डॉ. फ़िरदौस ख़ान
भारत में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और रामनवमी की ही तरह अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्मदिन भी बड़ी अक़ीदत के साथ मनाया जाता है। आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से निस्बत रखने वालों के लिए ये एक बड़ा त्यौहार है, जो इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने रबी उल अव्वल की बारह तारीख़ को ईद मिलाद-उन-नबी के रूप में मनाया जाता है। इस रात आसमान में चाँद भी मुस्करा रहा होता है, क्योंकि ये पूरे चाँद की रात होती है।
ईद मिलाद-उन-नबी से पहले लोग अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करते हैं। मस्जिदों, दरगाहों और मुस्लिम इलाक़ों को रंग-बिरंगी लाइटों, झंडियों और परचमों से सजाया जाता है। रात में मस्जिदों, दरगाहों और घरों में रौशनी की जाती है। कुछ लोग मोमबत्तियां जलाकर घर को रौशन करते हैं, तो कुछ लोग बिजली के बल्बों की झालरें लगाते हैं।

बहुत से घरों, मस्जिदों और ख़ानकाहों में मिलाद व नात ख़्वानी होती है। आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी और उनकी नसीहतों का ज़िक्र किया जाता है। बहुत-सी जगह रबी उल अव्वल का चाँद दिखने के साथ ही मिलाद शरीफ़ का आग़ाज़ हो जाता है। इस दौरान मिलाद, दरूद और सलाम पढ़ा जाता है।
ईद मिलाद-उन-नबी के दिन मस्जिदों में सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद ख़ुशहाली, चैन व अमन की दुआएं मांगी जाती हैं। इस दिन लोग आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निशानियों की ज़ियारत करने भी जाते हैं।
इन निशानियों को तबर्रुकात कहा जाता है, जो देश के कोने-कोने में बड़े एहतराम और हिफ़ाज़त से रखी हुई हैं। इनमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दाढ़ी मुबारक के बाल, नक़्शे-दस्त यानी हाथ के निशान वाले पत्थर, नक़्शे-पा यानी क़दमों के निशान वाले पत्थर, नालैन और जुब्बा शरीफ़ शामिल हैं।
श्रीनगर में डल झील के किनारे स्थित हज़रत बल दरगाह में नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दाढ़ी मुबारक का बाल रखा हुआ है। इसे मू-ए-मुक़द्दस, मू-ए-पाक और मू-ए-मुबारक भी कहा जाता है। ख़ास मौक़ों पर ज़ायरीनों को इसकी ज़ियारत करवाई जाती है।

उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कई निशानियां मौजूद हैं। एटा ज़िले के मारहरा में ख़ानकाह-ए-बरकातिया में भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कई निशानियां रखी हुई हैं।
इनमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दाढ़ी मुबारक का बाल, क़दम शरीफ़ का निशान और नालैन शामिल हैं। कहा जाता है कि ये पाक निशानियां खाड़ी मुल्कों से होती हुई सत्रहवीं सदी में हज़रत सैयद शाह हमज़ा ऐनी रहमतुल्लाह अलैह तक पहुंचीं।
कन्नौज ज़िले के गुरसहायगंज के मदरसा मज़हरुल उलूम में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दाढ़ी मुबारक का बाल रखा हुआ है। इस बाल को कांच के एक शोकेस में बड़े ही एहराम से रखा गया है।
बहराइच में सैयद सालार मसऊद ग़ाज़ी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाक निशानियां रखी हुई हैं। दरगाह परिसर में बने रसूल हुजरे में पयम्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हाथ और क़दम मुबारक के निशान वाला पत्थर रखा हुआ है।
कहा जाता है कि बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अरब से यह पत्थर मंगवाया था। बादशाह ने यहां की इमारत भी तामीर करवाई थी। फ़र्रूख़ाबाद ज़िले के गांव शेख़पुर में हज़रत शेख़ मख़दूम बुर्राक़ लंगर जहां रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह में भी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दो निशानियां रखी हुई हैं।

इनमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़दम मुबारक के निशान और जुब्बा शरीफ़ शामिल है। कानपुर देहात के गांव बारा में तकिया दरगाह में एक पत्थर पर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़दम मुबारक के निशान बने हुए हैं।
विभिन्न भारतीय त्यौहारों की शोभायात्राओं की तरह ही ईद मिलाद-उन-नबी पर जुलूस निकाले जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली समेत विभिन्न शहरों में निकलने वाले इन जुलूसों में वहां की स्थानीय संस्कृति और स्थानीय परम्पराओं की झलक देखने को मिलती है। जुलूस में शामिल लोग हरे झंडे लेकर "लब्बैक या रसूल अल्लाह" के नारे लगाते हैं। इसमें मुसलमानों के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
लखनऊ में ईद मिलाद-उन-नबी का जुलूस अपनी अवधी तहज़ीब और अदब के लिए जाना जाता है। यह शिया और सुन्नी दोनों ही समुदायों की अक़ीदत का प्रतीक है। जुलूस के दौरान दरूद और नात शरीफ़ पढ़ी जाती है। जगह-जगह फूल बरसा कर जुलूस का स्वागत किया जाता है। स्वागत करने वालों में मुसलमानों के अलावा स्थानीय हिन्दू व्यापारी और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्य भी शामिल होते हैं।
इसी तरह हैदराबाद का ईद मिलाद-उन-नबी का जुलूस भी अपनी दक्कनी संस्कृति और स्थानीय परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध है। जुलूस में शामिल लोग पारम्परिक हैदराबादी शेरवानी, कुर्ता-पायजामा और हरे या सफ़ेद रंग का साफ़ा पहने हुए होते हैं। इस दिन पुराने हैदराबाद ख़ासकर चारमीनार के आसपास की रौनक़ देखने लायक़ होती है।
मुम्बई में निकलने वाले जुलूस में पारम्परिक और आधुनिकता के रंग देखने को मिलते हैं। यहां के जुलूस का सबसे प्रमुख ऐतिहासिक केन्द्र बायकुला स्थित ख़िलाफ़त हाउस है। यहां से निकलने वाला ये जुलूस देश के सबसे पुराने जुलूसों में से एक माना जाता है।
जुलूस में सुसज्जित गाड़ियां, ऊंट और बग्घियां शामिल होती हैं। इन पर काबा शरीफ़ और मदीना शरीफ़ की प्रतिकृतियां और सूफ़ी परम्पराओं को दर्शाती झांकियां बनाई जाती हैं। यहां के जुलूसों की एक ख़ासियत यह भी है कि इनमें सिर्फ़ मज़हबी नारे ही नहीं होते, बल्कि मानवता, सद्भावना, पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा जैसे सामाजिक संदेश देने वाले बैनर भी शामिल होते हैं।
इस दिन लंगर-ए-रसूल का इंतज़ाम किया जाता है। जगह-जगह सबीलें लगाकर राहगीरों को खाना खिलाया जाता है। खाने में सालन, रोटी, बिरयानी, पुलाव, ज़र्दा और हलवा आदि शामिल रहता है। इसके अलावा शर्बत और ठंडा पानी भी बांटा जाता है। आजकल बिस्किट और नमकीन के पैकेट भी बांटे जाते हैं। इसी तरह पानी और शीतल पेयों की बोतलें भी बांटी जाने लगी हैं।
इस दिन घरों में लज़ीज़ पकवान बनाए जाते हैं। इनमें हलवा, खीर और ज़र्दा भी शामिल होता है, क्योंकि आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मीठा बहुत पसंद था। मीठी चीज़ों पर नियाज़ दिलाई जाती है। फिर तबर्रुक रिश्तेदारों और पड़ौसियों में तक़सीम किया जाता है।
ये तीज-त्यौहार हमारी अक़ीदत ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और सभ्यता के भी प्रतीक हैं। ये हमारी संस्कृति के संवाहक हैं। इनकी वजह से ही हमारी परम्परायें आज तक ज़िन्दा हैं।
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)