Muslim woman has been spearheading the Ganesh Utsav for 18 years; Zubeida's initiative has become an example of Hindu-Muslim unity
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कर्नाटक के कॉफी के लिए मशहूर चिक्कमगलुरु जिले के एक छोटे से कस्बे में गणेश उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। पंडाल सज रहा है, महिलाएं परिसर की सफाई और रंगोली बनाने में जुटी हैं और युवा गणपति की प्रतिमा स्थापित करने की तैयारियों में लगे हैं। लेकिन इस पूरे आयोजन की सबसे खास तस्वीर पंडाल की सजावट या गणपति की प्रतिमा नहीं, बल्कि वह महिला हैं जो पिछले 18 वर्षों से इस धार्मिक आयोजन की अगुवाई कर रही हैं। उनका नाम है जुबेदा और वह मुस्लिम समुदाय से आती हैं।
नरसिंहराजपुरा (एनआर पुरा) टाउन पंचायत की अध्यक्ष जुबेदा पिछले करीब 18 वर्षों से राजीवनगर श्री विनायक सेवा समिति की अध्यक्ष के रूप में गणेश उत्सव का आयोजन करा रही हैं।
हर साल समिति की ओर से तीन दिनों के लिए गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस दौरान पूजा-पाठ, गणपति होम, सत्यनारायण पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की पूरी व्यवस्था जुबेदा की देखरेख में होती है।
उनके लिए यह किसी दूसरे धर्म के आयोजन में महज औपचारिक भागीदारी नहीं, बल्कि अपने कस्बे के लोगों के साथ मिलकर त्योहार मनाने और समाज को जोड़ने की एक परंपरा है।
जुबेदा की कहानी उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब धर्म और जाति के नाम पर समाज में दूरियां बढ़ाने की कोशिशें दिखाई देती हैं। एनआर पुरा की यह महिला अपनी धार्मिक पहचान को पूरी आस्था के साथ निभाते हुए दूसरे समुदाय के त्योहारों में भी उतनी ही आत्मीयता से शामिल होती हैं।
यही वह सहजता है, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और विविधता में एकता की उस परंपरा को जीवंत करती है, जिसमें त्योहार सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि रिश्तों और भरोसे को मजबूत करने का जरिया भी होते हैं।
जुबेदा के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत केवल प्रतिमा स्थापित करने से नहीं होती। वह आयोजन से पहले महिलाओं को पंडाल और आसपास के परिसर की साफ-सफाई के लिए प्रेरित करती हैं।
महिलाएं मिलकर परिसर को साफ करती हैं और रंग-बिरंगी रंगोलियां बनाती हैं। स्थानीय युवा पंडाल तैयार करने में सहयोग करते हैं। प्रतिमा की स्थापना से लेकर विसर्जन तक पूजा की सभी परंपराओं को निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार पूरा कराने की जिम्मेदारी भी समिति की अध्यक्ष के तौर पर जुबेदा निभाती हैं।
लेकिन उनकी भूमिका एक पंडाल तक सीमित नहीं है। वह कस्बे के दूसरे गणेश पंडालों में भी जाती हैं, वहां पूजा-अर्चना में शामिल होती हैं और जरूरत पड़ने पर आयोजन में सहयोग करती हैं। हिंदू परिवारों के त्योहारों में शामिल होना, उनके घर जाना, प्रसाद ग्रहण करना और उनके सुख-दुख में साथ खड़ा होना उनके लिए कोई असाधारण बात नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सामाजिक जिंदगी का हिस्सा है।
जुबेदा की सोच को उनके अपने शब्दों से बेहतर शायद ही कोई और बयान कर सके। वह कहती हैं, “मैं खुद को पहले भारतीय मानती हूं। धर्म और जाति बाद में आते हैं। मैं सभी धर्मों का सम्मान करती हूं और अपने धर्म के प्रति भी पूरी तरह आस्था रखती हूं। मेरे लिए धर्म से ज्यादा इंसानियत महत्वपूर्ण है।”
उनकी यही सोच एनआर पुरा की सामाजिक जिंदगी में भी दिखाई देती है। जुबेदा बताती हैं कि जिस तरह वह और उनके परिवार के लोग हिंदू त्योहारों में शामिल होते हैं, उसी तरह दूसरे समुदायों के लोग भी मुस्लिम त्योहारों के दौरान उनके साथ खड़े होते हैं। उनके मुताबिक, जब लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं तो केवल खुशियां ही साझा नहीं होतीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति भरोसा और अपनापन भी मजबूत होता है।
गणेश उत्सव के साथ जुबेदा की सामाजिक भागीदारी का दायरा और भी बड़ा है। वह कार्तिक दीपोत्सव समिति की सचिव भी हैं और अश्वत्थकट्टे के पास नागरबन में होने वाले कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। दीपावली के दौरान वह अपने घर को दीपों से सजाती हैं और दूसरे समुदायों के त्योहारों में भी उसी आत्मीयता से शामिल होती हैं।
