मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली
आशा भोंसले का नाम आते ही जेहन में चुलबुले गाने नाचने लगते हैं। उनकी आवाज़ में वो खनक है जो किसी को भी थिरकने पर मजबूर कर दे। आरडी बर्मन के साथ मिलकर उन्होंने बॉलीवुड में पॉप और वेस्टर्न म्यूजिक का जो दौर शुरू किया उसे आज भी मिसाल माना जाता है। लेकिन आशा ताई की शख्सियत का एक ऐसा पहलू भी है जो उनकी पहचान से बिल्कुल जुदा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस गले से 'दम मारो दम' निकला उसी गले ने 'या नबी सलाम अलैका' जैसी रूहानी इबादत को भी अमर कर दिया।
आशा भोंसले ने सिर्फ पश्चिमी धुनें ही नहीं गाईं। उन्होंने कव्वाली और नात को भी अपनी आवाज़ से संवारा। फिल्म 'शान-ए-खुदा' में उनकी गाई सलात-ओ-अस्सलाम आज भी दरगाहों और मजहब-ए-इस्लाम की महफिलों में गूंजती है। यह सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि आस्था और भक्ति का एक समंदर है।
पश्चिमी धुनों से रूहानी सफर तक
आशा भोंसले को संगीत की दुनिया में एक 'वर्सेटाइल' यानी हर विधा में माहिर गायिका माना जाता है। उन्होंने संगीतकार आरडी बर्मन के साथ मिलकर हिंदी सिनेमा का चेहरा बदल दिया था। कैबरे डांस से लेकर डिस्को बीट्स तक उनकी आवाज़ ने हर सांचे में खुद को ढाला। लेकिन उनकी असली काबिलियत तब सामने आई जब उन्होंने सूफी और रूहानी कलाम गाए।
साल 1971 में एक फिल्म आई जिसका नाम था 'शान-ए-खुदा'। इस फिल्म का संगीत इकबाल कुरैशी ने तैयार किया था। इस फिल्म में आशा भोंसले ने कुछ ऐसी कव्वालियां और नात गाईं जिन्होंने इतिहास रच दिया। उन्हीं में से एक था 'या नबी सलाम अलैका'। यह एक ऐसा सलाम है जिसे सुनते ही रूह कांप उठती है। इसकी सादगी और आशा जी की आवाज़ की गहराई ने इसे हर मुसलमान के दिल का हिस्सा बना दिया।
इबादत का वो मंजर : या नबी सलाम अलैका
सलात-ओ-अस्सलाम अक्सर धार्मिक समारोहों और दरगाहों पर पढ़ा जाता है। इसे पढ़ते समय एक खास तरह का अदब और एहतराम रखा जाता है। आशा भोंसले ने जब इसे गाया तो उन्होंने इसकी पवित्रता का पूरा ख्याल रखा। इस कलाम के बोल ए.एच. रिज़वी ने लिखे थे।
इसके शब्दों में पैगंबर साहब की शान और उनकी शख्सियत का बखान है।
"या नबी सलाम अलैका, या रसूल सलाम अलैका" "या हबीब सलाम अलैका, सलवातुल्लाह अलैका"
इन पंक्तियों को गाते समय आशा जी की आवाज़ में जो ठहराव और दर्द है वह सीधे दिल पर चोट करता है। इसमें दुनिया की रचना के पीछे की वजह और पैगंबर साहब के प्रति सम्मान को बहुत खूबसूरती से पिरोया गया है। 'शान-ए-खुदा' फिल्म के इस गीत ने साबित किया कि संगीत की कोई सरहद नहीं होती और न ही कोई मजहब।
कैफी आजमी और ए.एच. रिज़वी की कलम का जादू
आशा भोंसले की रूहानी यात्रा सिर्फ एक सलाम तक सीमित नहीं थी। उन्होंने उस दौर के मशहूर शायरों और गीतकारों के साथ मिलकर कई बेहतरीन कव्वालियां दीं। इनमें कैफी आजमी और ए.एच. रिज़वी के नाम प्रमुख हैं। इन कव्वालियों में न सिर्फ संगीत था बल्कि जीवन के गहरे दर्शन और धर्म की सीख भी छिपी थी।
