आज़ाद हिंद फ़ौज: जहाँ राष्ट्र धर्म से बड़ा था

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 23-01-2026
Azad Hind Fauj: Where the nation was greater than religion.
Azad Hind Fauj: Where the nation was greater than religion.

 

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साक़िब सलीम

“हम सब भाईयों की तरह रहते थे… हमने यह सिद्ध कर दिया कि अंग्रेज़ों की अनुपस्थिति में हिंदू-मुसलमान का कोई सवाल ही नहीं था।”ये शब्द जनरल शाहनवाज़ ख़ान ने दिल्ली के लाल क़िले में हुए ऐतिहासिक आईएनए ट्रायल के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहे थे।

सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आज़ाद हिंद फ़ौज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अधिकांश आंदोलनों से इस अर्थ में भिन्न थी कि इसके सदस्यों ने अपने धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र से ऊपर भारतीय राष्ट्र को रखा। अन्य कई संगठनों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष में धर्म, जाति या भाषा का सहारा लिया। जमीयत-ए-उलेमा, हिंदू महासभा और यहाँ तक कि महात्मा गांधी ने भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध धार्मिक तर्कों का उपयोग किया। इसके विपरीत, आज़ाद हिंद फ़ौज ने स्वतंत्रता की लड़ाई बिना किसी ऐसे प्रतीक के लड़ी।
 
सुभाष के सचिव आबिद हसन के शब्दों में,“किसी ने हमसे यह नहीं कहा कि हम तमिल या डोगरा, पंजाबी मुसलमान या बंगाली ब्राह्मण, सिख या आदिवासी होना छोड़ दें। हम यह सब थे और शायद पहले से भी अधिक प्रबल रूप में, लेकिन ये पहचानें व्यक्तिगत हो गईं।
 
हम ऐसे समूहों से जुड़ना छोड़ चुके थे, क्योंकि भारत हमारा लक्ष्य बन गया था और उसे महान बनाने का संकल्प हमारा उद्देश्य। अलग-अलग समूहों में हम कुछ नहीं थे, लेकिन जैसे ही हम समग्र का हिस्सा बने, हमारा अस्तित्व मायने रखने लगा।”
 
सुभाष के नेतृत्व वाली आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार और उसकी सेना आज़ाद हिंद फ़ौज को कभी समुदायों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न का सामना नहीं करना पड़ा,जबकि यही मुद्दा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच तीखी बहस का विषय था।
 
इसका कारण सुभाष का यह विश्वास था:“हमारी आपत्ति इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कार्यकारी परिषद में मुसलमानों को बहुमत मिले। असली प्रश्न यह है कि किस प्रकार के मुसलमान वहाँ आएँगे। यदि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, आसफ़ अली और रफ़ी अहमद किदवई जैसे मुसलमान हों, तो भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा। मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि ऐसे देशभक्तों को पूरी स्वतंत्रता देना ही उचित है। एक देशभक्त हिंदू और एक देशभक्त मुसलमान में कोई अंतर नहीं है।”
 
सुभाष चंद्र बोस और आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार ने ऐसे भारतीय राष्ट्र का मॉडल प्रस्तुत किया जहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाई समूहों के लोग सामंजस्य के साथ रह सकें। यहाँ मुसलमान सरकार और सेना का हिस्सा ‘प्रतिनिधित्व’ के कारण नहीं, बल्कि इसलिए थे क्योंकि वे भारतीय नागरिक थे। मेरा मानना है कि आज़ाद हिंद फ़ौज के वे सैनिक यदि यह देखें कि 2026 में कोई उन्हें ‘मुसलमान’ के रूप में वर्गीकृत कर रहा है, तो वे अपनी क़ब्रों में भी बेचैन हो उठेंगे।
 
इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि सुभाष चंद्र बोस का भारतीय राष्ट्र का सपना क्या था, उनके साथ कौन-से मुसलमान थे और भारत को लेकर उनकी सोच क्या थी।
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आबिद हसन सफ़रानी

सुभाष चंद्र बोस का एक अत्यंत साहसिक कारनामा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी से जापान तक 90 दिनों की पनडुब्बी यात्रा करना था। इस यात्रा में उनके साथ थे आबिद हसन एक इंजीनियरिंग स्नातक, जिनसे सुभाष की मुलाक़ात जर्मनी में हुई थी और जिन्हें उन्होंने अपना निजी सचिव बनाया।
 
इस प्रकार सुभाष और आबिद पनडुब्बी यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने। इसी यात्रा के दौरान भविष्य की आईएनए की योजनाएँ बनीं,महिला सैनिक दल के गठन और दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीयों की भर्ती का निर्णय यहीं हुआ। इस पूरे दौर में आबिद, सुभाष की परछाईं की तरह साथ रहे।
 
