Republic Day 2026: धर्मनिरपेक्षता की नींव रखने वाले मुस्लिम सदस्य और संविधान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 26-01-2026
Republic Day 2026: The historical contribution of the Muslim community in the making of the Indian Constitution.
Republic Day 2026: The historical contribution of the Muslim community in the making of the Indian Constitution.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

गणतंत्र दिवस भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जब 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ और देश एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ। यह उपलब्धि केवल किसी एक समुदाय या विचारधारा का परिणाम नहीं थी, बल्कि आज़ादी के बाद नए भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए सभी धर्मों, वर्गों और क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की साझी भागीदारी का प्रतीक थी। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में मुस्लिम आलिमों, शिक्षाविदों, प्रशासकों और स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान न केवल उल्लेखनीय रहा, बल्कि संविधान की समावेशी आत्मा को मजबूती देने वाला भी सिद्ध हुआ।

Republic Day 2026: Dented Republic, Battered Citizen, Determined People

साझा सपनों का दस्तावेज़: भारतीय संविधान

26 जनवरी 1950 को लागू हुआ भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक दासता से मुक्त होकर नए भारत के सपनों, संघर्षों और साझा विरासत का घोषणापत्र था। संविधान सभा में देश के विभिन्न धर्मों, भाषाओं, प्रांतों और सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व मौजूद था। मुस्लिम समुदाय के कई प्रतिष्ठित विद्वान, प्रशासक और राजनेता इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद: धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता की वैचारिक धुरी

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री और संविधान सभा के प्रभावशाली सदस्यों में से एक थे। वे महान इस्लामी विद्वान, प्रख्यात पत्रकार और स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता थे। संविधान निर्माण के दौरान उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और आधुनिक, वैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली की ज़ोरदार वकालत की। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में निहित है और राज्य का कोई धर्म नहीं हो सकता। संविधान की मूल भावना में उनके विचार स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।

भारत के महान सपूत: डॉ. जाकिर हुसैन (1897-1969)

डॉ. ज़ाकिर हुसैन: शिक्षा और नैतिक मूल्यों के पक्षधर

प्रख्यात शिक्षाविद् और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापक डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने संविधान सभा में शिक्षा, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े विषयों पर गहन सुझाव दिए। उनका मानना था कि लोकतंत्र की सफलता शिक्षित और नैतिक नागरिकों पर निर्भर करती है। बाद में वे भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने, लेकिन संविधान निर्माण में उनका योगदान शिक्षा को लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में स्थापित करने में अहम रहा।

संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थी बेगम रसूल, कहा था, देशभक्ति  और धर्म को एकसाथ करना अनुचित

बेगम एजाज़ रसूल: अल्पसंख्यक और महिला अधिकारों की निर्भीक आवाज़

बेगम एजाज़ रसूल संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। वे अल्पसंख्यक अधिकार उपसमिति की सदस्य भी रहीं। उन्होंने पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) का मुखर विरोध करते हुए इसे अल्पसंख्यकों के लिए ‘आत्म-विनाशकारी हथियार’ बताया। उन्होंने समान नागरिकता और राष्ट्रीय एकता की वकालत की। मुस्लिम नेतृत्व को आरक्षित सीटों की मांग स्वेच्छा से छोड़ने के लिए सहमत कराने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही।

संविधान मसौदा समिति के मुस्लिम सदस्य कौन थे?

सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला: मसौदा समिति का सशक्त स्तंभ

संविधान मसौदा समिति के आठ प्रमुख सदस्यों में शामिल सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला ब्रिटिश भारत में असम के प्रधानमंत्री रह चुके थे। वे प्रख्यात बैरिस्टर और अनुभवी प्रशासक थे। जब संविधान के मसौदे को कुछ सदस्यों ने ‘पैच वर्क’ कहकर आलोचना की, तब सादुल्ला ने इसे पूरी दृढ़ता से बचाया। उन्होंने कहा कि दुनिया के प्राचीन और आधुनिक संविधानों के सर्वोत्तम तत्वों को समाहित कर एक व्यापक और व्यावहारिक दस्तावेज़ तैयार किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान कोई अंतिम शब्द नहीं, बल्कि समय के साथ संशोधन योग्य जीवंत दस्तावेज़ है।

सर सादुल्ला ने राज्यपाल की भूमिका, केंद्र-प्रशासित क्षेत्रों, जूट उत्पादन, निर्यात शुल्क, चाय बागान और अल्पसंख्यक अधिकारों पर अहम सुझाव दिए। अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के प्रश्न पर उन्होंने जयपाल मुंडा का पुरज़ोर समर्थन किया और अंग्रेज़ी शासन द्वारा ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ कहकर उपेक्षित की गई जनजातियों के अधिकारों की वकालत की।

हुसैन इमाम और अन्य सदस्य: संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक संतुलन

बिहार से हुसैन इमाम और सैयद जाफर इमाम जैसे नेताओं ने संवैधानिक नैतिकता, संसदीय प्रणाली और कानून के शासन पर जोर दिया। मौलाना हिफ़ज़ुर्रहमान सेहरवी, हसरत मोहानी, जेड.एच. लारी, बशीर हुसैन जैदी, नवाब मोहम्मद इस्माइल खान, रफी अहमद किदवई सहित कई मुस्लिम सदस्यों ने संविधान को व्यापक और समावेशी स्वरूप देने में योगदान दिया।

प्रांतीय प्रतिनिधित्व में मुस्लिम आलिमों की भागीदारी

संविधान सभा में मद्रास से शेख गालिब साहिब, एम. मोहम्मद इस्माइल, के.टी.एम. अहमद इब्राहिम, बॉम्बे से अब्दुल कादर मोहम्मद शेख, बंगाल से जसीमुद्दीन अहमद, नज़ीरुद्दीन अहमद, असम से अब्दुर रौफ, जम्मू-कश्मीर से शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, मिर्ज़ा अफ़ज़ल बेग और त्रावणकोर से पी.टी. मोहम्मद जैसे कई मुस्लिम आलिम और नेता शामिल थे।

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गोवंश संरक्षण और हिंदू अधिकारों पर समर्थन

संविधान सभा की बहसों में मुस्लिम सदस्यों ने हिंदू अधिकारों के पक्ष में भी खुलकर अपनी राय रखी। 24 नवंबर 1948 की बहस में सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला और जहीर-उल-हसन लारी ने गोवंश संरक्षण के पक्ष में संवैधानिक प्रावधान की वकालत की, जो उस दौर में सामाजिक समरसता का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

साझा भविष्य की नींव

26 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान का मसौदा राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपा। इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी थे। इसी कारण 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है।

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गणतंत्र दिवस का संदेश

वर्ष 2026 के गणतंत्र दिवस की थीम ‘वंदे मातरम्’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ हमें याद दिलाती है कि आत्मनिर्भरता और राष्ट्रभक्ति की नींव उसी संविधान पर टिकी है, जिसे सभी समुदायों ने मिलकर गढ़ा। गणतंत्र दिवस केवल परेड और उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उस साझा इतिहास को स्मरण करने का दिन है, जिसमें मुस्लिम आलिमों और नेताओं ने भी भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाई।