मृदगंधा दीक्षित
जब भारत आज़ाद हुआ था, तब एक आम हिंदुस्तानी की उम्र महज़ 27-28 साल हुआ करती थी। इसलिए यहां के हेल्थकेयर सिस्टम पर ज़ोर देना बहुत ज़रूरी था। भारत की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब थी। ऐसे में यहां की गरीब अवाम के लिए एक ऐसा वेलफेयर हेल्थकेयर सिस्टम खड़ा करना था, जिसका खर्च वे उठा सकें। उस वक्त भी दुनियाभरकी फार्मास्यूटिकल कंपनियों पर नफाखोरी के इल्ज़ाम लग ही रहे थे। ऐसे हालात में देसी कंपनियों का तैयार होना और दवाएं बनाने के मैदान में भारत का आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी था। हमारी तारीख बताती है कि भारत बनाने वालों ने इन बातों पर खास ध्यान दिया था।
इसी तारीख का एक सुनहरा पन्ना है 'सिप्ला'। लेकिन जब कोई संस्था 80 साल का सफर पार कर लेती है, तो उसके सामने अपनी पुराने मूल्यों को नई दुनिया की तेज़-तर्रार टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ने की एक बड़ी चुनौती होती है। इस चुनौती को हमीद परिवार की तीसरी पीढ़ी की नुमाइंदगी करने वाली समीना हमीद ने बहुत ही आसानी से पार कर लिया है।
कभी 227 अरब रुपये के बाज़ार मूल्य वाली इस कंपनी को आज 1 लाख करोड़ रुपये के पार ले जाने में, और 'कॉर्पोरेट डिसिप्लिन' के साथ 'इंसानी नज़रिए' का बेहतरीन तालमेल बिठाते हुए कंपनी को आगे बढ़ाने में समीना का एक बहुत बड़ा किरदार है।

कॉर्पोरेट दुनिया में तीसरी पुश्त की एंट्री
बाहर से देखने वाले को लग सकता है कि समीना का सफर 'चांदी का चम्मच' मुंह में लेकर शुरू हुआ था। लेकिन उन्होंने सिप्ला में नए आइडियाज़ को लागू किया। खानदानी बिज़नेस को एक 'मॉडर्न टच' दिया। उनके दादा और सिप्ला के संस्थापक ख्वाजा अब्दुल हमीद ने आज़ादी से पहले गांधीजी के विचारों से मुतास्सिर होकर इस कंपनी की बुनियाद रखी थी।
आगे चलकर उनके पिता एम. के. हमीद और चाचा डॉ. वाई. के. हमीद ने इसे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी फैलाया। उन्होंने पश्चिमी कंपनियों के मोनोपोली को तोड़ते हुए अफ्रीका समेत कई विकासशील देशों में एचआईवी/एड्स की दवाएं बहुत ही सस्ती कीमत पर मुहैया कराईं।
समीना का बचपन मुंबई में बीता। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह लंदन चली गईं। 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' (LSE) से 'इंटरनेशनल अकाउंटिंग एंड फाइनेंस' में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद, सबने यही सोचा था कि वह सिप्ला में ही काम करेंगी। लेकिन सबको गलत साबित करते हुए उन्होंने ग्लोबल इकोनॉमी का केंद्र माने जाने वाले 'गोल्डमैन सैक्स' (Goldman Sachs) में काम करना शुरू किया।
लंदन और न्यूयॉर्क की उस ज़बरदस्त होड़ में समीना ने दुनिया भर के बाज़ारों के नियम और 'ग्लोबल वर्क कल्चर' का करीब से तजुर्बा हासिल किया। कॉर्पोरेट दुनिया में कोई फैसला कैसे लिया जाता है और उसके दूरगामी नतीजे क्या होते हैं, यह सब उन्होंने वहीं से सीखा।