लोकप्रिय विमर्श में आबिद को ‘जय हिंद’ का नारा गढ़ने और ‘जन गण मन’ के शब्दों को संशोधित कर आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार का राष्ट्रगान बनाने के लिए जाना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने इंफाल मोर्चे पर आईएनए का नेतृत्व किया,जो युद्ध के सबसे घातक मोर्चों में से एक था। वे 1985 में अपने निधन तक आज़ाद हिंद फ़ौज के आदर्शों का प्रचार करते रहे।
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अब्दुल हबीब यूसुफ़ मरफ़ानी

अब्दुल हबीब यूसुफ़ मरफ़ानी रंगून में बसे एक समृद्ध गुजराती व्यापारी थे। 1943 में आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार के गठन के बाद वे नियमित रूप से दो-तीन लाख रुपये का दान देते रहे। 9 जुलाई 1944 को एक सार्वजनिक सभा में सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर उन्होंने अपनी सारी ज्वेलरी, संपत्ति के काग़ज़ात और नक़द राशि एक चाँदी की थाली में रखकर सुभाष को अर्पित कर दी।
 
उस समय इसकी क़ीमत लगभग एक करोड़ रुपये आँकी गई। सब कुछ दान करने के बाद उन्होंने स्वयं के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज की खाकी वर्दी माँगी। नेताजी ने उन्हें ‘तमगा-ए-सेवक-ए-हिंद’ से सम्मानित करते हुए कहा,“कुछ लोग कहते हैं कि हबीब पागल हो गया है। मैं कहता हूँ-हाँ, और मैं चाहता हूँ कि हर भारतीय पागल हो जाए। अपने देश, अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और विजय के लिए हमें ऐसे ही स्त्री-पुरुषों की आवश्यकता है।”
 
कैप्टन मोहम्मद अकरम

क्या हम जानते हैं कि आईएनए के पहले शहीद कौन थे? ग्यानी केसर सिंह ने लिखा,“आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन जितरा में हुआ। कैप्टन मोहन सिंह को जी.ओ.सी. बनाया गया। इतिहास में पहली बार ‘आज़ाद हिंदुस्तान ज़िंदाबाद’ और ‘आज़ाद हिंद फ़ौज ज़िंदाबाद’ के नारे गूँजे। कैप्टन मोहम्मद अकरम ख़ान और जमादार साधु सिंह 15 जनवरी 1942 को सबसे पहले आईएनए में शामिल हुए।”
 
13 मार्च 1942 को अकरम अन्य नेताओं के साथ एक सम्मेलन के लिए टोक्यो जा रहे थे, जब उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सभी शहीद हो गए। कर्नल नरंजन सिंह गिल ने उन्हें “आंदोलन के पहले शहीद” कहा।
 
सुल्ताना सलीम

सुल्ताना सलीम नेताजी के आह्वान पर आईएनए की रानी झाँसी रेजीमेंट में शामिल हुईं। युद्ध के दौरान उन्होंने कैप्टन सलीम से विवाह किया। युद्ध के बाद वे युद्धबंदी के रूप में भारत लौटीं। इंडियन एक्सप्रेस (22 फ़रवरी 1946) ने लिखा,“उनके लिए केवल एक देश था—हिंदुस्तान और केवल एक क़ौम-हिंदुस्तानी।”
 
fलेफ्टिनेंट कर्नल एहसान क़ादिर

जनरल मोहन सिंह ने आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन के समय एहसान क़ादिर को आज़ाद हिंद रेडियो का निदेशक नियुक्त किया। 1943 में जब रास बिहारी बोस ने आंदोलन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंपा, तब क़ादिर ने आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार में सैन्य सचिव के रूप में कार्यभार संभाला।   
 
उन्होंने 30,000 से अधिक सदस्यों वाले स्वयंसेवी समूह और आज़ाद हिंद दल का नेतृत्व भी किया। हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए एक साम्प्रदायिक सौहार्द परिषद का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष क़ादिर बनाए गए। इस परिषद ने सुनिश्चित किया कि आज़ाद हिंद फ़ौज में धार्मिक मतभेद न पनपें। नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु की खबर मिलने पर क़ादिर ने इस पर विश्वास नहीं किया और उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया।

fकर्नल शौकत अली मलिक

शौकत अली मलिक ब्रिटिश साम्राज्य से जीतकर किसी भारतीय भूभाग पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने वाले पहले भारतीय थे।
 
उन्होंने यह उपलब्धि 14 अप्रैल 1944 को आज़ाद हिंद फ़ौज की बहादुर ग्रुप के कमांडर के रूप में हासिल की। उन्होंने मणिपुर के मोइरांग में सशस्त्र बलों का नेतृत्व कर विजय प्राप्त की और वहाँ एक असैनिक सरकार स्थापित की।
 
