ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग आज वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। भारत को दुनिया की 'फार्मेसी' कहा जाता है। इस पहचान के पीछे उन पेशेवरों की दिन-रात की मेहनत है, जो दवाओं की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करते। ऐसे ही समर्पित नामों में एक प्रमुख नाम डॉ. कशिश अज़ीज़ का है।
यूनिक्योर इंडिया लिमिटेड (Unicure India Ltd) की वाइस प्रेसिडेंट (ऑपरेशन्स और क्वालिटी एश्योरेंस) डॉ. कशिश अज़ीज़ ने फार्मा सेक्टर में अपनी अलग जगह बनाई है। वर्ष 2008 से वह कंपनी की नोएडा यूनिट से जुड़ी हैं। वह अपने पिता अब्दुल मतीन के साथ मिलकर संगठन के काम संभालती हैं। इसके अलावा उनके कंधों पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और रुड़की स्थित प्लांट्स के संचालन और निरीक्षण की भी बड़ी जिम्मेदारी है।

गुणवत्ता पर सख्त रुख और स्पष्ट सोच
फार्मा उद्योग में काम करना किसी भी सामान्य विनिर्माण जैसा नहीं है। यहाँ छोटी सी गलती किसी मरीज की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। डॉ. कशिश का मानना है कि फार्मास्युटिकल क्षेत्र का सीधा उद्देश्य जनस्वास्थ्य की सुरक्षा करना है। दवाओं का उत्पादन केवल एक व्यावसायिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन सुरक्षा से जुड़ा नैतिक कार्य है।
वे अक्सर अपनी टीम से कहती हैं कि गुणवत्ता कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। यह हमेशा उच्च इरादों, सही प्रयास और कुशल क्रियान्वयन का नतीजा होती है। उनकी कार्यप्रणाली में गुणवत्ता के साथ कोई ढिलाई स्वीकार नहीं की जाती। उनका सीधा संदेश रहता है कि काम में सटीकता और अनुशासन सर्वोपरि है।
दवाओं के निर्माण में माइक्रोग्राम स्तर तक का नियंत्रण आवश्यक होता है। हर बैच की टेस्टिंग, रिसर्च और वैलिडेशन बेहद जरूरी कदम हैं। डॉ. कशिश मानती हैं कि फार्मा कंपनियों को हर समय अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय नियामक संस्थाओं जैसे WHO, FDA और DCGI के मानकों पर खरा उतरना पड़ता है। इसलिए प्लांट्स में हर समय 'इंस्पेक्शन के लिए तैयार' रहना जरूरी होता है।
चुनौतियों के बीच मजबूत नेतृत्व
कोविड-19 महामारी का समय पूरे देश और दुनिया के लिए कठिन था। फार्मा इंडस्ट्री के सामने कच्चे माल, परिवहन और मैनपावर की भारी कमी की चुनौती थी। उस कठिन दौर में डॉ. कशिश की देखरेख में टीम ने एक भी दिन काम नहीं रोका।
सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए पैरासिटामोल और सैनिटाइज़र जैसे जरूरी स्वास्थ्य उत्पादों का उत्पादन लगातार जारी रखा गया। इस अनुभव ने पूरी टीम को और ज्यादा एकजुट और मजबूत बनाया। उस दौर में सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराते हुए उत्पादन बनाए रखना उनकी बेहतरीन प्रबंधकीय क्षमता को दर्शाता है।
वर्तमान में भी वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव और सप्लाई चेन की बाधाओं के कारण कच्चे माल की कमी जैसी नई समस्याएं आ रही हैं। डॉ. कशिश के अनुसार, लागत को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन गुणवत्ता की कीमत पर नहीं। इसके लिए लीन मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमेशन और बेहतर सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है।
संघर्ष से मिली सफलता की राह
दिल्ली में एक पारंपरिक पंजाबी मुस्लिम परिवार में जन्मी डॉ. कशिश का सफर आसान नहीं रहा। जिस सामाजिक परिवेश में महिलाओं के काम करने को सहजता से नहीं लिया जाता था, वहाँ उन्होंने अपनी पढ़ाई और करियर के लिए कड़ा संघर्ष किया।
उनकी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली पब्लिक स्कूल से हुई। वर्ष 2004 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय से फार्मेसी में स्नातक (B.Pharm) किया। इसके बाद उन्होंने फार्मास्युटिक्स में मास्टर्स किया। मास्टर्स में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें स्वर्गीय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।
उन्होंने फार्मास्युटिक्स में पीएचडी भी पूरी की और उन्हें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी निदेशालय द्वारा 'इंस्पायर फेलोशिप' मिली। वे क्वालिटी एश्योरेंस की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। अपने ज्ञान को और निखारने के लिए वर्तमान में वह आईआईएम लखनऊ से एमबीए भी कर रही हैं। वे FOPIE युवा विंग की सदस्य व सचिव और IDMA (इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन) की सदस्य भी हैं।
कम उम्र में विवाह और परिवार की जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। इस दौरान उनके पिता ने उनका पूरा साथ दिया और सामाजिक दबावों से अलग हटकर हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

सामाजिक दायित्व और संदेश
डॉ. कशिश का जीवन केवल पेशेवर उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उनके छोटे बेटे को ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर है। इस अनुभव ने उनके जीवन को एक नया नजरिया दिया। अब वे विशेष रूप से सक्षम बच्चों और लोगों के कल्याण के लिए भी काम करने की दिशा में प्रयासरत हैं।
वे मानती हैं कि दवाओं का सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए और सेल्फ-मेडिकेशन से बचना चाहिए। युवाओं को संदेश देते हुए वे कहती हैं कि बुनियादी बातों को मजबूत रखें और सीखने की प्रक्रिया कभी न रोकें।
डॉ. कशिश अज़ीज़ की यह यात्रा यह साबित करती है कि अगर इरादे सही हों और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो किसी भी क्षेत्र में मिसाल कायम की जा सकती है।