रूही नाज़की की चाय जाई ने बदला कश्मीर के टी रूम का अंदाज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 26-08-2026
Chai Jaai: A unique blend of Kashmiri culture in an English-style tea room.
Chai Jaai: A unique blend of Kashmiri culture in an English-style tea room.

 

एहसान फ़ाज़िली/श्रीनगर
 
ब्रिटिश कॉट्सवोल्ड के गर्मजोशी भरे और स्वागतपूर्ण टी रूम का माहौल और कश्मीर की अनूठी सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को करीब से देखने की चाह ने ‘चाय जाई’ को जन्म दिया। करीब एक दशक के सफर में यह जगह 60 से अधिक तरह की चाय और पारंपरिक कश्मीरी व्यंजनों के साथ अपनी अलग पहचान बना चुकी है। जम्मू-कश्मीर सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुकीं रूही नाज़की ने दो अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को जोड़कर सिर्फ एक कैफे नहीं, बल्कि एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र तैयार किया, जहां चाय के साथ कश्मीर की कला, संस्कृति और विरासत का अनुभव भी मिलता है।
 

मुंबई में करीब दो दशक बिताने के बाद जब रूही नाज़की ने वापस कश्मीर में काम करने और बसने का फैसला किया, तो उनके सामने कई विकल्प आए। इसी दौरान 2015 के आसपास उनकी मुलाकात महत्ता स्टूडियो से जुड़े कारोबारी जगदीश महत्ता (मेहता) से हुई। मुलाकात में एक ऐसे टी रूम की कल्पना पर चर्चा हुई जो सामान्य कैफे से अलग हो। इंग्लैंड की अपनी यात्राओं के दौरान रूही ने कॉट्सवोल्ड के टी रूम्स की संस्कृति को करीब से देखा था। इसी अनुभव को कश्मीर की पारंपरिक चाय और खान-पान से जोड़ने का विचार सामने आया।
 
रूही नाज़की ने आवाज़ द वॉइस से बातचीत में कहा, “हमने एक ऐसा टी रूम खोलने का फैसला किया, जिसमें ब्रिटिश कॉट्सवोल्ड की गर्मजोशी और स्वागत की भावना के साथ कश्मीर की नमकीन चाय, कहवा और दूसरी पारंपरिक चीजों का स्पर्श हो।”
 
श्रीनगर के रेजीडेंसी रोड पर झेलम नदी के किनारे स्थित ‘चाय जाई’ का पूरा माहौल कश्मीरी संस्कृति, कला, हस्तशिल्प और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इसके सामने झेलम के पानी पर एक हाउसबोट भी है, जिसे अब ‘डोंगा’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। डोंगा कश्मीर में झीलों और नदियों पर रहने वाले लोगों के पारंपरिक घर हुआ करते थे।
 
जून 2016 में हुई शुरुआत

‘चाय जाई’ की शुरुआत जून 2016 में रमजान से पहले हुई। हालांकि रमजान के दौरान कारोबार अपेक्षाकृत कम रहा, लेकिन कुछ ही समय बाद कश्मीर में हालात बिगड़ गए। 8 जुलाई 2016 को हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में लंबे समय तक बंद, कर्फ्यू, संचार प्रतिबंध और तनाव का दौर चला। सर्दियां आते ही ‘चाय जाई’ ने कश्मीरी व्यंजनों, खासकर हरिस्सा, को अपने मेन्यू में शामिल किया। रूही नाज़की के मुताबिक, यह घर में तैयार होने वाली पारंपरिक शैली में परिवारों को सम्मानजनक तरीके से परोसा जाता था।
 
 
हरिस्सा बना युवाओं की पसंद

सर्दियों में बनने वाला मांसाहारी व्यंजन हरिस्सा ‘चाय जाई’ की लोकप्रियता बढ़ाने में अहम साबित हुआ। मुख्य रूप से मटन से तैयार होने वाला यह व्यंजन रातभर पकाया जाता है। इसमें चावल का आटा और सुगंधित मसाले मिलाकर इसे गाढ़े शोरबे जैसी शक्ल दी जाती है। इसे गर्मागर्म गिरदा या तंदूरी रोटी के साथ परोसा जाता है।
 
कहा जाता है कि हरिस्सा 14वीं सदी में मध्य एशिया से कश्मीर पहुंचा। आज भी कई कश्मीरी परिवार इसे घर पर बनाते हैं, जबकि श्रीनगर के पुराने इलाकों में इसकी पारंपरिक दुकानें भी मशहूर हैं। ‘चाय जाई’ में सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि कश्मीर की पारंपरिक उपयोगी वस्तुएं भी देखने को मिलती हैं। इनमें समोवर खास है तांबे से बना यह पारंपरिक बर्तन अंगारों की मदद से नमकीन चाय या कहवा को गर्म रखता है।
 
