ओनिका माहेश्वरी / नई दिल्ली
नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में ‘आवाज़-ए-ख़वातीन’ (एनजीओ) द्वारा आयोजित पैनल चर्चा “भारत में मुस्लिम महिलाएं: अधिकार, वास्तविकताएं और चुनौतियां” केवल एक औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत, सामाजिक सोच, कानून और पहचान के बहुआयामी पहलुओं पर गहन मंथन का मंच बनकर उभरी। इस चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए केवल नीतियों या धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इतिहास, समाज, साहित्य और वर्तमान वास्तविकताओं को साथ लेकर देखने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट की प्रो. सबीहा हुसैन, CRDDP और AICWETE की चेयरपर्सन डॉ. शबिस्तां गफ्फार और सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड फिरदौस कुतुब वानी ने अपने विचार साझा किए। सभी वक्ताओं ने अपने अनुभवों और अध्ययन के आधार पर मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, संसाधनों की कमी, सामाजिक बाधाओं और संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की।
चर्चा के दौरान यह बात उभरकर सामने आई कि संवैधानिक अधिकारों और जमीनी सच्चाई के बीच गहरी खाई मौजूद है। शिक्षा और रोजगार तक सीमित पहुंच, कानूनी जागरूकता की कमी, सामाजिक दबाव और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का अभाव—ये सभी कारक मुस्लिम महिलाओं की प्रगति में बाधा बन रहे हैं। यह भी कहा गया कि महिलाएं अपने अधिकारों से परिचित तो हैं, लेकिन समाज और परिवार के डर के कारण वे आगे नहीं आ पातीं।
वक्ताओं ने साहित्यकार महादेवी वर्मा और इस्मत चुगताई के उदाहरण देते हुए कहा कि साहित्य समाज का आईना है, जो महिलाओं की वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करता है। लंबे समय तक महिलाओं को एक “इंसान” के बजाय केवल “महिला” के रूप में देखने की सोच ने उनकी पहचान और स्वतंत्रता को सीमित किया है।

प्रो. सबीहा हुसैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि मुस्लिम महिलाओं को केवल इस्लामिक नजरिए से देखना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। उन्होंने “राइट्स, रिसोर्सेज, रियलिटीज और रोडब्लॉक्स” के चार आयामों के जरिए मुद्दों को समझने की जरूरत बताई। अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वे बिहार से जेएनयू पहुंचने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं और बिना शैक्षणिक पृष्ठभूमि के भी उन्होंने यह मुकाम हासिल किया। उन्होंने कहा कि प्रतिभा के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती, लेकिन इसके लिए सही मार्गदर्शन और शिक्षकों की भूमिका बेहद अहम है, जो केवल शिक्षक ही नहीं बल्कि काउंसलर भी होते हैं।
डॉ. शबिस्तां गफ्फार ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति का मूल कारण धर्म नहीं, बल्कि गरीबी और संसाधनों की कमी है। उन्होंने शिक्षा की खराब गुणवत्ता, बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता और बढ़ती आर्थिक असमानता को प्रमुख समस्या बताया—“गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी नीतियां जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं हो पा रही हैं और मुस्लिम महिलाओं के शैक्षणिक संस्थानों की कमी तथा उनके बंद होने की समस्या पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
कानूनी पहलुओं पर चर्चा करते हुए यह बात सामने आई कि भारत में महिलाओं के लिए पर्याप्त कानून मौजूद हैं—चाहे वह वैवाहिक अधिकार हों या अन्य संरक्षण—लेकिन उनकी पहुंच और उपयोग अब भी सीमित है। वक्ताओं ने कहा कि अक्सर घरों में लड़कियों को निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाता, चाहे वह शिक्षा हो, करियर हो या जीवन के अन्य महत्वपूर्ण फैसले।

फिरदौस कुतुब वानी ने महिलाओं को अपने जीवनसाथी का चयन सोच-समझकर करने की सलाह देते हुए कहा कि “ऐसा साथी चुनें जो आपको समर्थन दे, केवल अनुमति नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि परिवार में भावनात्मक समर्थन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
पहचान के सवाल पर भी चर्चा हुई, जहां हिजाब या स्कार्फ को बोझ नहीं बल्कि व्यक्तिगत पहचान के रूप में देखने की बात कही गई। एक उदाहरण देते हुए बताया गया कि कई महिलाएं अपनी पहचान को गर्व से अपनाती हैं और इसे अपनी विशिष्टता के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
चर्चा में यह भी सामने आया कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो रूढ़ियों और भेदभाव को तोड़ सकती है। वक्ताओं ने “इक्वैलिटी” (समानता) के बजाय “इक्विटी” (न्यायसंगत अवसर) पर जोर देते हुए कहा कि हर महिला को उसकी परिस्थितियों के अनुसार अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, धार्मिक और सामुदायिक नेतृत्व की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया कि समाज में सकारात्मक संदेश और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
डॉ. गफ्फार ने अपने अनुभव साझा करते हुए सांस्कृतिक विविधता और शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया, वहीं यह भी कहा गया कि धर्म किसी की विरासत नहीं, बल्कि समझ और अभ्यास का विषय है। महिलाओं को भी धार्मिक ज्ञान और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
चर्चा के दौरान यह विचार भी सामने आया कि केवल “महिला दिवस” या अन्य प्रतीकात्मक दिवस मनाने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि सशक्तिकरण के लिए निरंतर और ठोस प्रयास जरूरी हैं।
अंत में, संवाद सत्र में प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई और यह सहमति बनी कि मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए शिक्षा, जागरूकता, कानूनी पहुंच, सामाजिक समर्थन और नीतिगत सुधार—इन सभी पर एक साथ काम करने की आवश्यकता है। यह कार्यक्रम न केवल संवाद का मंच बना, बल्कि आगे की दिशा तय करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी साबित हुआ।