जावेद अख्तर / कोलकाता
सियासत की चमक-धमक अक्सर उन कोनों तक नहीं पहुँच पाती जहाँ असली हुनर दम तोड़ रहा होता है। बंगाल की गलियों से एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था के मुँह पर तमाचा है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया है। यह वीडियो शक्तिपुर के एक फुटबॉल कोच समीर सरदार का है। इस वीडियो ने बंगाल के खेल जगत की उस काली हकीकत को उजागर कर दिया है जिसे अक्सर फाइलों में दबा दिया जाता है।
रास्ते की मुलाकात और घर का सुक्तो
यूसुफ पठान बेलडांगा के शक्तिपुर में एक चुनावी रैली के लिए जा रहे थे। रास्ते में रामनगर घाट पर उन्हें स्थानीय फुटबॉल कोच समीर सरदार मिले। समीर ने बड़े ही सादे अंदाज में उनसे घर रुकने की जिद की। यूसुफ पठान उनकी सादगी देख मना नहीं कर सके।
वे उस झोपड़ी नुमा घर में पहुँचे जहाँ समीर अपने परिवार के साथ रहते हैं। यूसुफ ने वहां जमीन पर बैठकर बड़े चाव से चावल और बंगाल का मशहूर ‘सुक्तो’ खाया। लेकिन जैसे ही उनकी नजर घर के कोनों पर पड़ी तो वे हैरान रह गए।

पदकों से लदी टूटी दीवारें
उस कच्ची झोपड़ी के भीतर समीर सरदार ने अपनी पूरी जिंदगी की दौलत सहेज कर रखी है। पुरानी मेज और टूटी अलमारियां चमचमाती ट्राफियों और मेडल से भरी पड़ी हैं। यह नजारा दिल को छू लेने वाला भी है और डराने वाला भी।
यह मंजर चीख-चीख कर बता रहा है कि समीर अपने दौर के कितने बड़े खिलाड़ी रहे होंगे। उनकी अलमारियों में सजे ये इनाम किसी महल की शोभा बढ़ा सकते थे। मगर अफसोस कि ये एक ऐसी छत के नीचे धूल खा रहे हैं जो कभी भी गिर सकती है।

अभावों के बीच पिसता हुनर
समीर सरदार की कहानी भारत के खेल सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। हमारे गाँवों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी है तो सिर्फ सही मंच और सरकारी मदद की। समीर ने फुटबॉल को अपना पूरा जीवन दे दिया। वे आज भी बंगाल के ग्रामीण इलाकों में छोटे बच्चों को फुटबॉल की बारीकियां सिखाते हैं। वे भविष्य के सितारे तराश रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि खुद उनका अपना भविष्य क्या है? जो खिलाड़ी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा हो उसके लिए उन सोने-चांदी के पदकों का क्या मोल रह जाता है?

यूसुफ पठान की पोस्ट और बढ़ती उम्मीदें
यूसुफ पठान खुद एक बड़े खिलाड़ी रहे हैं। वे जानते हैं कि एक एथलीट के लिए उसकी ट्राफियां क्या मायने रखती हैं। उन्होंने समीर सरदार की तारीफ करते हुए वीडियो तो डाल दिया लेकिन लोग अब उनसे ठोस मदद की उम्मीद कर रहे हैं। यूसुफ अब सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के सांसद भी हैं। स्थानीय लोगों में इस बात की चर्चा है कि क्या सांसद जी सिर्फ खाना खाकर चले जाएंगे या समीर के कोचिंग संस्थान के लिए कुछ करेंगे।
सांसद ने अपने पोस्ट में लिखा कि उन्होंने पड़ोसियों की समस्याएं सुनीं और परिवार के साथ वक्त बिताया। लेकिन खेल प्रेमियों का कहना है कि समस्या सुनने का दौर अब पुराना हो चुका है। अब समाधान की जरूरत है। समीर सरदार जैसे कोच को सिर्फ सहानुभूति नहीं चाहिए। उन्हें सम्मानजनक जीवन और एक आधुनिक कोचिंग सेंटर की जरूरत है ताकि वे और भी खिलाड़ी तैयार कर सकें।
कौन हैं समीर सरदार?
अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के रिकॉर्ड बताते हैं कि समीर सरदार बंगाल फुटबॉल अकादमी जैसे प्रतिष्ठित क्लबों से जुड़े रहे हैं। वे एक मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं जिनका जुनून आज भी बरकरार है। वे उन हजारों गुमनाम नायकों में से एक हैं जो जिला और राज्य स्तर पर मेडल जीतते हैं लेकिन रिटायरमेंट के बाद गुमनामी में खो जाते हैं। बंगाल जैसे राज्य में जहाँ फुटबॉल को धर्म माना जाता है वहां एक दिग्गज कोच का ऐसा हाल होना शर्मनाक है।
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सिस्टम की विफलता का प्रतीक
यह कहानी सिर्फ समीर सरदार की नहीं है। यह उन तमाम खिलाड़ियों की कहानी है जिनके पास करियर के अंत में केवल यादें और लोहे के कुछ टुकड़े (शील्ड) बचते हैं। सरकारें खेलो इंडिया जैसे अभियान चलाती हैं। करोड़ों का बजट खर्च होता है। लेकिन क्या यह पैसा जमीनी स्तर के कोचों तक पहुँचता है? समीर सरदार की झोपड़ी यह गवाही दे रही है कि सिस्टम में कहीं बहुत बड़ा छेद है।
यूसुफ पठान के इस दौरे ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। क्या हमारी व्यवस्था इन खिलाड़ियों की सुध लेगी? क्या इन्हें कभी वह मुकाम मिलेगा जिसके ये हकदार हैं? या फिर हर बार की तरह कोई बड़ा नेता आएगा, फोटो खिंचवाएगा और चला जाएगा। समीर सरदार को आज मदद की दरकार है। वे अपनी झोपड़ी से बाहर निकलकर मैदान में बदलाव लाना चाहते हैं। उम्मीद है कि इस बार उनकी पुकार उन कानों तक जरूर पहुँचेगी जो नीतियां बनाते हैं। सहानुभूति से पेट नहीं भरता, हक और सम्मान से जिंदगी संवरती है।