नई दिल्ली।
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में संक्रामक बीमारियों के कारण 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत की खबर पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने गहरी चिंता जताई है। संगठन के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि यह घटना दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, पोषण और बीमारी की निगरानी से जुड़ी गंभीर कमियों को सामने लाती है। उन्होंने स्थिति से निपटने के लिए तत्काल, संवेदनशील और निरंतर कदम उठाने की मांग की।
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि सबसे चिंताजनक बात यह है कि कथित तौर पर कुछ गांवों में बच्चों की मौत के बाद ही पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं पहुंच पाईं। उन्होंने कहा कि आशा कार्यकर्ताओं के रिक्त पद, मेडिकल स्टाफ की कमी और समय पर इलाज उपलब्ध नहीं होने के कारण घरों में बच्चों की मौत की खबरें सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
उन्होंने बताया कि बालाघाट में आशा कार्यकर्ताओं के 72 पद रिक्त बताए जा रहे हैं, जिनमें 48 अकेले बिरसा ब्लॉक में हैं। उन्होंने इन परिस्थितियों की पारदर्शी समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल जिम्मेदारी तय करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पता लगाना भी जरूरी है कि स्वास्थ्य व्यवस्था कहां और क्यों विफल हुई, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने आदिवासी परिवारों के पारंपरिक या आस्था आधारित उपचार पर निर्भर रहने के लिए उन्हें दोषी ठहराने से भी बचने की अपील की।
उन्होंने कहा, “जब औपचारिक स्वास्थ्य सेवाएं दूर हों, स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो या चिकित्सा सुविधाएं आसानी से उपलब्ध न हों, तो लोग स्वाभाविक रूप से उन्हीं तरीकों और व्यवस्थाओं का सहारा लेते हैं, जिन्हें वे जानते हैं और जिन पर भरोसा करते हैं। इसका समाधान उन्हें दोष देना नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना है जो उन तक पहुंचे, उनकी परिस्थितियों और विश्वासों का सम्मान करे और उनका भरोसा जीते।”
उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से स्वास्थ्य अधिकारियों, स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज संगठनों को साथ लेकर एक विशेष ‘आदिवासी बाल स्वास्थ्य मिशन’ शुरू करने का सुझाव दिया।
उनके मुताबिक, इस मिशन के तहत घर-घर स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण के साथ बच्चों के लिए पोषण सहायता, संक्रामक बीमारियों की शुरुआती पहचान और गंभीर रूप से बीमार बच्चों को तत्काल बेहतर स्वास्थ्य केंद्रों तक रेफर करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित स्थानीय महिलाओं, सामुदायिक स्वयंसेवकों, आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जोड़कर गांवों में एक ‘अर्ली वॉर्निंग नेटवर्क’ भी बनाया जा सकता है। यह नेटवर्क बुखार, खसरा, दस्त या बच्चों की असामान्य मौतों जैसे मामलों की तुरंत जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है, ताकि संभावित संक्रमण को बड़े प्रकोप में बदलने से पहले नियंत्रित किया जा सके।
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने दूरदराज के इलाकों में नियमित स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर भी जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि मोबाइल मेडिकल टीमें तय कार्यक्रम के अनुसार गांवों का दौरा करें और स्थानीय स्तर पर आपातकालीन परिवहन की व्यवस्था की जाए, ताकि गंभीर रूप से बीमार बच्चों को बिना देरी के स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाया जा सके।
उन्होंने कहा कि केवल स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि जरूरत के समय ग्रामीणों को समय पर डॉक्टर, दवा, जांच और आपातकालीन परिवहन उपलब्ध हो।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष ने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में नागरिक समाज की भूमिका पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, “सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती। नागरिक समाज को केवल आलोचना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जहां भी सहयोग का अवसर मिलेगा, हम स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने, टीकाकरण के लिए लोगों को प्रेरित करने, पोषण संबंधी सहायता उपलब्ध कराने और सामुदायिक स्तर पर निगरानी में प्रशासन तथा स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं।”
उन्होंने बालाघाट में हुई मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा की मांग की। साथ ही, मध्य प्रदेश सरकार से अपील की कि वह इस त्रासदी को दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखे।
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा, “सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की असली कसौटी यह नहीं है कि किसी त्रासदी के बाद कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी जाती है, बल्कि यह है कि खतरे में पड़े बच्चे तक स्वास्थ्य सेवा कितनी जल्दी पहुंचती है। किसी बच्चे की ऐसी मौत, जिसे रोका जा सकता था, हमें स्वास्थ्य व्यवस्था को और मजबूत, सुलभ और मानवीय बनाने के लिए प्रेरित करनी चाहिए।”