वंदे मातरम 150 वर्ष: भाषाओं की सरहदों को लांघकर अरबी सुरों में गुंजायमान राष्ट्रीय गीत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 24-08-2026
Vande Mataram – 150 Years: The national song resonating in Arabic melodies, transcending linguistic boundaries.
Vande Mataram – 150 Years: The national song resonating in Arabic melodies, transcending linguistic boundaries.

 

गुलाम कादिर

भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ जब अपनी रचना के 150वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तब इसकी धुन ने देश की सीमाओं को पार कर एक नया इतिहास रच दिया है। जिस गीत के शब्दों और धार्मिक प्रतीकों को लेकर देश के भीतर अक्सर बहस छिड़ जाती है, उसी गीत को दुबई में रहने वाली एक भारतीय गायिका ने बहुभाषी रंग में ढालकर दुनिया के सामने एकता का अनूठा उदाहरण पेश किया है।  

गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक गायिका सुचेता सतीश ने 'वंदे मातरम बियॉन्ड बॉर्डर्स' प्रोजेक्ट के जरिए इस राष्ट्रीय गीत को सात भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अरबी भाषा में पिरोकर एक नया रूप दिया है।  

बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा सन् 1875 में रचे गए इस गीत के 150 साल पूरे होने के अवसर पर यह अनूठी पहल यूएई में बसे प्रवासी भारतीयों के संगठन 'इंडियन पीपुल फोरम' के सुझाव पर शुरू की गई।  
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हाल की एक तस्वीर में डॉ. शिहाब घनेम के साथ सुचेता सतीश।

अरबी छंद से जुड़ा नया अध्याय

इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात इसकी अरबी भाषा वाली अंतिम पंक्तियां हैं। सुचेता ने खाड़ी देशों में रह रहे विभिन्न भाषाई भारतीयों और स्थानीय अरबी समुदाय तक संदेश पहुंचाने के लिए प्रख्यात अमीराती कवि डॉ. शिहाब घानेम की मदद ली। डॉ. घानेम ने मूल गीत के भाव और देशभक्ति की भावना को ध्यान में रखते हुए इसका अरबी अनुवाद तैयार किया।  

सुचेता का कहना है कि जब डॉ. घानेम की कविता उनके पास पहुंची, तो 'बियॉन्ड बॉर्डर्स' का विचार सिर्फ एक नाम न रहकर हकीकत में तब्दील हो गया। सुचेता और डॉ. घानेम का यह सहयोग नया नहीं है। इससे पहले भी दोनों ने 2019 में यूएई के नेतृत्व के लिए समर्पित एक संगीत प्रोजेक्ट और 2022 में रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं के अरबी अनुवाद पर एक साथ काम किया है।  

भाषाओं का संगम और एआई से परहेज

गीत को तैयार करते समय मूल रचना की आत्मा को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। सुचेता चाहती थीं कि शब्दों का अनुवाद केवल शब्दशः न हो, बल्कि उसमें छुपा भावनात्मक और देशभक्ति का जज्बा कायम रहे। इस काम के लिए उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) या अनुवाद तकनीकों का सहारा लेने के बजाय विभिन्न भाषाओं के विशेषज्ञों और गीतकारों की एक टीम बनाई।  

    बंगाली और संस्कृत: बंकिम चंद्र चटर्जी के मूल छंद  

    पंजाबी: देविंदर कौर और सिमरन सभरवाल  

    गुजराती: विलास बख्शी  

    तमिल: क्रिस वेणुगोपाल  

    मलयालम: सुमिता अयिलियाथ  

    असमिया: अमृत डे  

    अरबी: डॉ. शिहाब घानेम  

पूरे प्रोडक्शन की कमान सुचेता की मां सुमिता अयिलियाथ ने संभाली, जिन्होंने इसके मलयालम बोल भी लिखे। संगीत संयोजन और मास्टरिंग का काम यूएई के नेल्सन पीटर ने पूरा किया। इस खास वीडियो की शूटिंग भारत में केरल के कोच्चि शहर में की गई।  

जमीनी स्तर पर आधिकारिक शुरुआत

इस बहुभाषी वंदे मातरम को औपचारिक रूप से मध्य प्रदेश के बुरहानपुर स्थित मैक्रो विजन एकेडमी में जारी किया गया। एकेडमी के संस्थापक आनंद प्रकाश चौकसे द्वारा इसे जारी किए जाने के बाद स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सुचेता ने एक लाइव कॉन्सर्ट में इसे प्रस्तुत किया। करीब 3,300 विद्यार्थियों और दर्शकों की मौजूदगी में जब इस गीत की गूंज सुनाई दी, तो वहां मौजूद हर शख्स भारत की सांस्कृतिक विविधता का गवाह बना।  

155 से अधिक भाषाओं में गाने की क्षमता रखने वाली सुचेता इससे पहले नशीली दवाओं के खिलाफ चलाए गए अभियानों, लद्दाख के चैरिटी शो और भूटानी भाषा के गानों में भी अपनी आवाज दे चुकी हैं।  

ग्लोबल मंच पर वंदे मातरम की स्वीकार्यता

वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ का यह वर्ष न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में वहां के स्थानीय बैंड 'लुक्निका एन्सेम्बल' द्वारा वंदे मातरम गाए जाने की सराहना की थी।  

विवादों और बहसों के बीच सुचेता सतीश का यह प्रयास यह साबित करता है कि संगीत और मातृभूमि का प्रेम किसी भौगोलिक सीमा या भाषाई ढांचे में कैद नहीं होता। अरबी सुरों के साथ 7 भारतीय भाषाओं में पिरोया गया यह गीत दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक नया जरिया बन चुका है।