कर्नाटक ने कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी पर जताई चिंता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 01-10-2026
Karnataka flags 10 to 52 times markup on cancer drugs, consumables; seeks Centre's intervention
Karnataka flags 10 to 52 times markup on cancer drugs, consumables; seeks Centre's intervention

 

बेंगलुरु (कर्नाटक) 
 
कर्नाटक सरकार ने अस्पतालों को सप्लाई की जाने वाली महंगी दवाओं और मेडिकल सामान की 'लैंडिंग कॉस्ट' (अस्पताल तक पहुँचने की लागत) और 'अधिकतम खुदरा मूल्य' (MRP) के बीच भारी अंतर की ओर ध्यान दिलाया है और केंद्र सरकार से दखल देने की मांग की है। खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन आयुक्त कार्यालय द्वारा 1 अक्टूबर को जारी एक प्रेस नोट में सरकार ने कहा कि कैंसर का इलाज करने वाले अस्पतालों में हाल ही में की गई जांच में कीमतों में चौंकाने वाली गड़बड़ियां पाई गई हैं, जहां महंगी दवाओं का इस्तेमाल होता है।
 
कर्नाटक खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन की जांच में पाया गया कि दवा कंपनियां अस्पतालों को भारी छूट वाली 'संस्थागत कीमतों' (institutional prices) पर दवाएं सप्लाई कर रही हैं, जबकि मरीजों से छपी हुई MRP या उसके आसपास की कीमत वसूली जा रही है। इसके परिणामस्वरूप, असल खरीद लागत की तुलना में कीमतें 10 गुना से लेकर 52 गुना तक ज़्यादा हैं। इसके आधार पर, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री ने 23 सितंबर, 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर मरीजों से बहुत ज़्यादा कीमत वसूलने के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की मांग की है। जांच के दौरान, ऐसी 253 दवाओं की सूची बनाई गई है जिनकी कीमतों में भारी अंतर पाया गया।
 
कर्नाटक सरकार ने केंद्र से पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कहा है। इसके लिए अस्पतालों को मरीजों के बिल पर लैंडिंग कॉस्ट और MRP दोनों दिखाने होंगे, 'ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' (DPCO) के तहत कीमत नियंत्रण वाली दवाओं की सूची बढ़ानी होगी, ज़रूरी महंगी दवाओं और सामान पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करना होगा, अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समूह बनाना होगा, राष्ट्रीय डेटा अध्ययन का निर्देश देना होगा, DPCO 2013 में संशोधन करना होगा, ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाना होगा, लागत-से-MRP पारदर्शिता को अनिवार्य करना होगा, 'आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची' का विस्तार करना होगा, खरीद लागत के हिस्से के रूप में सभी प्रकार के 'बैक-एंड कंसीडरेशन' (जैसे कि बाद में मिलने वाली छूट या लाभ) को शामिल करना होगा, और एक ऑडिट और प्रवर्तन तंत्र बनाना होगा।
 
फिलहाल, DPCO के तहत आने वाली 'शेड्यूल्ड दवाओं' (सूचीबद्ध दवाओं) के लिए, NPPA 16 प्रतिशत रिटेलर मार्जिन के साथ एक अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) तय करता है। 'नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं' (गैर-सूचीबद्ध दवाओं) के लिए, रिटेलर मार्जिन पर कोई सीमा नहीं है और निर्माता द्वारा छापी गई MRP ही एकमात्र सीमा है। मेडिकल डिवाइस और सामान के लिए, कीमत पर सीमित नियंत्रण है और ज़्यादातर डिवाइस DPCO के दायरे में नहीं आते हैं। अस्पताल की फार्मेसियों के लिए, ऐसा कोई खास नियम नहीं है जो अस्पतालों को मिलने वाली संस्थागत छूट का लाभ मरीजों तक पहुंचाना अनिवार्य बनाता हो। मंत्री के निर्देश पर, FDA ड्रग्स एनफोर्समेंट अधिकारियों ने 25 और 26 सितंबर, 2026 को बेंगलुरु और कर्नाटक के ज़िलों में कई थोक विक्रेताओं, अस्पतालों और अन्य जगहों पर एक स्पेशल वेरिफिकेशन ड्राइव चलाई।
 
शुरुआती जांच से पता चला है कि लैंडिंग कॉस्ट, MRP और असल बिक्री कीमत में काफ़ी अंतर है। इस जांच में 768 से ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली चीज़ें और 189 महंगी दवाएं शामिल थीं। इस बात की जानकारी केंद्र सरकार को दी जाएगी। विभाग इस स्पेशल वेरिफिकेशन ड्राइव को चरणों में जारी रखेगा। अगले चरण में एंटी-रेट्रोवायरल दवाएं, नई पीढ़ी की और गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक्स, मेडिकल डिवाइस और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली ऐसी चीज़ों पर ध्यान दिया जाएगा जिनका मरीज़ों पर काफ़ी आर्थिक असर पड़ता है।
 
फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर ने कहा कि सरकार अस्पतालों और दवा कंपनियों से यह भी उम्मीद करती है कि वे बिलिंग में पूरी पारदर्शिता बनाए रखें।
प्रेस नोट में कहा गया है कि ज़रूरी और जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवाओं का किफायती होना जनता के लिए बहुत ज़रूरी है, और कर्नाटक सरकार मरीज़ों को बेवजह के आर्थिक बोझ से बचाने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र में सभी ज़रूरी कदम उठाएगी।