फाज़िला अल्लाना ने बदली भारतीय रियलिटी टीवी की तस्वीर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 22-08-2026
The story of Fazila Allana, who laid the foundation for 'non-fiction' TV.
The story of Fazila Allana, who laid the foundation for 'non-fiction' TV.

 

मृदगंधा दीक्षित

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में सामाजिक, आर्थिक और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बड़े बदलाव हो रहे थे। इस बदलते और नए भारत की झलक यहां की मनोरंजन की दुनिया में भी साफ नज़र आ रही थी। नब्बे के दशक में 'केबल टीवी' ने जो क्रांति ला दी थी, उसके बाद भारतीय टीवी पर डेली सोप्स की जैसे बाढ़ आ गई थी। 'सास-बहू' के इन सीरियल्स ने तब हर घर के दर्शकों पर जादू सा कर दिया था।

ठीक इसी दौर में, टीवी को सिर्फ पारिवारिक रोने-धोने तक महदूदन रखकर, उसमें सच्चे इंसानों के सच्चे जज़्बात, साफ-सुथरा मुकाबला, अक्लमंदी और ग्लैमर भी शामिल करने की नब्ज़ एक नौजवान प्रोड्यूसर ने बिल्कुल सही पकड़ी। बहाव के खिलाफ तैरने की हिम्मत दिखाते हुए, भारत में 'नॉन-फिक्शन' और 'रियलिटी टीवी' का नया और चमकदार दौर लाने वाली इस दूरंदेश प्रोड्यूसर का नाम है फाज़िला अल्लाना।

मुंबई से अपने सफर की शुरुआत करके, आज ग्लोबल लेवल पर अपना दबदबा बनाने वाली 'सोलप्रोडक्शंस' (Sol Productions) की फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर फाज़िला अल्लाना का यह सफर बेहद प्रेरणादायक है। यह सफर एक कॉर्पोरेट टैलेंट और बेइंतहा हिम्मत वाली एक हुनरमंद बिज़नेसवुमन का है।

बचपन, तालीम और ग्लोबल नज़रिए की बुनियाद

किसी भी कामयाब बिज़नेसमैन के बनने में उसकी शुरुआती तालीम और आस-पास के माहौल का बहुत बड़ा हाथ होता है। 20 मई 1970 को दक्षिण मुंबई जैसे भीड़भाड़ वाले और कॉस्मोपॉलिटन इलाके में फाज़िला का जन्म हुआ। उनकी स्कूली तालीम मुंबई के मशहूर 'क्वीन मेरी स्कूल' में हुई। बचपन से ही उन पर मुंबई के इस तेज़-तर्रार कारोबारी और कॉस्मोपॉलिटन माहौल का असर था।

स्कूली तालीम के बाद कॉमर्स और इकोनॉमिक्स की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने 'सिडनहैम कॉलेज' में दाखिला लिया और 1991 में कॉमर्स में ग्रेजुएशन पूरी की। उनके अंदर के बिज़नेस हुनर, नफे-नुकसान के हिसाब-किताब और स्ट्रेटेजिक अप्रोच की पक्की बुनियाद यहीं रखी गई। आगे चलकर मीडिया जैसी अनिश्चित फील्ड में अपनी खुद की कंपनी खड़ी करते वक्त उन्हें इसका बहुत बड़ा फायदा मिला। ग्रेजुएशन के बाद कुछ साल उन्होंने फिनलैंड के 'ओउलु' (Oulu) शहर में काम किया। फिनलैंड में बिताए इसी वक़्त ने उनकी शख्सियत को एक ग्लोबल नज़रियादिया।

'यूटीवी' (UTV) का दौर और मलेशिया में कॉर्पोरेट तजुर्बा

फिनलैंड से भारत लौटने के बाद फाज़िला ने फौरन अपना कोई बिज़नेस शुरू करने की जल्दबाज़ी नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने 'यूटीवी' (UTV) जैसी जानी-मानी मीडिया कंपनी के साथ काम करना शुरू किया। सही मायनों में यह वक़्त उनके लिए मनोरंजन की दुनिया की 'ग्राउंड रियलिटी' को बारीकी से समझने का था। उनके मैनेजमेंट हुनर, वक़्त के सही इस्तेमाल और पैदाइशी लीडरशिप क्वालिटी को परखते हुए, 'यूटीवी' ने उन्हें मलेशिया के ऑपरेशन्स की ज़िम्मेदारी सौंप दी।