ध्वज फहराने के बाद उन्होंने कहा,“भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) अब भारत-बर्मा सीमा पार कर चुकी है और ब्रिटिश जुए से भारतवासियों की मुक्ति के संघर्ष में हम मणिपुर के प्राचीन दुर्ग मोइरांग तक पहुँच चुके हैं।
 
हमारी प्रतिबद्धता दिल्ली तक मार्च करने और लाल क़िले पर तिरंगा फहराने की है। मोइरांग तक पहुँचने में हमारे अनेक साथी शहीद हुए और दिल्ली की राह में भी अनेक बलिदान होंगे। किंतु भारत की पवित्र भूमि से शत्रु को निकाल बाहर करना हमारे लिए अनिवार्य है… भारत की स्वतंत्रता बहुत निकट है। हम इसे प्राप्त करेंगे और इसके बाद भारत के लोगों के लिए प्रगति और समृद्धि आएगी।”
 
शौकत ने 15 जुलाई 1944 तक मोइरांग में सरकार का संचालन किया, जिसके बाद युद्ध में INA को पीछे हटना पड़ा। उनकी वीरता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें आज़ाद हिंद फ़ौज का सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘तमग़ा-ए-सरदार-ए-जंग’ प्रदान किया।
 
fमेजर जनरल शाह नवाज़ ख़ान
 
शाह नवाज़ ख़ान INA के सबसे प्रसिद्ध चेहरों में से एक थे। युद्ध के बाद जब INA के सैनिकों पर लाल क़िले में मुकदमा चला, तो वे ढिल्लों और सहगल के साथ INA के प्रमुख प्रतिनिधि बने। वे आज़ाद हिंद फ़ौज के उन दो कमांडरों में से एक थे जिन्होंने अराकान, नागालैंड और अन्य सीमांत क्षेत्रों में सेना का नेतृत्व किया।
 
बाद में उन्होंने INA में मुसलमानों की भूमिका और सुभाष चंद्र बोस के उनके प्रति दृष्टिकोण पर लिखा,“उन्होंने (सुभाष ने) अपने सैनिकों को यह एहसास कराया कि वे सभी एक ही मातृभूमि की संतान हैं, इसलिए उनके बीच कोई भेदभाव नहीं हो सकता।
 
हम सभी पूरी तरह एकजुट थे और हमें यह समझ आ गया था कि हमारे देश में साम्प्रदायिक विभाजन विदेशी सत्ता की देन है। इसकी सफलता का प्रमाण यह है कि नेताजी के सबसे प्रबल समर्थक और प्रशंसक मुसलमानों में पाए जाते थे। नेताजी हर व्यक्ति का सम्मान उसके गुणों के आधार पर करते थे, न कि उसके धर्म या प्रांत के आधार पर।
 
यह आश्चर्यजनक है कि जब नेताजी ने जर्मनी से एक अधिकारी को पनडुब्बी द्वारा टोक्यो की अपनी अत्यंत जोखिमभरी यात्रा में साथ ले जाने के लिए चुना, तो उनकी  एक पसंदमुसलमान  आबिद हुसैन  पर पड़ी।
फिर जब उनकी सेनाओं को युद्ध मोर्चे पर भेजा गया, तो दोनों डिविजनल कमांडर मुसलमान थे - मेजर जनरल एम. ज़ेड. कियानी और मैं।
 
अगस्त 1945 में जब वे अपनी अंतिम टोक्यो यात्रा के लिए विमान से गए, तो उन्होंने कर्नल हबीबुर रहमान को अपने साथ चुना। यह भावना केवल सेना तक सीमित नहीं थी। नागरिकों में भी नेताजी के कुछ सबसे बड़े समर्थक मुसलमान थे। रंगून के एक समृद्ध व्यापारी श्री हबीब ने नेताजी के एक हार के लिए अपनी लगभग एक करोड़ रुपये की पूरी संपत्ति दान कर दी।
 
इन्हीं तथ्यों के कारण हम, आज़ाद हिंद फ़ौज के लोग, यह मानने से इनकार करते हैं कि सभी भारतीय एकजुट होकर भाई-बहनों की तरह नहीं रह सकते और एक महान, स्वतंत्र और एकीकृत भारत के निर्माण के लिए कार्य नहीं कर सकते।”
 
dकर्नल महबूब अहमद

महबूब अहमद ने 1943 में सिंगापुर में सुभाष चंद्र बोस का भाषण सुनने के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज में प्रवेश किया। वे कहा करते थे,“मेरा केवल एक ही जन्म है। यदि मेरे हज़ार जन्म होते, तो मैं वे सभी सुभाष चंद्र बोस के उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वेच्छा से समर्पित कर देता।”
 
