अरविंद कुमार
उर्दू के महान शायर मीर तकी मीर मिर्ज़ा ग़ालिब से कम बड़े शायर नहीं थे।ग़ालिब ने तो खुद लिखा है - रेख्ता के तुम ही नहीं थे उस्ताद ग़ालिब,कहते हैं अहले ज़माने में कोई मीर भी था।लेकिन आज का जमाना मीर का है और मुस्तकबिल भी मीर का है-यह बात जामिया मिलिया के पूर्व डीन एवम अंग्रेजी के प्रमुख तथा प्रसिद्ध अनुवादक अनीसुर्रहमान रहमान ने इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के जलसे में अपनी किताब The Essential Miir किताब पर चर्चा में कही।
हार्पर कोलिन्स ने इस वर्ष जनवरी में यह किताब छापी है।उनकी नज्मों और गज़लों के अंग्रेजी अनुवाद की भी छप चुकी है।मीर की पैदाइश 1723 में आगरा में हुई जबकि इंतकाल 1810 में लखनऊ में हुआ।
चर्चा में दास्तानगोई के उस्ताद महमूद फारूकी और जामिया उर्दू विभाग के प्रोफेसर अहमद महफूज ने भी हिस्सा लिया।इस अवसर पर इस्लामिक कल्चरल सेंटर के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद भी मौजूद थे। जलसे को कंडक्ट मेहर आलम खान ने किया और ख्वाजा शाहिद ने पहले सब मेहमानों का तआरुफ़ कराया।
रहमान इससे पहले The Essential Ghalib भी लिख चुके हैं और उर्दू शायरी का काफी अनुवाद कर चुके हैं।उन्होंने बताया कि मीर के 8 दीवानों से 200 शेर चुनकर उनक़ा अंग्रेजी में तजुर्मा किया फिर उसके मायने भी नीचे दिए है।इस किताब में नागरी अंग्रेजी और उर्दू में भी शेर हैं
उन्होंने बताया कि उन्होंने शायरी में अपनी दिलचस्पी के कारण फ़ारसी भी घर पर सीखी क्योंकि बिना फारसी जाने फिरदौसी और ग़ालिब को भी समझ नहीं सकते।
उन्होंने बताया कि जब वे जामिया में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाते थे तो जॉन डन जैसे कवियाँ को पढ़ाते हुए उर्दू के ग़ालिब और मीर भी याद आते थे जब हमने तुलना करते हुए बताया तो छात्र चौंक गए।
उन्होंने कहा कि यह आम धारणा है कि मीर सहज सरल सादे शायर हैं और रोने धोने वाले कलाम लिखे हैं जबकि सच है कि उनकी शायरी भीतर से गहरी है और उनमें मायनों के कई आयाम हैं।
उन्होंने कहा कि मीर उन्हें इतने पसंद है कि जब फारूकी ने दस्ताने मीर नाम से दास्तानगोई पेश की तो उन्होंने तीन बार देखा।.
प्रोफेसर रहमान ने लोगों से अपील की कि दास्ताने मीर जरूर देखें इससे लोगों को मीर को जानने और उनकी शायरी की अहमियत को समझने में मदद मिलेगी।उन्होंने बताया कि अब वे The Essential of Amir khusro भी निकाल रहे हैं। अमीर ख़ुसरो हिंदवीं के पहले लेखक हैं।
प्रोफेसर अहमद महफूज ने कहा कि मीर पर पहली किताब 1880 में आई लेकिन मीर को सीधा साधा सादगी से भरा शायर कहकर एक तरह से उनकी अहमियत को कम करना था लेकिन फारूकी साहब ने 2013 में चार खण्ड़ों में तनक़ीद लिखकर बताया कि मीर बहुत गहरे और बड़े अज़ीम शायर हैं ।उनकी शायरी ऊपर से सादगी से भले भरी हो पर बात बहुत सूक्ष्म और गहरी है।
उन्होंने कहा कि मीर और ग़ालिब दुनिया मे इतने मशहूर हैं कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर फ्रांसिस डब्लू प्रिट्शेट् ने इन दोनों पर एक वेबसाइट ही बना दी है जिस पर सारे कलाम हैं। फारूकी ने कहा कि प्रोफेसर रहमान जामिया से रिटायर होने के बाद उर्दू की बड़ी सेवा कर रहे हैं और इतने महत्वपूर्ण किताबें निकाल रहे।अगर वे रिटायर होने से पहले ही अवकाश लेकर यह काम करते तो उर्दू और अंग्रेजी की दुनिया इससे लाभान्वित होतींI