मलेशिया में काम करते हुए उन्होंने 'क्रॉस-बॉर्डर कंटेंट डेवलपमेंट' और ग्लोबल लेवल पर मीडिया प्रोजेक्ट्स का मैनेजमेंट बड़ी खूबी से संभाला। इंटरनेशनल लेवल पर असल में काम कैसे होता है, बजट कैसे संभाला जाता है और अलग-अलग देशों के टेक्नीशियन्स के साथ सही तालमेल कैसे बिठाना है, इसके सीधे सबक उन्होंने यहीं सीखे।

'सोल प्रोडक्शंस' (Sol Productions) की शुरुआत

मलेशिया में मिले तजुर्बे के बाद अपना खुद का कुछ बनाने की ख्वाहिश के साथ, जनवरी 2003 में फाज़िला ने अपनी 'यूटीवी' की साथी कामना निरुला मेनेज़ेस के साथ मिलकर 'सोल प्रोडक्शंस प्राइवेट लिमिटेड' (Sol Productions Pvt. Ltd.) की शुरुआत की। शुरुआती दौर में बहुत ही छोटे बजट और सीमित संसाधनों के साथ खड़ी हुई यह कंपनी, आज भारतीय टीवी पर हज़ारों घंटों का बेहतरीन 'नॉन-फिक्शन' कंटेंट बनाने वाली एक बहुत बड़ी संस्था बन चुकी है।

किसी भी कामयाब कॉर्पोरेट कंपनी को चलाने के लिए, वहां काम और ज़िम्मेदारियों का सही बंटवारा होना बहुत ज़रूरी होता है। फाज़िला ने कंपनी की 'क्रिएटिव डायरेक्शन', 'क्लाइंट रिलेशंस' और 'ऑपरेशनल ग्रोथ' की कमान अपने हाथों में रखी; तो दूसरी तरफ कामना ने प्रोडक्शन डिज़ाइन और रोज़मर्रा के कामों को बखूबी संभाला। इन दो मज़बूत महिलाओं की बेहतरीन 'लीडरशिप जोड़ी' ने उस वक़्त के 'फिक्शन' सीरियल्स की भीड़ में खोने के बजाय सीधे 'नॉन-फिक्शन' पर अपना ध्यान लगाया और देखते ही देखते 'सोल' को बहुत कम वक़्त में कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया।

शोज़ बनाने के पीछे की सोच और 'कॉफी विद करण' का जन्म

फाज़िला अल्लाना का शोज़ बनाने का नज़रिया हमेशा से ही ईमानदार और दर्शकों से सीधा जुड़ने वाला रहा है। भारतीय टीवी की तारीख बदल देने वाले और आज के 'पॉप-कल्चर' का एक अहम हिस्सा बन चुके शो 'कॉफी विद करण' की शुरुआत आखिर कैसे हुई, इस बारे में फाज़िला एक दिलचस्प किस्सा सुनाती हैं: "ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हमने इस शो को बहुत पहले से प्लान करके रखा था। जैसे कई शानदार क्रिएटिव आइडियाज़ अचानक ही आ जाते हैं, वैसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ। हम उस वक़्त 'स्टार परिवार अवार्ड्स' का काम देख रहे थे और चूंकि करण जौहर की फिल्मों में हमेशा 'परिवार' ही सबसे खास विषय होता है, इसलिए हमने उनसे वह अवार्ड शो होस्ट करने के लिए पूछा। लेकिन उस पर उन्होंने कहा कि, 'मुझे अवार्ड शो के बजाय कोई चैट शो करना ज़्यादा पसंद आएगा।' और इस तरह बिल्कुल सही वक़्त पर सही इंसान के मिलने से इस शो ने शक्ल ली।"

वह आगे बताती हैं, "हमारा असल मकसद ही इन सेलिब्रिटीज़ को एक आम इंसान की तरह दर्शकों के सामने लाना होता है। वे अपने खुद के घर में कैसे रहते हैं, उनकी कुछ मज़ेदार आदतें क्या हैं, उनके मन में कौन सा डर छिपा है, यह सब लोगों के सामने लाने की हमारी कोशिश होती है। क्योंकि, दर्शकों को अपने पसंदीदा स्टार्स के अंदर छिपा वह सच्चा 'इंसान' देखना पसंद होता है।"