सिप्ला में एक नए दौर का आगाज़
समीना 2011 में आधिकारिक तौर पर सिप्ला में शामिल हो गईं। तब उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, कंपनी की पुरानी और तजुर्बेकार टीम का भरोसा जीतना। और दूसरी, सिप्ला को 'पारंपरिक भारतीय दवा कंपनी' की छवि से बाहर निकालकर एक 'मल्टीनेशनल जायंट' के तौर पर खड़ा करना। सिप्ला में आते ही उन्होंने 'स्ट्रैटेजिक प्रोजेक्ट्स' की ज़िम्मेदारी संभाली और कंपनी के हर कोने से वाकिफ हो गईं।
डिसिप्लिन, पक्का इरादा और दूरंदेशी उनके काम करने के तरीके की खास बातें हैं। उन्होंने दुनिया भर के बेहतरीन एक्सपर्ट्स और प्रोफेशनल्स को कंपनी में शामिल किया। नए सिस्टम बनाए। आज सिप्ला में जो बिज़नेस डिसिप्लिन नज़र आता है, वह पिछले एक दशक में समीना की मेहनत का ही नतीजा है।
'सिप्ला हेल्थ' और कंज़्यूमर हेल्थकेयर में इंकलाब
समीना की दूरंदेशी की एक बेहतरीन मिसाल 2015-16 के आस-पास 'सिप्ला हेल्थ लिमिटेड' (Cipla Health Ltd.) का बनना है। वह अच्छी तरह समझ गई थीं कि सिर्फ डॉक्टर के पर्चे (प्रिस्क्रिप्शन) पर निर्भर न रहकर, सीधे ग्राहकों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों से जुड़ना कितना अहम है।
इस नए बिज़नेस की स्ट्रैटेजी साफ करते हुए समीना का एक विचार बहुत मशहूर हुआ था। उन्होंने कहा था, "कंज़्यूमर हेल्थकेयर में कामयाब होने के लिए हमें 'फार्मा इन / एफएमसीजी आउट' वाली मानसिकता की सख्त ज़रूरत है।
इसका मतलब यह है कि जब प्रोडक्ट बने, तो उसमें एक 'फार्मा' कंपनी की वैज्ञानिक बारीकी और भरोसा होना चाहिए। लेकिन जब उसे बाज़ार में बेचा जाए, तो साबुन और शैंपू की तरह सीधे और तेज़ी से ग्राहकों तक पहुँचाया जाना चाहिए।"
इसी का नतीजा है कि आज हिंदुस्तानी बाज़ार में 'निकोटेक्स' (Nicotex - सिगरेट छोड़ने वाले प्रोडक्ट्स), 'कफसिल्स' (Cofsils - खांसी की गोलियां और सिरप), 'ओम्निजेल' (Omnigel - दर्द दूर करने वाला मलहम/स्प्रे) और 'मैक्सिरिच' (Maxirich - मल्टीविटामिन) जैसे ब्रांड्स ने घर-घर में अपनी जगह बना ली है। ओटीसी (Over the Counter - बिना पर्चे के मिलने वाली दवाएं) प्रोडक्ट्स के मैदान में सिप्ला को कामयाबी के साथ उतारकर समीना ने 'सिप्ला' ब्रांड को सीधे आम इंसान के 'फर्स्ट-एड बॉक्स' तक पहुँचा दिया।

विदेशों में फैलाव और दिलेर फैसले
समीना की नेतृत्व में सिप्ला दुनिया के नक्शे पर छा गई। उन्होंने न सिर्फ दवाओं का एक्सपोर्ट किया, बल्कि विदेशों में मौजूद स्थानीय कंपनियों को खरीदकर वहां अपनी जड़ें भी मज़बूत कीं। 2015-16 में अमेरिका में 'इनवाजेन फार्मास्यूटिकल्स' (InvaGen Pharmaceuticals) और 'एक्सेलैन' (Exelan) जैसी कंपनियों को खरीदने का फैसला सिप्ला की तारीख के सबसे दिलेर फैसलों में से एक माना जाता है।
