आज भी प्रासंगिक हैं नबी करीम की शिक्षाएं

Story by  फिरदौस खान | Published by  [email protected] | Date 26-08-2026
The teachings of the Noble Prophet remain relevant even today.
The teachings of the Noble Prophet remain relevant even today.

 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाएं किसी एक ज़माने या समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सभी प्राणियों के लिए हमेशा से ही प्रासंगिक रही हैं। इक्कीसवीं सदी में जिस तरह से नैतिक व जीवन मूल्यों का ह्रास हो रहा है और सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है, उसके मद्देनज़र आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं की प्रासंगिकता और ज़्यादा बढ़ गई है।

आज के भौतिकतावादी दौर में लोग बहुत ज़्यादा व्यस्त हो गए हैं। उनके पास न अपने परिवार के लिए वक़्त है और न रिश्तेदारों के लिए। फिर ऐसे में उनसे अपने पड़ौसियों की ख़ैर-ख़बर की उम्मीद करना ही बेमानी लगता है।

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रोज़गार की तलाश में लोग अपने पुश्तैनी गाँव-देहात और छोटे क़स्बों से आकर बड़े शहरों में बस गए हैं। बड़े शहरों के बड़े ख़र्चों को पूरा करने के लिए वे दिन-रात काम में जुटे रहते हैं। नौकरीपेशा लोगों को हफ़्ते में छुट्टी का एक दिन मिलता है, तो वह घरबार के छोटे-मोटे कामों या फिर आलस में बीत जाता है।

ऐसे में लोग एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवारों के चलन ने भी लोगों को एक दूसरे से दूर करने का काम किया है। पहले घर में कुछ ख़ास पकता था, तो आसपास के पड़ौसियों को भी भेजा जाता था।

अचार डला है, तो पड़ौसियों को चखाया जा रहा है, मुरब्बा बना है तो पड़ौसियों को खिलाया जा रहा है। लेकिन बदलते वक़्त ने ये रिवायत भी छीन ली। पहले बर्तनों पर नाम इसीलिए लिखवाये जाते थे ताकि मालूम रहे कि कौन-सा बर्तन किस घर का है, क्योंकि बर्तन मुहल्ले भर में घूमते रहते थे।

अब सिर्फ अपना पकाना और अपना ही खाना रह गया है। इस बारे में बात करें, तो जवाब मिलता है कि कौन लेकर जाए? पहले तो गली-मुहल्ले के बच्चों से भी छोटा-मोटा काम करवा लिया जाता है, मगर अब ऐसा नहीं है।               

पहले का ज़माना ही कुछ और था। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने रिश्तेदारों की तरह ही अपने पड़ौसियों का भी बेहद ख़्याल रखते थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “अगर पड़ौसी तुम्हें अपनी मदद के लिए पुकारे तो उसकी मदद को पहुंचो, उधार मांगे तो उसे उधार दे दो, ज़रूरतमंद हो तो उसकी ज़रूरत को पूरा करो, उसे कोई ख़ुशी नसीब हो तो उसे मुबारकबाद दो, वह बीमार हो जाए तो उसे देखने जाओ, कोई ग़म या मुसीबत आन पड़े तो उसे तसल्ली दो।

अगर उसकी मौत हो जाए तो उसकी मैयत में शामिल हो और अपने घर की दीवारें इतनी ऊंची न करो कि उसके घर में धूप और हवा जाना बंद हो जाए, जब तक कि वह इजाज़त न दे दे। अगर तुम कोई फल ख़रीद कर लाओ, तो कुछ फल उसके यहां भी भिजवा दो।

और अगर ऐसा नहीं कर सकते हो, तो फिर उन्हें छिपाकर अपने घर में ले जाओ और तुम्हारे बच्चे उन्हें बाहर लेकर न निकलें, ताकि उसके बच्चों को अफ़सोस न हो और अपने ख़ुशबूदार खानों से उसे दुखी न करो। उसमें से कुछ उसके घर भी भिजवा दो।“ (बेहरुल अनवार)