आशा जी द्वारा गाई गई कुछ मशहूर कव्वालियां आज भी सुनी जाती हैं। 'काली कमली वाले तुझपे लाखों सलाम' जैसी रचनाओं में उनकी आवाज़ की मिठास और भक्ति साफ झलकती है। वहीं 'मिलता है क्या नमाज में सर को झुका के देख ले' जैसी कव्वाली इंसान को आध्यात्म की ओर प्रेरित करती है। इन गानों के पीछे इकबाल कुरैशी का बेहतरीन संगीत था जिसने रूहानियत को एक नई ऊंचाई दी।
रोबोटिक नहीं रूहानी है यह अहसास
आज के दौर में जब संगीत मशीनों पर बनता है तब आशा भोंसले की ये रिकॉर्डिंग्स किसी खजाने से कम नहीं लगतीं। उन्होंने इन गानों को गाते समय तकनीकी बारीकियों से ज्यादा भावनाओं पर जोर दिया। यही वजह है कि 'रखता है जो रोज़ा कभी भूखा ना रहेगा' जैसे गीत आज भी रमज़ान के महीने में गूंजते सुनाई देते हैं। यह गाना कैफी आजमी ने लिखा था और इसे आशा भोंसले ने पूरी शिद्दत से निभाया।
अक्सर लोग आशा भोंसले को सिर्फ उनके हिट फिल्मी गानों के लिए याद करते हैं। लेकिन एक पत्रकार के तौर पर जब हम उनके करियर के इस पन्ने को पलटते हैं तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। वे सिर्फ एक गायिका नहीं बल्कि एक ऐसी साधिका थीं जिन्होंने हर शब्द के अर्थ को जिया। 'शान-ए-खुदा' फिल्म की ये कव्वालियां और नात उनके करियर का वो हिस्सा हैं जो उन्हें अन्य गायकों से बहुत आगे ले जाती हैं।

संगीत की विरासत और साझा संस्कृति
आशा भोंसले की ये रूहानी पेशकश भारत की 'गंगा-जमुनी तहजीब' का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। एक हिंदू गायिका का पूरी अकीदत के साथ इस्लामी कलामों को गाना यह बताता है कि कला का कोई धर्म नहीं होता। उनकी आवाज़ में वो कशिश थी जो हर मजहब के इंसान को एक सूत्र में बांध देती थी।
आज भी जब दरगाहों पर 'या नबी सलाम अलैका' गूंजता है तो शायद बहुत कम लोगों को पता होता है कि इसके पीछे वही आवाज़ है जिसने 'पिया तू अब तो आजा' जैसा ब्लॉकबस्टर गाना दिया था। यही आशा भोंसले की महानता है। उन्होंने पश्चिमी पॉप को बॉलीवुड में जगह दिलाई लेकिन अपनी जड़ों और मिट्टी की खुशबू को कभी नहीं भूला।
अमर है आशा की रूहानी आवाज़
आशा भोंसले का निधन नहीं हुआ है वे हमारे बीच अपनी आवाज़ के जरिए हमेशा मौजूद हैं। हालांकि इस लेख में उन्हें 'स्वर्गीय' कहना एक तथ्यात्मक भूल हो सकती है क्योंकि आशा जी आज भी हमारे बीच संगीत का एक जीवित स्तंभ हैं। लेकिन उनकी गाई हुई ये कव्वालियां और नात वाकई कालजयी हैं।
'शान-ए-खुदा' फिल्म की वो एल्बम आज भी उन लोगों के लिए एक तोहफा है जो संगीत में सुकून तलाशते हैं। ए.एच. रिज़वी के शब्द और आशा भोंसले का सुर मिलकर एक ऐसी इबादत तैयार करते हैं जो सदियों तक सुनी जाएगी। चाहे वह 'अजमेर वाले ख्वाजा' का जलवा हो या 'काली कमली वाले' को सलाम हर रचना में एक अलग ही रूहानियत बसी है।
आशा भोंसले की यह रूहानी विरासत हमें याद दिलाती है कि संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि खुदा तक पहुँचने का एक जरिया भी है। उनकी आवाज़ का यह जादू हमेशा हमारे दिलों में महकता रहेगा।