ISIS साज़िश केस: आरोपी को 5 साल बाद ज़मानत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 01-10-2026
Delhi HC grants bail to accused in ISIS-linked terror conspiracy case after over 5 years in custody
Delhi HC grants bail to accused in ISIS-linked terror conspiracy case after over 5 years in custody

 

नई दिल्ली 
 
दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 के आतंकी साजिश मामले के आरोपी मोहम्मद शहजाद कमाल को ज़मानत दे दी है। कोर्ट ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि वह पांच साल से ज़्यादा समय से हिरासत में है और अभियोजन पक्ष के 161 गवाहों से जुड़े इस मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की डिवीज़न बेंच ने स्पेशल NIA कोर्ट के 29 मई, 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कमाल की ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि उसकी ये टिप्पणियां सिर्फ़ ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करने के लिए थीं और इनका मुकदमे की असल कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
 
कमाल 31 अगस्त, 2021 से हिरासत में है और उस पर 'हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम' की कथित गतिविधियों से जुड़े मामले में आरोप हैं; अभियोजन पक्ष इस संगठन को ISIS से जुड़ा आतंकी समूह बताता है। NIA का आरोप है कि वह साजिश में शामिल था और आतंकी गतिविधियों के लिए फंड का इंतज़ाम करता था। उस पर IPC की धारा 121 और UAPA की धाराओं 17, 18, 39 और 40 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
 
अभियोजन पक्ष का मामला कई चीज़ों पर आधारित है, जिनमें Facebook और WhatsApp चैट, सह-आरोपी मोहम्मद अबसार का कथित बयान, 30,000 रुपये की बरामदगी और अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान शामिल हैं। NIA का आरोप है कि कमाल ने कई बार समूह को फंड दिया और वह दूसरे आरोपियों के संपर्क में था।
 
कमाल के वकीलों ने दलील दी कि वह पहले ही लगभग पांच साल हिरासत में बिता चुका है और अभियोजन पक्ष द्वारा बताए गए 161 गवाहों में से अभी सिर्फ़ PW-42 की गवाही ही दर्ज हो रही है। उन्होंने उसे कुछ चैट से जोड़ने के अभियोजन पक्ष के दावे पर भी सवाल उठाए और कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे साबित हो सके कि उन बातचीत में इस्तेमाल किया गया फ़ोन नंबर उसका था।
 
NIA ने ज़मानत अर्ज़ी का विरोध करते हुए कहा कि कमाल ने कथित साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई थी और UAPA के तहत मामले में सिर्फ़ मुकदमे में देरी के आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती। अभियोजन पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अदालत को उन सबूतों की जांच नहीं करनी चाहिए जो स्पेशल कोर्ट द्वारा उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज किए जाने के बाद दर्ज किए गए थे।
 
हाई कोर्ट ने गौर किया कि कमल पांच साल से ज़्यादा समय से हिरासत में था और अभियोजन पक्ष के 161 गवाहों में से सिर्फ़ एक से ही पूछताछ हो रही थी। उसने यह भी देखा कि कुछ सह-आरोपियों को - जिनमें वह आरोपी भी शामिल था जिसके साथ कमल की कथित तौर पर चैट हुई थी - पहले ही ज़मानत मिल चुकी थी। बेंच ने पाया कि इस चरण में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि कथित आपत्तिजनक चैट कमल ने की थी या उसे भेजी गई थी। अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर फ़ैसला आख़िरकार अभियोजन पक्ष द्वारा अपने सभी सबूत पेश करने के बाद ही किया जाएगा।
 
बेंच ने उन अहम गवाहों के बयानों की भी जांच की जिनसे ट्रायल के दौरान पहले ही पूछताछ हो चुकी थी। ट्रायल पर असर न पड़े, इसलिए उनके सबूतों का विस्तार से ज़िक्र किए बिना अदालत ने कहा कि उसे यह मामला ऐसा नहीं लगा जिसमें आरोपी को हिरासत में ही रखा जाना चाहिए, जबकि ट्रायल के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं थी।
UAPA मामलों में लंबी हिरासत पर, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन फ़ैसलों का सहारा लिया जिनमें माना गया है कि जल्द ट्रायल का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक गारंटी का हिस्सा है। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि देरी का मतलब अपने-आप ज़मानत मिलना नहीं है और आरोपों की प्रकृति, आरोपी की भूमिका, ट्रायल का चरण और अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
 
हाई कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 और UAPA की धारा 43D(5) के बीच संबंध से जुड़े मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजा है, इससे हाई कोर्ट को मौजूदा मामले पर उस कानून के आधार पर फ़ैसला करने से नहीं रोका जा सकता जो अभी उस पर लागू है।
 
इसके बाद बेंच ने स्पेशल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और कमल को ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। उसने कई शर्तें भी लगाईं, जिनमें दो ज़मानतदारों के साथ 50,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड, अपना पासपोर्ट जमा करना, देश और अपने मूल ज़िले हापुड़ से बाहर जाने पर रोक, ट्रायल कोर्ट के सामने नियमित रूप से पेश होना और संबंधित NIA ऑफ़िस में हर दो हफ़्ते में रिपोर्ट करना शामिल है। उन्हें अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क करने या उन्हें प्रभावित करने, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने, मामले के गुण-दोष पर सार्वजनिक बयान देने या ऐसी सामग्री फैलाने से भी रोका गया है जिससे कानून-व्यवस्था या मुकदमे की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि अगर इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो अभियोजन पक्ष ज़मानत रद्द करने की मांग कर सकता है।