हज़रत अबूज़र ग़फ़्फ़ारी रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें नसीहत दी- “अबूज़र शोरबा पकाओ, तो उसमें पानी बढ़ा दिया करो और उससे अपने पड़ौसियों की ख़बरगिरी करते रहो यानी उसमें से अपने पड़ौसी को भी कुछ दे दिया करो।“ (सही मुस्लिम 2625)

आज घर ख़त्म हो रहे हैं, उनकी जगह फ़्लैट्स ने ले ली है। फ़्लैट्स में न आँगन होते हैं और न छतें होती हैं। इसलिए न आँगन में बैठकर पड़ौसियों से गपशप होती है और न छतों पर कपड़े सुखाने के दौरान पड़ौसियों से बात हो पाती है।

आलम ये है कि आसपास के फ़्लैट्स में कौन रह रहा है, या किस हाल में है, न कोई जानता है और न जानना चाहता है। एक-दूसरे की ख़ैर-ख़बर रखना गंवारपन माना जाने लगा है। ऐसे कितने ही मामले देखने और सुनने में आते रहते हैं कि अमुक जगह फ़्लैट्स में अमुक व्यक्ति की लाश मिली है।

बदबू फैलने पर पड़ौसियों ने पुलिस को ख़बर की, तब मालूम हुआ कि यहां कौन रहता था। लोगों ने ख़ुद को अपने ही दायरे और अपनी ही चहारदीवारी में क़ैद कर लिया है। इसलिए वह अकेला और दीन से दूर होता जा रहा है। सिर्फ़ रोज़े रखना और नमाज़ पढ़ना ही दीन नहीं है। दीन में पड़ौसियों का हक़ अदा करना भी शामिल है।             

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “वह मोमिन नहीं, जो ख़ुद पेट भरकर खाये और उसका पड़ौसी भूखा रहे।“ (अल-अदब अल-मुफ्रद 112)

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिसके पास ज़मीन हो और वह उसे बेचना चाहे तो उसे चाहिए कि वह उसे सबसे पहले अपने पड़ौसी को पेश करे, अगर वह न ले, तो फिर दूसरे को बेचे।” (सुनन इब्न माजा 2493)

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एक दिन हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक बकरी ज़िब्ह की। उनके पड़ौस में एक यहूदी भी रहता था। उन्होंने अपने घरवालों से दो बार पूछा- “क्या तुमने इसमें से यहूदी पड़ौसी का हिस्सा भेजा है, क्योंकि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुझे इस बारे में ताकीद पर ताकीद सुनने का मौक़ा मिला है कि हर पड़ौसी का हम पर हक़ है।” (तिर्मिज़ी)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने ग़ैर मुस्लिम पड़ौसियों का भी ख़्याल रखा करते थे। एक बार आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास तोहफ़े में कुछ फल आए। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सबसे पहले उनमें से एक हिस्सा अपने यहूदी पड़ौसी को भेजा और बाक़ी फल अपने घरवालों को दे दिए।

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम में से कोई शख़्स अपने पड़ौसी को अपनी दीवार पर लकड़ी रखने से मना न करे।“ (हदीस मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा 11374)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बन्दे का ईमान उस वक़्त तक सही नहीं होता, जब तक उसका दिल सही न हो, और उसका दिल उस वक़्त तक सही नहीं होता, जब तक उसकी ज़बान सही न हो, और आदमी उस वक़्त तक जन्नत में दाख़िल नहीं होगा, जब तक उसका पड़ौसी उसकी ज्यादतियों से महफ़ूज़ न हो।“ (हदीस मजमा अल ज़वाइद 165) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह के नज़दीक सबसे बेहतर पड़ौसी वह है, जो अपने पड़ौसी के लिए बेहतर है।“ (सुनन तिर्मिज़ी 1944) हमें इस बारे में ग़ौर व फ़िक्र करने की ज़रूरत है कि क्या हम अपने पड़ौसियों के हक़ अदा कर रहे हैं, जिनका हुक्म हमें दिया गया है?           

 (लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)