उन्होंने अराकान और इम्फाल अभियानों के दौरान शाह नवाज़ ख़ान के सलाहकार के रूप में कार्य किया। सुभाष ने उन्हें सैन्य सचिव तथा आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार और आज़ाद हिंद फ़ौज के बीच संपर्क अधिकारी नियुक्त किया।
 
कर्नल हबीब-उर-रहमान
 
कर्नल हबीब-उर-रहमान जनरल मोहन सिंह के साथ आज़ाद हिंद फ़ौज के सह-संस्थापक थे। वे मुख्यालय में प्रशासन शाखा के प्रभारी बने। सुभाष चंद्र बोस द्वारा आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व संभालने के बाद उन्हें प्रशिक्षण विद्यालय का प्रभारी नियुक्त किया गया। 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद सरकार के गठन पर उन्होंने मंत्री के रूप में शपथ ली। बाद में वे उप-सेनाध्यक्ष भी बने और 18 अगस्त 1945 को नेताजी की अंतिम ज्ञात उड़ान में उनके साथ थे।
 
मेजर जनरल मोहम्मद ज़मान ख़ान कियानी

जनरल मोहन सिंह द्वारा आज़ाद हिंद फ़ौज के गठन के समय मोहम्मद ज़मान ख़ान कियानी चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ बने। सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व संभालने के बाद उन्हें मंत्री और आज़ाद हिंद फ़ौज की प्रथम डिवीजन का कमांडर नियुक्त किया गया। उनके अधीन तीन रेजिमेंट थीं - नेहरू, आज़ाद और गांधी। उन्होंने बर्मा मोर्चे पर INA का नेतृत्व किया। जब नेताजी हबीब के साथ सिंगापुर से अपनी अंतिम ज्ञात उड़ान पर रवाना हुए, तब कियानी को सेनाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया।
 
करीम ग़नी और डी. एम. ख़ान

करीम ग़नी और डी. एम. ख़ान आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद सरकार के छह सलाहकारों में से दो थे। उनका पद वरिष्ठों का था, जो सरकार को परामर्श देते थे। इन सलाहकारों में रास बिहारी बोस भी शामिल थे।आज़ाद हिंद फ़ौज में पचास से अधिक सैनिकों को वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार थे - तमग़ा-ए-सरदार-ए-जंग, तमग़ा-ए-वीर-ए-हिंद, तमग़ा-ए-बहादुरी, तमग़ा-ए-शत्रु-नाश और सनद-ए-बहादुरी। कई मुस्लिम सैनिकों को नेताजी द्वारा ये सम्मान प्रदान किए गए।
 
तमग़ा-ए-सरदार-ए-जंग

कर्नल एस. ए. मलिक
मेजर सिकंदर ख़ान
मेजर आबिद हुसैन
कैप्टन ताज मोहम्मद
 
तमग़ा-ए-वीर-ए-हिंद

लेफ्टिनेंट अशरफ़ी मंडल
लेफ्टिनेंट इनायत उल्लाह
 
तमग़ा-ए-बहादुरी

हवलदार अहमद दीन
हवलदार दीन मोहम्मद
हवलदार हकीम अली
हवलदार गुलाम हैदर शाह
 
तमग़ा-ए-शत्रु-नाश

हवलदार पीर मोहम्मद
हवलदार हकीम अली
नाइक फ़ैज़ मोहम्मद
सिपाही गुलाम रसूल
नाइक फ़ैज़ बख़्श
 
सनद-ए-बहादुरी

हवलदार अहमद-उद-दीन
हवलदार मोहम्मद आघार
हवलदार गुलाब शाह
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यह सूची सीमित है और इसमें बशीर अहमद और मुनव्वर हुसैन जैसे कई नाम शामिल नहीं हैं, जो आज़ाद हिंद सरकार के मंत्री थे; अज़ीज़ अहमद ख़ान और इनायत कियानी, जो आज़ाद हिंद फ़ौज की तीन में से दो रेजिमेंटों के कमांडर थे; नज़ीर अहमद, जो नेताजी पर हुए एक हमले को विफल करते हुए शहीद हो गए; या शेख़ मोहम्मद, जिन्होंने वियतनाम में इंडिया इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व किया। वास्तव में, सभी नामों को लिख पाना संभव नहीं है।
 
INA और सुभाष चंद्र बोस के इतिहास का यह अध्ययन दर्शाता है कि भारतीय राष्ट्रवाद के नाम पर एकजुट हो सकते हैं। यह एक समन्वयात्मक भारत की परिकल्पना प्रस्तुत करता है, जहाँ भारतीयों का मूल्यांकन उनके धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी प्रतिभा और राष्ट्र-प्रेम के आधार पर किया जाता है।