इस फैसले की वजह से अमेरिका जैसे सख्त नियमों वाले बाज़ार में सिप्ला की एंट्री आसान हो गई। आज दक्षिण अफ्रीका हो या अमेरिका, सिप्ला ब्रांड को एक भरोसेमंद नाम के तौर पर पहचाना जाता है। इस ग्लोबल फैलाव में समीना का नाम सबसे आगे लेना होगा।
'पेशेंट-फर्स्ट' (मरीज़ सबसे पहले) नज़रिया
सिप्ला का नारा है - 'Caring for Life'। लेकिन यह सिर्फ एक नारा बनकर न रह जाए, इसके लिए समीना ने रिसर्च (R&D) पर खास ज़ोर दिया। उनके मुताबिक, "रिसर्च ही दवा इंडस्ट्री का दिल है।" उन्होंने सांस की बीमारियों के मैदान में सिप्ला को दुनिया में नंबर वन बनाने का सपना देखा और उसे सच भी कर दिखाया।
आज सिप्ला के 'इन्हेलर्स' दुनिया भर के करोड़ों मरीज़ों को सांस लेने में मदद कर रहे हैं। खासतौर पर कैंसर और एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों की दवाएं आम लोगों की पहुँच वाले दामों पर मुहैया कराने की सिप्ला की पॉलिसी को समीना ने और भी असरदार तरीके से आगे बढ़ाया।
"दवा कोई नफा कमाने का ज़रिया नहीं है, यह मरीज़ का हक है," यह उनका पक्का यकीन है।
कोरोना का मुश्किल दौर और इंसानियत का जज़्बा
दुनिया भर में फैली महामारी के वक्त, जब पूरी दुनिया थम सी गई थी, तब समीना हमीद और उनकी टीम दिन-रात काम कर रही थी। 'रेमडेसिवीर' हो या दूसरी ज़रूरी दवाएं, उन्हें सही वक्त पर पहुँचाने की एक बड़ी चुनौती उनके सामने थी। उन्होंने खुद सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पर नज़र रखी। नफे-नुकसान को किनारे रखकर, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि दवाएं ज़्यादा से ज़्यादा मरीज़ों तक कैसे पहुँचेंगी।
इस आपातकाल जैसे हालात के बारे में बात करते हुए समीना हमीद ने सिप्ला का रुख बेहद साफ लफ्ज़ों में बयान किया था। वह कहती हैं, "इस ग्लोबल महामारी के दौरान हमारा नारा सही मायनों में सच साबित हुआ है। कोविड-19 के खिलाफ इस जंग में हर ज़रूरतमंद मरीज़ तक ज़िंदगी बचाने वाली दवाएं बिना किसी रुकावट के पहुँचाने के लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।"
इस दौरान सिप्ला ने जो फुर्ती दिखाई, वह समीना की लीडरशिप का 'लिटमस टेस्ट' साबित हुआ, जिसमें यकीनन उन्हें पूरी कामयाबी मिली।
कॉर्पोरेट दुनिया में इज्ज़त और मुकाम
समीना के कामों की कई बार तारीफ हुई है। 'फॉर्च्यून इंडिया' और 'बिज़नेस टुडे' जैसी नामी पत्रिकाओं ने उन्हें बार-बार 'भारत की सबसे ताकतवर महिला उद्यमी' कहा है। 'फोर्ब्स' की एशिया की सबसे असरदार महिलाओं की लिस्ट में भी उनका नाम शामिल हो चुका है।
लेकिन, इन अवार्ड्स से भी कहीं ज़्यादा अहम वह काम है जो वह 'इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस' (IPA) के ज़रिए पूरी भारतीय दवा इंडस्ट्री की पॉलिसीज़ के लिए कर रही हैं। 2021 से 2023 तक 'इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस' की वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर उनका चुना जाना, उनके सफर का एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है।