कैफे नहीं, एक सांस्कृतिक स्पेस

रूही नाज़की के मुताबिक, “इसने सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव पैदा किया है। यह सिर्फ एक कैफे नहीं है। हमने सांस्कृतिक क्षेत्र में भी बहुत काम किया है।” ‘चाय जाई’ ने कश्मीर के अलग-अलग मौसम और परंपराओं को केंद्र में रखकर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें वसंत उत्सव, पंपोर में हब्बा खातून से जुड़े कार्यक्रम और विंटर फेस्टिवल शामिल रहे। इन आयोजनों में युवाओं, कलाकारों, कारीगरों और महिलाओं को जोड़ा गया।
 
2017 के वसंत उत्सव के दौरान भी बड़े स्तर पर सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की गईं। मुशायरे, ईद, शिवरात्रि यानी हेरथ और क्रिसमस से जुड़े कार्यक्रमों के साथ कश्मीर के स्ट्रीट फूड को भी मंच दिया गया। रूही नाज़की कहती हैं कि उनके कार्यक्रमों के केंद्र में समावेशिता रही है। उनके पिता फ़ारूक़ नाज़की, जो प्रसिद्ध कवि और प्रसारक थे तथा दूरदर्शन केंद्र और रेडियो कश्मीर, श्रीनगर का नेतृत्व कर चुके थे, ने भी इस सांस्कृतिक पहल को समर्थन दिया। उनका 6 फरवरी 2024 को निधन हो गया।
 
फिल्मों ने भी बढ़ाई लोकप्रियता

समय के साथ ‘चाय जाई’ की चर्चा कश्मीर से बाहर भी पहुंची और देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आने लगे। स्थानीय युवाओं में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी। 2018 में रिलीज हुई फिल्म ‘लैला मजनू’ की शूटिंग यहां होने के बाद यह जगह और चर्चित हो गई। इसके बाद कई बॉलीवुड कलाकार भी यहां पहुंचे। रूही नाज़की के अनुसार, बॉलीवुड कलाकारों की मौजूदगी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने लोगों में इस जगह के प्रति एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया। उनका कहना है कि ‘चाय जाई’ को केवल कॉफी हाउस या एक अन्य कैफे के तौर पर देखना सही नहीं होगा, क्योंकि यह एक “सांस्कृतिक स्पेस” बन चुका है।
 
 
60 से अधिक तरह की चाय और कश्मीरी स्वाद

‘चाय जाई’ में करीब 60 तरह के पेय उपलब्ध हैं। इनमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की चाय के साथ कश्मीर की पारंपरिक चाय भी शामिल है। करीब 25 किस्म की चाय कॉट्सवोल्ड शैली से प्रेरित हैं, जबकि सात किस्में कश्मीर की पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी हैं। यहां मक्की की रोटी समेत ऐसे पारंपरिक कश्मीरी व्यंजन भी मिलते हैं, जो आमतौर पर होटलों के मेन्यू में आसानी से नहीं दिखाई देते। इसका उद्देश्य स्थानीय युवाओं को कश्मीर की पारंपरिक सब्जियों और व्यंजनों से परिचित कराना भी है।
 
मेन्यू में हंध, जिसे डैंडेलियन की एक जंगली हरी पत्तेदार सब्जी के रूप में जाना जाता है, और क्रेच जैसी स्थानीय चीजें शामिल हैं। इसके अलावा पुराने कश्मीरी व्यंजन त्चेडवार, जिसमें चावल, दाल और मसालों का संयोजन होता है, को भी फिर से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है। रूही नाज़की कहती हैं, “हम हर चीज के लिए एक अनुभव तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।” यहां कश्मीरी चाय, शीर्माल, केसर कहवा और लवासा पिज्जा समेत कई तरह के व्यंजन और पेय उपलब्ध हैं।
 
कश्मीरी पहचान को ब्रांड बनाने की कोशिश

‘चाय जाई’ ने कश्मीरी फेरन को भी एक ब्रांड के रूप में लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई है। इसके अलावा यहां ‘प्याला’ नाम से पेपर माशे कला से सजाए गए चाय के कप भी तैयार किए गए हैं। इस तरह ‘चाय जाई’ ने चाय परोसने की परंपरा को कश्मीर की कला, खान-पान, हस्तशिल्प और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर एक ऐसा अनुभव तैयार किया है, जहां एक कप चाय के साथ कश्मीर की कहानी भी परोसी जाती है।