भारत के फुटबॉल के सुनहरे दौर का सितारा: यूसुफ खान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 26-08-2026
A Star of Indian Football's Golden Era: Yusuf Khan
A Star of Indian Football's Golden Era: Yusuf Khan

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

जिस फुटबॉलर ने भारत को एशियाई खेलों में स्वर्ण दिलाया, ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया और एशिया की ऑल-स्टार टीम में जगह बनाई, उसके जीवन का आखिरी दौर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। यह कहानी है भारतीय फुटबॉल के उन गुमनाम नायकों में से एक मोहम्मद यूसुफ खान की, जिन्हें कभी एशिया के बेहतरीन खिलाड़ियों में गिना जाता था। 1960 के रोम ओलंपिक में भारत की जर्सी पहनने वाले यूसुफ खान 1962 की ऐतिहासिक एशियन गेम्स स्वर्ण पदक विजेता टीम का हिस्सा थे और 1966 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

हैदराबाद से निकला फुटबॉल का ‘बियर्डेड हॉर्स’

5 अगस्त 1937 को हैदराबाद में जन्मे यूसुफ खान मिडफील्डर के रूप में खेलते थे। उनका घरेलू फुटबॉल करियर हैदराबाद सिटी पुलिस से जुड़ा रहा और उन्होंने हैदराबाद के लिए संतोष ट्रॉफी में भी खेला। उनकी खेल शैली में बेहतरीन बॉल कंट्रोल, मेहनत और मैदान के बीच से खेल को नियंत्रित करने की क्षमता थी।
 
उनके खेल के अंदाज के कारण उन्हें ‘बियर्डेड हॉर्स’ यानी ‘दाढ़ी वाला घोड़ा’ जैसे उपनाम से भी याद किया गया। यह वह दौर था जब भारतीय फुटबॉल आज की तरह करोड़ों रुपये और चमकदार लीगों का खेल नहीं था। खिलाड़ियों के पास आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन देश के लिए खेलने का जुनून था। यूसुफ खान इसी पीढ़ी का हिस्सा थे, जिसने भारतीय फुटबॉल का सुनहरा दौर बनाया।
 
रोम ओलंपिक से एशिया की चोटी तक

यूसुफ खान को 1960 के रोम ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल टीम में जगह मिली। वह उस भारतीय टीम का हिस्सा थे जिसने दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर देश का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि अभी बाकी थी।
 
1962 के जकार्ता एशियन गेम्स में भारतीय टीम ने इतिहास रचते हुए फुटबॉल का स्वर्ण पदक जीता। भारत ने फाइनल में दक्षिण कोरिया को 2-1 से हराया और यूसुफ खान इस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा थे। उस समय भारत एशिया की मजबूत फुटबॉल टीमों में गिना जाता था और यूसुफ खान की मिडफील्ड में मौजूदगी टीम की ताकत थी।
 
 
सिर्फ भारत नहीं, पूरे एशिया ने पहचानी प्रतिभा

यूसुफ खान का खेल इतना प्रभावशाली था कि उन्हें भारत की सीमा से बाहर भी पहचान मिली। 1965 में वह Asian All Stars XI में चुने जाने वाले सिर्फ दो भारतीय खिलाड़ियों में शामिल थे।
 
अगले वर्ष, 1966 में भी उनका चयन एशियन ऑल-स्टार टीम में हुआ। यह उपलब्धि उस समय बेहद बड़ी थी। आज किसी भारतीय फुटबॉलर का एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीम में चयन होना चर्चा का विषय बन सकता है, लेकिन यूसुफ खान ने उस दौर में यह मुकाम हासिल किया जब भारतीय फुटबॉल की अंतरराष्ट्रीय पहचान अभी बन ही रही थी।
 
1964: एशिया कप में भारत का रजत

यूसुफ खान की उपलब्धियों में 1964 का AFC Asian Cup भी शामिल है। भारत ने उस टूर्नामेंट में उपविजेता रहते हुए रजत पदक हासिल किया। इसके अलावा वह 1964 में Merdeka Tournament में भारत की उपविजेता टीम और 1965 की तीसरे स्थान पर रहने वाली टीम का भी हिस्सा रहे। यानी कुछ ही वर्षों में यूसुफ खान ने ओलंपिक, एशियन गेम्स, एशियन कप और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
 
अर्जुन अवॉर्ड ने दी पहचान

इन लगातार शानदार उपलब्धियों के बाद 1966 में यूसुफ खान को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह उनके करियर का एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मान था। उस समय अर्जुन पुरस्कार अपेक्षाकृत नया था और देश के चुनिंदा खिलाड़ियों को ही दिया जाता था। उनका अर्जुन अवॉर्ड केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं था, बल्कि भारतीय फुटबॉल के उस स्वर्णिम दौर की भी पहचान था, जब देश की टीम एशिया की शीर्ष टीमों को चुनौती दे रही थी।
 
लेकिन असली संघर्ष मैदान छोड़ने के बाद शुरू हुआ

यूसुफ खान की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा उनकी उपलब्धियों के बाद का जीवन है। जिस खिलाड़ी ने देश को एशियन गेम्स का स्वर्ण दिलाया था, उसके जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ गईं। 2003 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वह सीमित पेंशन पर जीवन गुजार रहे थे। उनके स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ा था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, खेल के दौरान लगी सिर की चोटों के बाद वह पार्किंसन जैसी बीमारी से जूझ रहे थे।
 
यह स्थिति भारतीय खेल व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल भी छोड़ती है क्या देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने वाले खिलाड़ियों को उनके संन्यास के बाद भी वह सम्मान और सुरक्षा मिलती है, जिसके वे हकदार हैं? यूसुफ खान की जिंदगी इस सवाल का बेहद मार्मिक उदाहरण बन गई।
 
आखिरी सफर

1 जुलाई 2006 को हैदराबाद में यूसुफ खान का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र करीब 69 वर्ष थी। वह अपने पीछे पदकों और पुरस्कारों से कहीं बड़ी विरासत छोड़ गए एक ऐसा दौर, जब भारत एशिया में फुटबॉल की ताकत था और खिलाड़ी देश के लिए खेलने को सबसे बड़ा सम्मान मानते थे। आज यूसुफ खान हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी भारतीय फुटबॉल के इतिहास में एक जरूरी अध्याय है।
 
1960 के ओलंपियन, 1962 के एशियन गेम्स चैंपियन, एशियन ऑल-स्टार और 1966 के अर्जुन अवॉर्डी यूसुफ खान सिर्फ एक फुटबॉलर नहीं थे, वह उस भारत की पहचान थे जिसने फुटबॉल में एशिया को चुनौती दी थी। और शायद उनकी कहानी हमें सबसे जरूरी बात यही सिखाती है कुछ नायकों को इतिहास ने भले भुला दिया हो, लेकिन उनकी उपलब्धियों को नहीं भुलाया जाना चाहिए।