज्ञों के अनुसार, स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (ब्लू लाइट) हमारे दिमाग को यह संकेत देती है कि अभी दिन है। इससे शरीर में नींद के लिए ज़रूरी हार्मोन मेलाटोनिन का उत्पादन कम हो जाता है। नतीजतन, शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिदम बिगड़ जाती है और नींद आने में देरी होती है। कई शोध बताते हैं कि सोने से पहले केवल 20–30 मिनट तक स्क्रीन देखने से भी नींद आने का समय काफी बढ़ सकता है।
इतना ही नहीं, रात में लगातार स्क्रीन का इस्तेमाल करने से अनिद्रा (इंसोम्निया) की समस्या भी पैदा हो सकती है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली तेज़ रोशनी और दिमाग को उत्तेजित करने वाली सामग्री मन को शांत होने नहीं देती। ऐसे में व्यक्ति बिस्तर पर लेटे रहने के बावजूद नींद नहीं ले पाता और उसका दिमाग लंबे समय तक सक्रिय बना रहता है।
हालाँकि सोने से पहले स्क्रीन देखने से मस्तिष्क को सीधा नुकसान नहीं होता, लेकिन यह उसकी कार्य करने की क्षमता को ज़रूर प्रभावित करता है। अपर्याप्त और खराब गुणवत्ता वाली नींद से याददाश्त कमजोर होना, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, मूड खराब रहना और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होना जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं। लंबे समय तक ऐसा चलने पर कुछ लोगों में चिंता और तनाव की शिकायत भी बढ़ सकती है।
इसके अलावा, देर रात स्क्रीन देखने से आँखों में जलन और तनाव, सिरदर्द, थकान और अगले दिन सुस्ती महसूस होना आम समस्या है। यह आदत गहरी और आरईएम नींद को कम कर देती है, जिससे भले ही आप 7–8 घंटे सो लें, लेकिन नींद की गुणवत्ता खराब रहती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार खराब नींद से वजन बढ़ना, ब्लड शुगर का असंतुलन, उच्च रक्तचाप, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और तनाव बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। अच्छी नींद समग्र स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी है, इसलिए सोने से पहले स्क्रीन का सीमित उपयोग करना और डिजिटल डिटॉक्स अपनाना बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।






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