
मंजीत ठाकुर
गुरुवार का दिन पश्चिम बंगाल के लिए ही नहीं, केंद्र की राजनीति के लिए भी निर्णायक साबित होने वाला है. पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में से 152 सीटों पर पहले दौर मतदान गुरुवार को होना, इस चुनाव के परिणाम की दिशा तय करने वाला ‘मेक-ऑर-ब्रेक’ क्षण है. इस रपट में हम उत्तर बंगाल की वादियों से लेकर जंगल महल के पठारों और मेदिनीपुर के तटीय क्षेत्रों तक फैली इन सीटों के राजनीतिक मिजाज का विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं.
पहले यह समझते हैं कि आखिर वोटिंग सूबे कि किन इलाकों में होनी है. पहले चरण की 152 सीटें राज्य के भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से विविधतापूर्ण हिस्सों में फैली हुई हैं. मुख्य रूप से इसे तीन बड़े क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है:

उत्तर बंगाल
इनमें से पहला इलाका है उत्तर बंगाल का. इस इलाके में 54 सीटों पर वोटिंग होनी है जो कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, मालदा और दिनाजपुर जिलों की हैं. इस इलाके को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है.2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यहाँ जबरदस्त प्रदर्शन किया था.
इस बार रुझान बताते हैं कि भाजपा अपनी बढ़त बरकरार रखने के लिए ‘उत्तर बंगाल के अलग विकास’ और ‘सीएए’ के क्रियान्वयन पर जोर दे रही है. वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘चाई सुंदरी’ जैसी योजनाओं और चाय बागान श्रमिकों के वेतन वृद्धि के कार्ड से सेंधमारी की कोशिश की है.
जंगल महल: चुनावी बिसात पर पहचान और विकास की जद्दोजहद
जंगल महल आदिवासी बहुल इलाका है और यहां संताल जनजाति के लोगों की आबादी अधिक है. यहां 42 सीटों पर वोटिंग होनी है और यह सीटें पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों की हैं. राजनैतिक रूप से फिलहाल इसे मिश्रित प्रभाव वाला माना जा सकता है जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस वापसी की राह पर है तो यह भाजपा के लिए भी किले सरीखा है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘जंगल महल’ केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी का वह गलियारा है जहाँ हार-जीत की लहरें पूरे राज्य का रुख तय करती हैं. झाड़ग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुरा की लाल माटी पर पसरी शांति इस बार एक प्रचंड राजनीतिक तूफान का संकेत दे रही है. यहाँ पहले चरण का मतदान केवल प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आदिवासी अस्मिता, ‘कुड़मी’ आंदोलन और विकास के दावों के बीच जंगल महल में क्या धड़क रहा है.
जंगल महल का राजनीतिक सफर नाटकीय उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. एक समय वामपंथ का अभेद्य दुर्ग रहा यह क्षेत्र माओवादी उग्रवाद की विभीषिका से झुलसा, जिसके बाद 2011 में टीएमसी ने यहाँ शांति और विकास के नाम पर अपना वर्चस्व स्थापित किया. किंतु, 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहाँ एक बड़ी सेंध लगाई और 6 में से 5 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की.
हालांकि, 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने 40 में से 24 सीटें जीतकर शानदार वापसी की, जबकि भाजपा 16 सीटों पर सिमट गई. 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी ने अपनी बढ़त और मजबूत की है, जहाँ वह 30 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही. यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव यहाँ सत्ता पक्ष के लिए अपनी पकड़ बचाए रखने और विपक्ष के लिए पुनरुत्थान की लड़ाई बन गया है.
#WATCH | West Bengal Elections 2026 | Long queues of voters formed outside a polling station in Birbhum as polling for the first phase of State Assembly elections begins. pic.twitter.com/3g0WBwSV6L
— ANI (@ANI) April 23, 2026
अस्मिता की राजनीति: राष्ट्रपति और आदिवासी सम्मान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार जंगल महल के चुनावी अभियान में ‘आदिवासी सम्मान’ को केंद्र में रखा है. उत्तर बंगाल के संताल सम्मेलन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके मंत्रियों की अनुपस्थिति को भाजपा ने ‘आदिवासियों का अपमान’ करार दिया है.
प्रधानमंत्री का तर्क है कि राज्य सरकार ने न केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया, बल्कि एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति के प्रति अपनी उपेक्षा भी प्रदर्शित की.जबाव में, ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपनी ‘कल्याणकारी योजनाओं’ का सुरक्षा चक्र पेश किया है.
