Sehri of Humanity: Vinod's team is awakening the spirit of communal harmony in Kota.
मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली
कहते हैं कि मजहब इंसान को बांटता नहीं, बल्कि जोड़ना सिखाता है। जब दुनिया भर में दूरियां बढ़ रही हों, तब राजस्थान का कोटा शहर एक ऐसी इबारत लिख रहा है, जिसे पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाए। राजस्थान की यह 'कोचिंग नगरी' केवल डॉक्टर और इंजीनियर ही पैदा नहीं कर रही, बल्कि यहाँ मानवता का वह पाठ भी पढ़ाया जा रहा है जो किसी भी डिग्री से कहीं ऊपर है। रमजान के पाक महीने में यहाँ की सड़कों पर रात के सन्नाटे में जो मंजर दिखाई देता है, वह सांप्रदायिक सौहार्द की एक बेमिसाल और सराबोर कर देने वाली दास्तान है।
कोटा के विज्ञान नगर की गलियों में जब दुनिया गहरी नींद में सोई होती है, तब विनोद कुमार और उनकी टीम के लिए दिन की शुरुआत होती है। रात के ठीक दस बजते ही एक बड़े से रसोई घर में हलचल तेज हो जाती है। चूल्हे जल उठते हैं, बर्तनों की खनक सुनाई देने लगती है और हवा में ताजे खाने की खुशबू तैरने लगती है। यह तैयारी किसी बड़े जश्न की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों मुस्लिम बच्चों के लिए 'सेहरी' (रोज़े से पहले का भोजन) तैयार करने की है, जो अपने घर-बार छोड़कर यहाँ सुनहरे भविष्य के सपने बुनने आए हैं।
इस पूरी मुहिम का खुलासा एसजेड कादिर खान ने अपने व्लॉग के जरिए किया है, जिसने सोशल मीडिया पर लोगों का दिल जीत लिया है। कोटा को कोचिंग संस्थानों का गढ़ माना जाता है, जहाँ देश के कोने-कोने से छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए आते हैं। इन छात्रों के लिए पढ़ाई का दबाव इतना ज्यादा होता है कि वे दिन-रात अपनी किताबों में खोए रहते हैं। रमजान के दिनों में, जब इबादत और कठिन रोज़ों का दौर होता है, इन बच्चों के लिए समय पर पौष्टिक सेहरी और इफ्तारी का इंतजाम करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। खासकर उन बच्चों के लिए जो पीजी या होस्टल में रहते हैं, जहाँ देर रात रसोई की सुविधा नहीं होती।

ऐसे में विनोद कुमार के नेतृत्व में 'मुहिम' नामक संस्था एक देवदूत बनकर सामने आई है। विज्ञान नगर में स्थित इस संस्था के दो होस्टल हैं, जहाँ लड़के और लड़कियां पढ़ाई करते हैं। रमजान शुरू होते ही 'मुहिम' का हेल्प डेस्क सक्रिय हो जाता है। विनोद कुमार की टीम में केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि शहर के बुद्धिजीवी, सरकारी अधिकारी और प्रतिष्ठित व्यापारी भी शामिल हैं। ये सभी लोग अपनी सामाजिक हैसियत को किनारे रखकर रात साढ़े दस बजे से सुबह चार बजे तक पसीना बहाते हैं।
हैरानी और खुशी की बात यह है कि इस रसोई में तैयार होने वाला खाना पूरी तरह निःशुल्क है। हर रोज़ 500 से 600 बच्चों के लिए सेहरी तैयार की जाती है। यदि आर्थिक गणित देखें, तो एक सेहरी के पैकेट की लागत करीब 40 रुपये आती है। इस हिसाब से विनोद कुमार की टीम प्रतिदिन 25 से 30 हजार रुपये खर्च कर रही है, लेकिन किसी भी बच्चे से एक पैसा भी नहीं लिया जाता। यह सारा खर्च स्थानीय लोगों के सहयोग और टीम की अपनी मेहनत से निकाला जाता है।
जब खाना तैयार हो जाता है, तो उसे थ्री-व्हीलरों में लादकर शहर के उन इलाकों में ले जाया जाता है जहाँ छात्र बड़ी तादाद में रहते हैं। रात के अंधेरे में जब ये गाड़ियां पहुँचती हैं, तो बच्चे अपने-अपने बर्तन लेकर बाहर आते हैं और उन्हें बड़े ही प्रेम से सेहरी की सामग्री सौंपी जाती है। यह दृश्य केवल भूख मिटाने का नहीं, बल्कि भरोसे को और मजबूत करने का होता है।
एसजेड कादिर खान बताते हैं कि इस नेक काम का दायरा सिर्फ छात्रों तक ही सीमित नहीं है। इंसानियत की यह मुहिम धर्म की सीमाओं को पूरी तरह लांघ चुकी है। अगर रात में सेहरी के पैकेट बच जाते हैं, तो उन्हें फेंकने या रखने के बजाय टीम के सदस्य सड़कों पर निकल जाते हैं। बिना किसी धार्मिक भेदभाव के, वे चौराहों पर सो रहे बेसहारा लोगों, अस्पतालों के बाहर बैठे मरीजों के तीमारदारों और जरूरतमंदों में यह खाना बांट देते हैं।
'मुहिम' संस्था पिछले कई सालों से यह नेक काम कर रही है और अब इसकी गूंज आसपास के शहरों तक भी पहुँच चुकी है। आज आलम यह है कि कोटा के पड़ोसी शहरों के लोग भी इस पुण्य कार्य का हिस्सा बनने के लिए खुद चलकर कोटा आते हैं। कोई सब्जी कटवाने में मदद करता है, तो कोई खाना पैक करने में।
रमजान की यह सेहरी केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर है जहाँ विनोद और कादिर कंधे से कंधा मिलाकर एक-दूसरे की खुशियों और जरूरतों का ख्याल रखते हैं। कोटा की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब इरादे नेक हों और दिल में इंसानियत के प्रति सम्मान हो, तो हम मिलकर एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहाँ कोई भी बच्चा भूखा न सोए और कोई भी सपना अधूरी सुविधा के कारण दम न तोड़े।
कोटा की यह 'सेहरी' आज पूरे देश के लिए भाईचारे और निस्वार्थ सेवा का एक बड़ा संदेश बन गई है। विनोद कुमार और उनकी टीम का यह जज्बा साबित करता है कि इंसानियत का मजहब सबसे बड़ा है।