टीवी पर 'ट्रेंडसेटर' ब्रांड्स और साहसिक प्रयोग

'कॉफी विद करण' के अलावा भी 'सोल प्रोडक्शंस' ने दर्शकों को कई आइकॉनिक शोज़ दिए हैं। 'नाच बलिये' जैसे सेलिब्रिटी डांस रियलिटी शो को तो उन्होंने भव्यता की एक नई बुलंदी पर पहुंचा दिया था। इस शो ने भारतीय रियलिटी शोज़ के बनाने के बजट और पेश करने के अंदाज़ को एक बहुत ऊंचे लेवल पर पहुंचा दिया था। इसके साथ ही उनकी 'स्वयंवर सीरीज़' (राखी का स्वयंवर, राहुल दुल्हनिया ले जाएगा) का प्रयोग भारतीय टीवी के इतिहास का सबसे साहसिक और उतना ही विवादितप्रयोग था। टीवी पर असल शादी के जश्न को रियलिटी शो में बदलने के इस शानदार आइडिया ने उस वक़्त टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। दर्शकों को असल में क्या देखना पसंद आएगा और उन्हें टीवी स्क्रीन के सामने कैसे बांध कर रखना है, इसकी फाज़िला को बहुत अच्छी समझ है। 'ज़रा नचके दिखा', 'क्या मस्त है लाइफ', 'माय का लाल' जैसे अलग-अलग शोज़ के ज़रिए उन्होंने नौजवानों और बच्चों के लिए भी कंटेंट बनाया।

प्लेटफॉर्म की सरहदें पार करता कॉर्पोरेट हुनर

किसी भी मॉडर्न कॉर्पोरेट कंपनी की असली कामयाबी बदलते वक़्त के हिसाब से खुद को ढालने की उसकी सलाहियतपर टिकी होती है। 'सोल प्रोडक्शंस' के काम करने का एक अहम कॉर्पोरेट उसूल है: "क्रिएशन, प्रोडक्शन और इम्प्लीमेंटेशन।" फाज़िला की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट खूबी अगर कोई है, तो वह है उनका 'प्लेटफॉर्म एग्नोस्टिक' नज़रिया। यानी, सिर्फ किसी एक चैनल या एक ही ज़बान पर निर्भर न रहकर, आज 'सोल प्रोडक्शंस' करीब 40 से ज़्यादा ब्रॉडकास्ट चैनलों और 'ओटीटी' (OTT) प्लेटफॉर्म्स के लिए अपना कंटेंट दे रहा है। उनके इसी बिज़नेस टैलेंट की एक और बेहतरीन मिसाल यह है कि उन्होंने कंपनी के बिज़नेस को सिर्फ हिंदी ज़बान तक महदूद न रखकर इसे 5 से ज़्यादा भाषाओं में फैलाया है।

फाज़िला अपने काम के इस मॉडल के बारे में बात करते हुए कहती हैं, "कोई भी शो हमारे लिए बहुत छोटा या बहुत बड़ा नहीं होता; हम हर शो को उसके बजट और क्रिएटिव ज़रूरत के हिसाब से ही डिज़ाइन करते हैं।" उनका यह लचीला बिज़नेस मॉडल 'सोल' को आज के इस कॉम्पिटिशन के दौर में दो कदम आगे रखता है। आज तक 50 से ज़्यादा शोज़ कामयाबी के साथ बनाना, उनके "क्रिएटिव माइंड्स, क्वालिटी प्रोडक्शंस और एक्सेस टू टैलेंट" (रचनात्मक दिमाग, बेहतरीन निर्माण और टैलेंट तक पहुंच) के नारे की सही मायनों में एक बहुत बड़ी कामयाबी है।

ग्लोबल पहचान और इंटरनेशनल पार्टनरशिप का 'मास्टरस्ट्रोक'