वे आदिवासियों के लिए लागू की गई शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास योजनाओं को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बता रही हैं. साथ ही, उन्होंने भाजपा के ‘समान नागरिक संहिता’ के वादे को आदिवासियों की सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बताकर एक नया मोर्चा खोल दिया है.
जंगल महल का कुर्मी फैक्टर
जंगल महल के चुनावों में इस बार सबसे निर्णायक मोड़ कुर्मी समुदाय की नाराजगी और उनकी मांगें हैं. पुरुलिया, झाड़ग्राम और बांकुरा की कई सीटों पर जीत-हार का फैसला करने वाले कुड़मी (ओबीसी) लंबे समय से खुद को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने और अपनी भाषा ‘कुरमाली’ को आठवीं अनुसूची में जोड़ने की मांग कर रहे हैं.
जहाँ कुड़मी समुदाय अपनी मांग पर अड़ा है, वहीं वर्तमान आदिवासी समुदाय (विशेषकर संताल) कुड़मियों को एसटी दर्जा देने का विरोध कर रहे हैं.भाजपा ने इस असंतोष को भांपते हुए कुड़मी आंदोलन के प्रमुख चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा है. झाड़ग्राम के गोपीबल्लभपुर से राजेश महतो और पुरुलिया के जयपुर से विश्वजीत महतो की उम्मीदवारी यह संकेत देती है कि भाजपा कुड़मी मतों के ध्रुवीकरण के सहारे अपनी खोई जमीन वापस पाना चाहती है.
विकास बनाम तुष्टीकरण
प्रधानमंत्री मोदी ने जंगल महल की लड़ाई को ‘विकास बनाम तुष्टीकरण’ के रूप में अपने भाषणों में उल्लेख किया है. भाजपा का आरोप है कि टीएमसी ने आदिवासियों की जमीनें हड़पी हैं और क्षेत्र को भ्रष्टाचार और डर के चक्र में फंसा दिया है.
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता इस क्षेत्र से ‘माओवाद का अंत’ और ‘शांति की बहाली’ है. मुख्यमंत्री का दावा है कि उनके शासन में जंगल महल की सड़कों पर अब खून नहीं, बल्कि खुशहाली बहती है.
दिलचस्प बात यह है कि राज्य के अन्य हिस्सों में एक तरफ एसआईआर और मतदाताओं का नाम कटने का बड़ा विवाद खड़ा है, लेकिन जंगल महल इस विवाद से अछूता है. यहाँ मतदाता सूची से नाम हटने के मामले काफी कम हैं, जिसका अर्थ है कि यहाँ की लड़ाई प्रशासनिक विसंगतियों के बजाय सीधे तौर पर विचारधारा और सामाजिक समीकरणों पर टिकी है.
जंगल महल का चुनाव इस बार किसी एक मुद्दे पर केंद्रित नहीं है. यहाँ एक ओर ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं से लाभान्वित महिला मतदाता हैं, तो दूसरी ओर एसटी दर्जे की मांग को लेकर सड़कों पर उतरा युवा कुड़मी नेतृत्व. जहाँ भाजपा ‘राष्ट्रपति के अपमान’ को भावनात्मक मुद्दा बनाकर आदिवासियों को जोड़ रही है, वहीं ममता बनर्जी ‘शांति की गारंटी’ बनकर खड़ी हैं.

दक्षिण बंगाल
दक्षिण बंगाल के पहले दौर में 56 सीटों पर वोटिंग होनी है और पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम वर्धमान और मुर्शिदाबाद जिलों में यह सीटे हैं. राजनैतिक रूप से यहां कांग्रेस प्रभावशाली रही है लेकिन हाल के बरसों में यह तृणमूल के किले में तब्दील हो गई है. अगर कांग्रेस का प्रभावशाली साबित हुई तो भाजपा के लिए जीत की राह भी तैयार होने की संभावना है.
किस तरफ बह रही है चुनावी हवा?
मौजूदा रुझानों को देखें तो मुकाबला ‘त्रिकोणीय’ होने के बजाय मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच ‘आमने-सामने’ की जंग में तब्दील हो गया है, हालांकि मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन की धमक ने समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है.
नंदीग्राम और मेदिनीपुर का ‘ईगो वॉर’ भी बेहद दिलचस्प है. पहले चरण की सबसे चर्चित सीट नंदीग्राम है. यहाँ की हवा में तनाव और उत्साह दोनों है. शुभेन्दु अधिकारी के गढ़ में ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है. यहाँ का रुझान बताता है कि मतदाता ‘स्थानीय पहचान’ और ‘सरकारी योजनाओं’ के बीच बंटा हुआ है.
