दरगाहों में बसंत मनाने की परंपरा गहरे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी हुई है। सूफी संतों ने धर्म को केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे प्रेम, इंसानियत और सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश बनाया। उनके लिए आध्यात्मिकता का अर्थ था,मानवता की सेवा और दिलों को जोड़ना। बसंत जैसे सांस्कृतिक उत्सवों के माध्यम से सूफी परंपरा ने ऐसे मंच तैयार किए, जहाँ धर्म, जाति और सामाजिक भेदभाव स्वतः ही गौण हो जाते थे।

बसंत ऋतु स्वयं में नवजीवन, आशा और उल्लास का प्रतीक है। प्रकृति के नवसृजन के साथ जुड़ा यह पर्व जब दरगाहों में मनाया जाता है, तो इसका सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व और भी गहरा हो जाता है। इन अवसरों पर हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ एकत्र होते हैं, फूल चढ़ाते हैं, चादर पेश करते हैं और दुआ में शामिल होते हैं। यह दृश्य भारत की उस परंपरा को दर्शाता है, जहाँ आस्था लोगों को बाँटने के बजाय जोड़ती है।
भारत की साझा संस्कृति की विशेषता यह रही है कि यहाँ धार्मिक परंपराएँ एक-दूसरे से संवाद करती रही हैं। दरगाहों में बसंत का आयोजन इसी सांस्कृतिक संवाद का उदाहरण है। यह बताता है कि भारत में अध्यात्म कभी संकीर्ण नहीं रहा, बल्कि उसने सदैव समावेशी और मानवीय स्वरूप अपनाया। ऐसे उत्सव इस विचार को मजबूत करते हैं कि धर्म का मूल उद्देश्य प्रेम और एकता है, न कि विभाजन।
दरगाहें सदियों से शांति और सद्भाव के केंद्र रही हैं। अजमेर शरीफ जैसी प्रसिद्ध दरगाहों से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित सूफी संतों की मजारें, हर वर्ग और हर पृष्ठभूमि के लोगों के लिए खुली रही हैं। यहाँ न तो किसी की धार्मिक पहचान पूछी जाती है और न ही सामाजिक हैसियत। बसंत के अवसर पर इन स्थलों पर उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि साझा परंपराएँ सामाजिक रिश्तों को मजबूत करती हैं और साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देती हैं।
वर्तमान समय में, जब धार्मिक मतभेदों को राजनीतिक और सामाजिक स्वार्थों के लिए उभारा जा रहा है, तब दरगाहों में बसंत का आयोजन और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह परंपरा असहिष्णुता के विरुद्ध एक शांत लेकिन सशक्त संदेश देती है। यह याद दिलाती है कि भारत की सभ्यतागत शक्ति उसकी विविधताओं को स्वीकार करने और उन्हें उत्सव के रूप में मनाने की क्षमता में निहित है।

भारत को अक्सर एक अमूल्य माला के रूप में देखा जाता है, जिसमें विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के मोती गूंथे हुए हैं। दरगाहों में बसंत का उत्सव उसी माला का एक अनमोल मोती है, जो देश की सांस्कृतिक समृद्धि को और अधिक उजागर करता है। यही परंपराएँ भारत को वैश्विक मंच पर एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्थापित करती हैं, जहाँ बहुलता कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है।
दरगाहों में बसंत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक सांस्कृतिक विरासत है। यह परंपरा यह संदेश देती है कि इंसान की पहचान किसी एक धार्मिक लेबल से नहीं, बल्कि उसकी मानवता और सामूहिक सहभागिता से होती है। यही दर्शन भारत की एकता को सदियों से बनाए हुए है, चाहे समय कितना ही चुनौतीपूर्ण क्यों न रहा हो।

जब तक दरगाहों में बसंत जैसे उत्सव मनाए जाते रहेंगे, तब तक भारत की साझा संस्कृति की आत्मा जीवित रहेगी। ये परंपराएँ प्रेम, शांति और सह-अस्तित्व के उन मूल्यों की सजीव गवाह हैं, जो इस देश की आत्मा को परिभाषित करते हैं। दरगाहों में खिलता बसंत केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि उस उम्मीद का प्रतीक है, जिसमें भारत की विविधता एकता में बदल जाती है।