स्थानीय लोगों के बीच उनकी पहचान सिर्फ एक समिति की अध्यक्ष की नहीं है। एनआर पुरा की निवासी शांतम्मा उन्हें महिलाओं के लिए संकट के समय मदद करने वाली ‘धर्म देवते’ के समान मानती हैं।
उनका कहना है कि जुबेदा त्योहारों के दौरान गरीब हिंदू महिलाओं की आर्थिक मदद भी करती हैं। वह जरूरतमंद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई प्रशिक्षण केंद्र चलाती हैं, ताकि वे हुनर सीखकर अपनी आजीविका कमा सकें।
यानी जुबेदा के लिए सामाजिक सौहार्द सिर्फ भाषण या त्योहार के मंच तक सीमित नहीं है। वह इसे अपने व्यवहार में जीती हैं। किसी परिवार की खुशी हो या किसी जरूरतमंद महिला की परेशानी, वह समुदाय देखकर मदद करने की कोशिश नहीं करतीं। शायद यही वजह है कि उनके साथ वर्षों से जुड़े लोग उन्हें सिर्फ मुस्लिम महिला या गणेश समिति की अध्यक्ष के रूप में नहीं देखते, बल्कि अपने कस्बे के ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिस पर मुश्किल समय में भरोसा किया जा सकता है।
नेताजी युवा संघ गणपति सेवा समिति के अध्यक्ष एसई परमेश्वर भी जुबेदा के इसी व्यवहार को उनकी सबसे बड़ी पहचान मानते हैं। उनके मुताबिक, जुबेदा सभी समुदायों के लोगों के साथ बेहद गर्मजोशी से संबंध रखती हैं और लोगों की खुशियों के साथ-साथ मुश्किल वक्त में भी उनके साथ खड़ी रहती हैं।
एनआर पुरा में जुबेदा की यह भूमिका इस बात की मिसाल है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सौहार्द एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक व्यक्ति अपनी आस्था में पूरी तरह विश्वास रखते हुए दूसरे धर्म की परंपराओं का सम्मान कर सकता है। बल्कि कई बार यही सम्मान समाज में उन रिश्तों को मजबूत करता है, जिन्हें केवल कानून या औपचारिक अपीलों से मजबूत नहीं किया जा सकता।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में सदियों से ऐसी साझा परंपराएं रही हैं, जहां एक समुदाय के त्योहार में दूसरे समुदाय के लोग शामिल होते रहे हैं। कहीं मुस्लिम कारीगर हिंदू त्योहारों के लिए मूर्तियां और वस्त्र तैयार करते हैं, तो कहीं हिंदू परिवार मुस्लिम पड़ोसियों के साथ ईद की खुशियां बांटते हैं।
कहीं मंदिर के आयोजन में मुस्लिम परिवार सहयोग करते हैं, तो कहीं मुस्लिम त्योहारों पर दूसरे समुदाय के लोग उनके घर पहुंचते हैं। जुबेदा इसी लंबी सामाजिक परंपरा की एक समकालीन कड़ी हैं।
उनकी कहानी की खूबसूरती इस बात में भी है कि इसमें एक-दूसरे की धार्मिक पहचान मिटाने की कोशिश नहीं है। जुबेदा अपने धर्म के प्रति आस्था रखती हैं और साथ ही दूसरे धर्म की आस्था का सम्मान करती हैं।
यही साझी संस्कृति का वास्तविक अर्थ है अपनी पहचान को बचाए रखते हुए दूसरे की पहचान का सम्मान करना। आज जब धर्म और जाति के आधार पर लोगों के बीच दूरी पैदा करने की कोशिशें होती हैं, तब चिक्कमगलुरु के एनआर पुरा की जुबेदा का 18 वर्षों का सफर एक अलग कहानी कहता है। यहां एक मुस्लिम महिला गणपति उत्सव की कमान संभालती है, हिंदू महिलाएं उनके साथ मिलकर पंडाल सजाती हैं, स्थानीय युवा आयोजन में सहयोग करते हैं और अलग-अलग समुदायों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं।
यह तस्वीर बताती है कि एकता हमेशा बड़े मंचों से पैदा नहीं होती। कई बार वह किसी छोटे कस्बे के एक पंडाल में बनती है, जहां लोग एक-दूसरे के धर्म से पहले एक-दूसरे को इंसान के रूप में देखते हैं।
एनआर पुरा की जुबेदा पिछले 18 वर्षों से इसी विश्वास को अपने काम और व्यवहार से मजबूत कर रही हैं। गणेश उत्सव समिति की अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका इसलिए खास नहीं है कि वह मुस्लिम होते हुए हिंदू त्योहार का आयोजन कर रही हैं, बल्कि इसलिए खास है कि वह इस आयोजन को समाज को जोड़ने, रिश्तों को मजबूत करने और इंसानियत को सबसे ऊपर रखने का माध्यम बना रही हैं।
जुबेदा की कहानी हमें याद दिलाती है कि भारत की असली ताकत केवल उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता के बीच पैदा होने वाले आपसी सम्मान और अपनत्व में है। यही गंगा-जमुनी तहजीब है, यही विविधता में एकता है और यही वह इंसानियत है, जो किसी भी दीवार से बड़ी होती है।