जानकारों के मुताबिक, मुर्शिदाबाद का ‘एक्स-फैक्टर’ भी इस बार कारगर साबित हो सकता है. यहाँ मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण किसके पक्ष में होगा, यही तथ्य 152 सीटों के पूरे नतीजे को प्रभावित करेगा.
यदि कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन यहाँ मजबूत होता है, तो यह सीधे तौर पर टीएमसी के ‘वोट बैंक’ में सेंध लगाएगा.अगर सीधा प्रश्न पूछा जाए कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के इस पहले चरण में मतदाता किन मुद्दों पर बटन दबाएगा तो इसका जवाब जमीनी स्तर पर चार प्रमुख मुद्दों के रूप में उभर कर सामने आते हैं.
पहला है, लक्ष्मी भंडार और कल्याणकारी योजनाएं. टीएमसी के पक्ष में सबसे बड़ी ‘खामोश’ लहर महिलाओं की हो सकती है. लक्ष्मी भंडार योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता ग्रामीण बंगाल में एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो रही है.
ग्रामीण महिलाएं इसे ‘ममता दीदी’ के सीधे आशीर्वाद के रूप में देख रही हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपों पर भारी पड़ता दिख रहा है.दूसरा बड़ा मुद्दा है, भ्रष्टाचार और केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता. भाजपा समेत पूरे विपक्ष ने ‘शिक्षक भर्ती घोटाले’ और केंद्रीय एजेंसियों यानी ईडी और सीबीआइ की कार्रवाई को मुख्य हथियार बनाया है. आसनसोल और दुर्गापुर जैसे शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मध्यवर्ग के बीच ‘भ्रष्टाचार’ एक बड़ा मुद्दा है.
जंगलमहल और उत्तर बंगाल के जिलों में युवाओं के बीच ‘पलायन’ एक बड़ी चिंता है. उद्योगों की कमी और रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाने की मजबूरी के कारण युवा मतदाताओं में सत्ताविरोधी स्वर सुनाई दे रहे हैं.
चौथा महत्वपूर्ण मुद्दा है, मतुआ और राजबंशी पहचान यानी सीएए का प्रभाव.बंगाल के सरहदी इलाकों मे सीएए के लागू होने के बाद मतुआ और राजबंशी समुदायों का रुझान निर्णायक होगा. भाजपा इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है, जबकि टीएमसी इसे ‘नागरिकता छीनने की साजिश’ के रूप में प्रचारित कर रही है.
#WATCH | West Bengal | Security tightened in polling booths, authorities in Murshidabad district have ramped up surveillance measures, deploying Static Surveillance Teams (SST) and establishing multiple naka check-posts across key locations, particularly in the Behrampur assembly… pic.twitter.com/KZ9V0yn6nm
— ANI (@ANI) April 22, 2026
कैसी है तैयारी?
चुनाव आयोग ने पहले चरण के लिए केंद्रीय बलों की 850 से अधिक कंपनियों को तैनात किया है. बंगाल चुनाव में ‘चुनावी हिंसा’ का इतिहास रहा है, इसलिए मतदाताओं के मन में सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न है.
रुझान यह भी बताते हैं कि यदि मतदान शांतिपूर्ण और अधिक (यानी 80 फीसद से ऊपर) होता है, तो यह अक्सर सत्ताविरोधी लहर माना जाता है. हालांकि, बंगाल जैसे राज्य में 75 से 80 फीसद तक मतदान सामान्य बात है. दूसरी तरफ, मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद अन्य राज्यों में भी मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई है. ऐसे में, बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत सत्ताविरोधी रुझान का संकेत नहीं भी हो सकता है.
इसके साथ ही, यदि महिला मतदाता बड़ी संख्या में निकलती हैं, तो यह सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के लिए ‘कवच’ का काम कर सकता है.23 अप्रैल का मतदान इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या भाजपा 2024 के लोकसभा प्रदर्शन को विधानसभा में दोहरा पाएगी या ममता बनर्जी का ‘कल्याणकारी राजनीति’ (जिसे आलोचक खैरात की राजनीति कहते हैं) का मॉडल उनकी सत्ता की रक्षा करेगा.इन 152 सीटों में से जो भी दल 85-90 का आंकड़ा पार करेगा, उसके लिए 4 मई को नबन्ना (सचिवालय) की सीढ़ियाँ चढ़ना बहुत आसान हो जाएगा.
( लेखक आवाज द वाॅयस के एवी संपादक हैं . इनकी पश्चिम बंगाल की राजनीति पर आधारित पुस्तक ‘ बंगाल में भाजपा’ पेंगुइन.स्वदेश से प्रकाशित हो चुकी है.)