"हेल्थकेयर ईकोसिस्टम को मज़बूत बनाने और इंडस्ट्री के सभी लोगों के साथ मिलकर मरीज़ों की ज़िंदगी में एक पॉज़िटिव बदलाव लाने के लिए हम पूरी तरह कमिटेड हैं," उन्होंने उस वक्त कहा था। सरकार की पॉलिसीज़ में मरीज़ों के फायदे का ख्याल कैसे रखा जाए, इसके लिए वह हमेशा ज़ोर देती रहती हैं।
इंसानियत और भविष्य की सोच
समीना हमीद जब सिप्ला में आई थीं, उसी दौरान 2011 में 'सिप्ला फाउंडेशन' की बुनियाद रखी गई थी। फाउंडेशन के ज़रिए उन्होंने हेल्थ, तालीम और स्किल डेवलपमेंट के मैदान में कई बेहतरीन प्रोग्राम चलाए हैं। खास तौर पर 'सिप्ला पैलिएटिव केयर एंड ट्रेनिंग सेंटर' (Cipla Palliative Care) जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए, कैंसर के आखिरी स्टेज वाले मरीज़ों को मुफ्त और इज़्ज़त के साथ इलाज दिलाने में उनका बहुत बड़ा हाथ है।
गांव-देहात में चलते-फिरते दवाखानों (Mobile Healthcare Units) का जाल बिछाने के पीछे भी उनका ही अहम किरदार रहा है। वह कहती हैं, "हमारी कामयाबी को बैलेंस शीट में नहीं नापा जा सकता। हमें इसे उन जानों की गिनती से नापना होगा जिन्हें हमने बचाया है।" अपने इस सामाजिक नज़रिए के बारे में बात करते हुए समीना हमीद कहती हैं, "हेल्थकेयर कोई बिज़नेस नहीं है। यह इंसान का बुनियादी हक है। हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ दवाएं बनाने तक ही महदूद नहीं है। हमें एक ऐसा सिस्टम खड़ा करना है जहां गरीब से गरीब मरीज़ को भी इज़्ज़त के साथ ऐसा इलाज मिल सके, जिसका खर्च वह उठा सके।"
आज के दौर में सिप्ला 'डिजिटल हेल्थकेयर' और 'प्रिसिजन मेडिसिन' की तरफ कदम बढ़ा रही है, और इसकी कमान भी समीना ही संभाल रही हैं। डिजिटल हेल्थकेयर का मतलब है टेक्नोलॉजी और मोबाइल ऐप्स की मदद से हेल्थकेयर को और भी स्मार्ट बनाना। इसमें घर बैठे वीडियो कॉल पर डॉक्टर की सलाह लेना, स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड जैसे गैजेट्स का इस्तेमाल करना शामिल है।
इनसे हमारी हार्ट रेट, ईसीजी या खून में ऑक्सीजन की लगातार जांच की जा सकती है। इसके साथ ही 'इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड' रखना, यानी मरीज़ की बीमारी और इलाज की सारी जानकारी कागज़ों पर रखने के बजाय क्लाउड पर सुरक्षित रखना ये सब इसी में शामिल हैं। वहीं, प्रिसिजन मेडिसिन का मतलब है 'एक ही दवा सबके लिए' वाला नज़रिया छोड़कर, सही मरीज़ को, सही वक्त पर, सही दवा देना।
फार्मास्यूटिकल जैसे नफे के लिए बदनाम मैदान में आकर, नफा कमाने और सामाजिक भलाई का बेहतरीन तालमेल बिठाना—यह सोच भले ही उन्हें विरासत में मिली हो, लेकिन उस नाम, इज़्ज़त और काम को कायम रखते हुए, उसमें एक बड़ा योगदान देकर रिवायत को आधुनिकता के साथ जोड़ने वाली समीना हमीद नए भारत के लिए यकीनन एक बड़ी मिसाल हैं।