आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली
वंदे मातरम् केवल शब्दों का संयोजन नहीं है, यह भारत की आत्मा की धड़कन है। यह गीत समय, भाषा और संगीत की सीमाओं से परे जाकर भारतीय चेतना का प्रतीक बन चुका है। जब भी इसके शब्द गूंजते हैं, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, प्रेम और त्याग की भावना स्वतः जाग उठती है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह अमर कृति आरंभ में एक कविता मात्र थी, लेकिन कालांतर में यह भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अस्मिता की धुरी बन गई।
वंदे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल राजनीतिक या ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ। इसके शब्दों में धरती को माँ के रूप में देखने की वह दृष्टि है, जो भारतीय सभ्यता की मूल आत्मा रही है। यही कारण है कि यह गीत पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के हृदय में अपनी जगह बनाए हुए है।
संगीत ने वंदे मातरम् को एक नई उड़ान दी। रवींद्रनाथ टैगोर ने जब इसे स्वरबद्ध किया, तब यह एक आध्यात्मिक अनुभूति में परिवर्तित हो गया। टैगोर की धुन ने गीत को साधारण देशभक्ति से ऊपर उठाकर आत्मिक स्तर पर पहुँचा दिया। इसके बाद शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों ने इसे विभिन्न रागों में ढालकर इसकी भावनात्मक गहराई को और समृद्ध किया।
कभी यह गीत शांत, गंभीर और ध्यानमग्न स्वर में प्रस्तुत हुआ, तो कभी जोश, उत्साह और क्रांति की भावना के साथ। यही इसकी शक्ति है कि यह हर भाव, हर दौर और हर पीढ़ी के साथ खुद को ढाल लेता है। आधुनिक समय में नए वाद्यों और समकालीन संगीत शैलियों ने इसे नई पहचान दी, लेकिन इसकी आत्मा कभी बदली नहीं।
वंदे मातरम् की शास्त्रीय यात्रा भी उतनी ही समृद्ध रही। केसरबाई केरकर ने इसे राग खंबावती में गाकर जयपुर-अतरौली घराने की बारीकियों को उजागर किया। पं. पन्नालाल घोष ने राग मियां मल्हार में बांसुरी के माध्यम से इसे प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। पं. भीमसेन जोशी ने राग देश में इसे गाकर इसमें अद्भुत माधुर्य और ओज भर दिया।
1930 के दशक में विष्णु पंत पागन्स ने इसे राग सारंग में प्रस्तुत कर एक नया रंग दिया। पं. प्रेम कुमार मलिक की ध्रुपद शैली में प्रस्तुति ने इसे गंभीरता और गरिमा का प्रतीक बना दिया। देशदास, सत्या भूषण गुप्ता, भौनी चरण दास, केशवर राव भुले, मगुबाई करडिकर, वसंत देसाई जैसे असंख्य कलाकारों ने अपनी-अपनी शैली में इसे गाकर वंदे मातरम् को भारत की सामूहिक संगीत स्मृति का हिस्सा बना दिया।
फिल्मी और लोकप्रिय संगीत ने भी इस गीत को व्यापक जनमानस तक पहुँचाया। गायिका गीता दत्त द्वारा शुद्ध संस्कृत में गाया गया संस्करण आज भी अपनी विशुद्धता के लिए याद किया जाता है। दिलीप कुमार राय ने बंगाल और असम की लोक व शास्त्रीय धुनों के साथ प्रयोग कर इसे पूर्वी भारत की भावनाओं से जोड़ा। मदर टेरेसा के साथ उनके द्विगान ने इस गीत को मानवीय करुणा और सेवा से भी जोड़ा।
एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी द्वारा तमिल भाषा में गाया गया वंदे मातरम् भारतीय भाषाई एकता का अनुपम उदाहरण है। इसका तमिल अनुवाद राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने किया, जिन्होंने एक शब्दशः और एक सांस्कृतिक रूप से ढला हुआ संस्करण तैयार किया। यह दर्शाता है कि कैसे एक गीत विविध भाषाओं में ढलकर भी अपनी मूल भावना को बनाए रख सकता है।
भारती के ‘जय वंदे मातरम्’ को के.जे. यसुदास ने जिस ऊर्जा और उल्लास के साथ गाया, वह आज भी श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर देता है। मलयालम फिल्मों में इसका सामूहिक कोरस संस्करण यह सिद्ध करता है कि वंदे मातरम् केवल व्यक्तिगत भाव नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का गीत है।
भारतीय सिनेमा में वंदे मातरम् का प्रवेश भी ऐतिहासिक रहा। 1926 की फिल्म वंदे मातरम् आश्रम से लेकर 1952 की फिल्म आनंदमठ तक, इस गीत ने परदे पर राष्ट्रभाव को जीवंत किया। हेमंत मुखर्जी द्वारा संगीतबद्ध आनंदमठ का संस्करण आज भी अमर माना जाता है। लता मंगेशकर की आवाज़ ने इसे अमरत्व प्रदान किया।
समय के साथ यह गीत ऑल इंडिया रेडियो, स्कूल की प्रार्थनाओं, राष्ट्रीय समारोहों और जन आंदोलनों का अभिन्न हिस्सा बन गया। 1997 में ए.आर. रहमान ने स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर वंदे मातरम् का जो आधुनिक संस्करण प्रस्तुत किया, उसने इस गीत को वैश्विक मंच पर पहुँचा दिया। शास्त्रीय रागों और आधुनिक बीट्स के संगम ने नई पीढ़ी को इस गीत से जोड़ा।
आज भी यह गीत स्टेडियमों में खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाता है, सैनिकों का मनोबल ऊँचा करता है और आम नागरिकों को एक सूत्र में बाँधता है। विभिन्न भाषाओं में, विभिन्न स्वरों में, विभिन्न भावों के साथ वंदे मातरम् आज भी गूंज रहा है।
डेढ़ सौ वर्षों बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। जहाँ ‘जन गण मन’ भारत का औपचारिक राष्ट्रगान है, वहीं वंदे मातरम् उसकी आत्मा है। इसकी महानता इसी में है कि हर भारतीय ने इसे अपनी आवाज़, अपनी भावना और अपने अनुभव से जोड़ा है। वंदे मातरम् की यह संगीत यात्रा भारत की सांस्कृतिक विरासत, एकता और राष्ट्रप्रेम का अमर प्रतीक बन चुकी है।