फातिमा मुज़फ़्फ़र अहमद

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 06-01-2026
A champion of equality, development, and communal harmony: Fatima Muzaffar Ahmed
A champion of equality, development, and communal harmony: Fatima Muzaffar Ahmed

 

dफातिमा मुज़फ़्फ़र अहमद, चेन्नई निगम में भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की अकेली विजेता और तमिलनाडु की 2022 की परिषद चुनावों में जीतने वाली छह मुस्लिम महिला पार्षदों में से एक हैं। उनके लिए यह उपलब्धि कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, क्योंकि वे एक राजनीतिक परिवार से आती हैं, लेकिन चुनाव लड़ना उनका व्यक्तिगत निर्णय था।आवाज द वाॅयस के खास सीरिज द चेंज मेकर्स के लिए चेन्नाई से हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने फातिमा मुज़फ़्फ़र अहमद पर यह विशेष रिपोर्ट तैयार की है।

ddफातिमा अपने पिता ए.के. अब्दुल सामद के राजनीतिक सफर से प्रेरित हैं। उनके पिता IUML के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं और दो बार वेलुर से लोकसभा और दो बार राज्यसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। फातिमा बताती हैं, “पिता जी की शुरूआत हार्बर क्षेत्र से पार्षद के रूप में हुई थी।

वह हमेशा प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति रहे। हम घर में उनसे प्रेरित होते थे और उनके आदर्शों को अपनाने की कोशिश करते थे।”

उनके परिवार में राजनीतिक और सामाजिक योगदान की विरासत गहरी है। उनके दादा मौलाना और स्वतंत्रता सेनानी थे।

वे तमिलनाडु में खिलाफत आंदोलन से जुड़े थे और पहली बार कुरान का तमिल अनुवाद किया।

फातिमा कहती हैं, “उस समय इस अनुवाद को लेकर काफी आलोचना और विरोध हुआ, लेकिन मेरे दादा चाहते थे कि आम मुस्लिम तक धर्मग्रंथ की पहुंच हो। यह तमिल अनुवाद आज भी लोगों द्वारा पढ़ा जाता है।”

मौलानों के अनुसार कुरान का अनुवाद नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे उसकी मौलिक भाषा में ही रहना चाहिए।

fलेकिन उनके दादा का मानना था कि आम नागरिक अगर इसे अपनी भाषा में पढ़ न सके, तो उसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उन्होंने इस अनुवाद को पूरा करने के लिए 26 साल तक काम किया।

हालांकि उनके पिता राजनीतिज्ञ थे, लेकिन उनके चार भाई-बहनों में केवल फातिमा ने राजनीति को चुना।

फातिमा अपने परिवार में समानता का उदाहरण देती हैं और कहती हैं, “हमारे घर में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। हमें समान महत्व दिया गया। मुझे स्कूल में सार्वजनिक भाषण देने और सामाजिक सक्रियता में अच्छा अनुभव था। कॉलेज में छात्र संघ से लेकर IUML के महिला विंग की नेतृत्व भूमिकाओं तक का सफर सहज और स्वाभाविक था।”

2022 में फातिमा चेन्नई निगम की अकेली IUML पार्षद बनीं और उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज की। वर्तमान में वे चेन्नई निगम में शिक्षा स्थायी समिति की सदस्य हैं। इसके अलावा उन्हें तीसरी बार वक्फ़ बोर्ड और हज समिति के लिए नामित किया गया है। वे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की कार्यकारी समिति की भी सदस्य हैं, जहां 40 सदस्यों में केवल छह महिलाएं हैं, और फातिमा और एक अन्य महिला केवल तमिलनाडु से हैं।
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फातिमा AIMPLB में विभिन्न व्यक्तिगत कानून के मुद्दों पर तमिलनाडु की महिलाओं की आवाज़ उठाने में सक्षम हैं। वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि समाज में समुदायों के बीच विभाजन बढ़ रहा है। फातिमा कहती हैं, “इस्लामोफोबिया को जानबूझकर भड़का कर समाज में भय और विभाजन पैदा किया जा रहा है। IUML धर्मनिरपेक्ष होने की कोशिश करता है, लेकिन नई पीढ़ी डर के माहौल में बड़ी हो रही है।”

ddफातिमा को केरल के IUML सुप्रीमो और लेखक सादिक अली थंगल से प्रेरणा मिलती है। वे उनके धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण और उनके कार्य “ब्रिजिंग कम्युनिटीज़ बिल्डिंग डेमोक्रेसीज़” से बहुत प्रभावित हैं। वे मानती हैं कि तमिलनाडु में मुसलमानों के लिए वर्तमान में सुरक्षा का वातावरण सबसे बेहतर है। यहां का द्रविड़ मॉडल सभी नागरिकों को तमिल के रूप में देखता है, न कि धर्म के आधार पर। यही एकता तमिलनाडु को हर क्षेत्र में अन्य राज्यों से आगे रखती है।

sतमिलनाडु की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे अधिक है और राज्य तेजी से ट्रिलियन-डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

फातिमा के उद्देश्यों में समाज के वंचित, पिछड़े, निरक्षर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना शामिल है।

उनका मानना है कि समानता, विविधता में एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द और विश्व शांति स्थापित करने में उनकी राजनीतिक और सामाजिक भूमिकाएं मदद करती हैं। फातिमा कहती हैं, “गरीबी किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।”

उनका काम और समाज के कमजोर वर्गों के लिए योगदान उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान दिला चुका है। उन्हें मदर टेरेसा विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में मानद डॉक्टरेट और मद्रास विश्वविद्यालय से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला है।

फातिमा अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने 25 देशों का दौरा किया है और विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिनिधित्व किया है। हाल ही में वे अबू धाबी गई थीं, जहां उन्होंने Global Summit of Women में भाग लिया। इससे पहले वे संयुक्त राज्य अमेरिका गईं और वहां अमेरिकी काउंसुलेट चेन्नई के प्रायोजन में आतंकवाद और सुरक्षा पर संबोधन दिया।

फातिमा के अनुसार उनका सपना तमिलनाडु की विकास यात्रा का हिस्सा बनना है। वे सामाजिक न्याय, समानता और समुदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए काम करना चाहती हैं। उनका मानना है कि राजनीति सिर्फ़ सत्ता का साधन नहीं, बल्कि सेवा और समाज के हर वर्ग तक पहुंच का माध्यम है।

फातिमा मुज़फ़्फ़र अहमद की कहानी यह दिखाती है कि किस तरह एक महिला, सीमित संसाधनों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद, परिवार की विरासत और व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से राजनीति और समाज सेवा में प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है। उनका जीवन तमिलनाडु की मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रेरणा है और यह प्रमाण है कि शिक्षा, साहस और समर्पण से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।
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वे यह मानती हैं कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी न केवल लोकतंत्र को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में समानता और न्याय के मूल्यों को भी स्थायी करती है। फातिमा के लिए सेवा ही राजनीति है और राजनीति ही समाज सेवा का माध्यम। उनके प्रयास यह दिखाते हैं कि समाज और राज्य की प्रगति में महिलाओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है।