बिज़नेस को ग्लोबल लेवल पर ले जाने के लिए बेहद मज़बूत आर्थिक और रणनीतिक फैसले लेने की बहुत बड़ी सलाहियत चाहिए होती है। फाज़िला अल्लाना ने 2007-08 के आसपास 'जोडिएक मीडिया' (Zodiak Media - जो अब 'बनिजय ग्रुप' Banijay Group है) के साथ बहुत ही अक्लमंदी से रणनीतिक पार्टनरशिप की। उनके इस एक 'कॉर्पोरेट मास्टरस्ट्रोक' की वजह से 'सोल प्रोडक्शंस' को इंटरनेशनल फॉर्मेट्स सीधे भारत लाने और ग्लोबल लेवल पर बहुत बड़ी आर्थिक मदद हासिल करने का रास्ता साफ हो गया। किसी भारतीय प्रोडक्शन हाउस का ऐसे ग्लोबल मीडिया ग्रुप के साथ सीधी पार्टनरशिप करके अपना बिज़नेस बढ़ाना, फाज़िला शहाबुद्दीन अल्लाना की बिज़नेस अक्लमंदी की एक मिसाल है।

बदलते वक़्त के साथ खुद को ढालने का हुनर

2015 के बाद जब भारत में इंटरनेट सस्ता हुआ, तो देश में 'ओटीटी' प्लेटफॉर्म्स की एक बड़ी लहर ही आ गई। टीवी के सामने बैठने वाला दर्शक धीरे-धीरे अपने मोबाइल की तरफ मुड़ने लगा। इस बड़े बदलाव में कई पुराने प्रोड्यूसर्स पीछे छूट गए, लेकिन फाज़िला अल्लाना ने यहां भी खुद को मज़बूती से साबित कर दिखाया। डिजिटल दौर के इन नौजवान दर्शकों को असल में क्या चाहिए, इसकी सही पहचान करते हुए उन्होंने 'हॉटस्टार', 'नेटफ्लिक्स' और 'अमेज़ॉन प्राइम' जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए 'नॉन-फिक्शन वेब सीरीज़' बनाना शुरू किया। 'नेटफ्लिक्स' पर 'सोशल करेंसी' जैसे शोज़ के ज़रिए उन्होंने अपनी कंपनी के इस 'मल्टी-प्लेटफॉर्म फैलाव' को साबित कर दिखाया।

'सोल प्रोडक्शंस' आज जिस 'बनिजय ग्रुप' का एक अहम हिस्सा है, उस मुख्य 'बनिजय एशिया' बैनर के फैलाव में भी फाज़िला की रणनीतिक पार्टनरशिप और उनके लंबे तजुर्बे का बहुत बड़ा हाथ है। 'बनिजय एशिया' के बैनर तले बने 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' और 'रोअर ऑफ द लायन' जैसे भव्य ओटीटी प्रोजेक्ट्स, इसी ग्लोबल जुड़ाव और मिली-जुली कॉर्पोरेट ताकत की मिसाल माने जाते हैं।

मनोरंजन की दुनिया में 'कॉर्पोरेट डिसिप्लिन'

असल में मनोरंजन की फील्ड वहां के अनिश्चित समय, हंगामे और बदइंतज़ामी के लिए हमेशा से ही बदनाम रही है; लेकिन फाज़िला ने 'सोल प्रोडक्शंस' में सख्त 'कॉर्पोरेट डिसिप्लिन' लागू किया। अपने साथ काम करने वाले टेक्नीशियन्स, राइटर्स और कलाकारों को उन्होंने हमेशा एक महफूज़ और बेहद प्रोफेशनल माहौल दिया। मनोरंजन की फील्ड में नए कदम रखने वाले कलाकारों और टेक्नीशियन्स को सही ट्रेनिंग देने पर भी उनका हमेशा ज़ोर रहा है।

एक छोटे से प्रोडक्शन हाउस से शुरुआत करके एक बहुत बड़े मीडिया नेटवर्क का अहम हिस्सा बनने तक का उनका यह सफर हैरान कर देने वाला है। कड़ी टक्करवाली इस मनोरंजन की फील्ड में लगातार 21 सालों से ज़्यादा वक़्त तक एक प्रोडक्शन हाउस कामयाबी के साथ चलाना, कोई आम बात नहीं है। भारतीय टीवी की दुनिया पर अपनी एक अलग छाप छोड़ने वाली फाज़िला अल्लाना यकीनन 'नॉन-फिक्शन' दौर के आर्किटेक्ट्स में से एक हैं, ऐसा कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा।