साकिब सलीम
13 सितंबर 1929 की दोपहर को लाहौर की बोरस्टल जेल में एक 24 साल के युवा क्रांतिकारी ने अंतिम सांस ली। उनका नाम जतिन दास यानी जतिंद्र नाथ दास था। उन्होंने लगातार 63 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं खाया था। इस शहादत ने ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव असेंबली में यह बहस शुरू हो गई कि क्या किसी सरकार को विचार रखने के जुर्म में किसी को भूखा मारने का हक है।
जतिन दास 18 साल की उम्र से पहले तीन बार जेल जा चुके थे। 1921 में सरकारी आदेशों का उल्लंघन करने पर उन्हें दो बार गिरफ्तार किया गया था। 1922 में विदेशी कपड़ों की दुकानों के बाहर प्रदर्शन के दौरान उन्हें पकड़ा गया था। 1925 में बंगाल अध्यादेश के तहत बिना मुकदमा चलाए उन्हें जेल भेजा गया था।
मैमनसिंह जेल में उन्होंने भूख हड़ताल को हथियार बनाया। जेल महानिरीक्षक को सलाम करने से मना करने पर विवाद हुआ। जतिन दास 20 दिन तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे। अंततः अधिकारी को माफी मांगनी पड़ी।
जून 1929 में लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह के साथ जतिन दास को भी गिरफ्तार किया गया। 13 जुलाई 1929 को वे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल में शामिल हो गए।
उनकी मांगें साधारण थीं। वे राजनीतिक बंदियों को कोड़े मारने पर रोक, समाचार पत्र, पुस्तकें और खाने योग्य भोजन चाहते थे।युसूफ मेहरअली की 1948 की किताब के अनुसार जतिन दास का वजन लगातार गिरता गया। गिरफ्तारी के समय उनका वजन 148 पाउंड था। 15 अगस्त तक यह घटकर 109 पाउंड रह गया। 23 अगस्त को 103 पाउंड और 2 सितंबर को 92 पाउंड बचा।
उनके शरीर का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। आंखें खुलना बंद हो गईं। डॉक्टरों ने बलपूर्वक भोजन देने की कोशिश की। बाद में उन्होंने यह भी छोड़ दिया क्योंकि इससे जान जाने का खतरा था।
9 अगस्त को पंडित जवाहरलाल नेहरू लाहौर जेल में जतिन दास से मिले। उन्होंने मीडिया से कहा कि जतिन दास बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं और मौत में ही अपनी मुक्ति देख रहे हैं।
ब्रिटिश अधिकारी सर जेम्स क्रेरार ने असेंबली में कहा कि जतिन दास अब दुनिया की अदालत से दूर चले गए हैं। यह बयान संवेदना से ज्यादा अपनी जिम्मेदारी से बचने जैसा था।
दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि भूख हड़ताल करने वाला व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज पर ऐसा करता है।मोतीलाल नेहरू ने पंजाब सरकार के रवैये के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव 55 के मुकाबले 47 वोटों से पास हो गया। यह ब्रिटिश प्रशासन की बड़ी नैतिक हार थी।
जतिन दास की आखिरी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार कोलकाता में उनकी मां के पास किया जाए।सुभाष चंद्र बोस ने शव को ट्रेन से लाहौर से हावड़ा लाने का प्रबंध किया। लाहौर से कोलकाता के रास्ते में हर स्टेशन पर लोग उमड़ पड़े। कोलकाता में दो लाख से अधिक लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

सुभाष चंद्र बोस की 'बंगाल वॉलंटियर्स' ने उन्हें अंतिम सलामी दी। उनके भाई किरण चंद्र ने चिता को अग्नि दी। उनके पिता बंकिम बिहारी दास ने ताबूत देखने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे अपने बेटे का हंसता हुआ चेहरा याद रखना चाहते हैं।
प्रोफेसर नितेंद्र चंद्र बनर्जी ने उन्हें आधुनिक 'दधीचि' कहा। उन्होंने लोगों से उनकी भस्म का तिलक लगाने का आह्वान किया।जतिन दास की शहादत का असर विदेश तक हुआ। आयरलैंड के नेता टेरेंस मैकस्वाइनी की बहन मैरी मैकस्वाइनी ने भारत संदेश भेजा। टेरेंस की मौत भी नौ साल पहले ब्रिटिश जेल में भूख हड़ताल से हुई थी। ईमन दे भलेरा ने जतिन दास को "भारत का मैकस्वाइनी" कहा।
इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक बंदियों के लिए A, B और C श्रेणियों की व्यवस्था लागू करनी पड़ी।भगत सिंह को 18 महीने बाद फांसी दी गई। जनमानस में भगत सिंह को प्रमुखता से याद रखा गया। हालांकि जतिन दास ने ही सबसे पहले ब्रिटिश जेल प्रणाली की पोल पूरी दुनिया के सामने खोली थी।
13 सितंबर की तारीख आज देश में सामान्य दिनों की तरह बीत जाती है। आजादी के इस नायक को याद रखना हर भारतीय का कर्तव्य है।