डॉ. इफ्फत फरीदी : एक औरत, कई किरदार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 16-04-2026
Dr. Iffat Faridi: One Woman, Many Roles
Dr. Iffat Faridi: One Woman, Many Roles

 

सानिया अंजुम

कुछ जिंदगियां खामोश इंकलाब की तरह होती हैं। वे शोर मचाकर नहीं, बल्कि परवरिश, भरोसे और हमदर्दी से दुनिया को बदलती हैं। डॉ. इफ्फत फरीदी का जीवन एक ऐसा ही सफर है। यहाँ विद्वता के साथ संवेदनशीलता मिलती है और शायरी के साथ समाज सेवा का जज्बा कदम से कदम मिलाकर चलता है। एक शिक्षाविद, कवयित्री, काउंसलर और सोशल वर्कर के रूप में वे बुद्धि और करुणा का एक अनोखा संगम हैं। उनकी कहानी सिर्फ उनकी कामयाबी की दास्तान नहीं है, बल्कि उन संस्कारों की मिसाल है जो उन्हें विरासत में मिले और जिन्हें वे आगे बढ़ा रही हैं।

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उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ ज्ञान को सबसे ऊपर रखा जाता था। डॉ. इफ्फत का बचपन प्रगतिशील विचारों और बौद्धिक माहौल में बीता। आर्थिक तंगी और सामाजिक दबाव के बावजूद उनके माता-पिता अपनी बात पर अडिग रहे। उनका मानना था कि बेटियों को भी बेटों के बराबर शिक्षा मिलनी चाहिए।

उनके पिता एक संपादक थे जो कई उर्दू अखबारों से जुड़े रहे। वे कई शहरों में काम करने के बाद अंत में कोलकाता में बस गए। उनका छोटा सा घर किताबों, अखबारों और पत्रिकाओं से भरा रहता था। वह सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि शब्दों की इबादतगाह थी। उनके पिता अक्सर कहते थे, "शिक्षा ही इकलौती ऐसी विरासत है जो बांटने से बढ़ती है।" किताबों और चर्चाओं के बीच रहकर इफ्फत के मन में पढ़ने और सोचने की गहरी रुचि पैदा हुई।

उनकी पढ़ाई लिखाई उनकी मेहनत और लगन को दर्शाती है। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन, पोस्ट-ग्रैजुएशन, बी.एड. और एम.फिल. किया। बाद में उन्होंने शिमला की समर हिल यूनिवर्सिटी से एम.एड. किया और साल 2001 में जामिया मिलिया इस्लामिया से स्पेशल एजुकेशन में पीएच.डी. की डिग्री हासिल की। इसके अलावा उन्होंने काउंसलिंग और टीईएफएल (TEFL) जैसे कोर्स भी किए। उनके लिए पढ़ाई का मतलब सिर्फ डिग्रियां बटोरना नहीं था। वे मानती हैं कि सीखना दिमाग और रूह के बीच चलने वाली उम्र भर की बातचीत है।

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शादी के बाद उन्हें अलग-अलग देशों की यात्रा करने और नई संस्कृतियों को समझने का मौका मिला। उनके पति एक पेट्रोलियम इंजीनियर थे। इस वजह से वे किसी एक जगह स्थाई नौकरी तो नहीं कर पाईं, लेकिन उन्होंने कई बड़े संस्थानों में अपना योगदान दिया।

उन्होंने दिल्ली प्रशासन, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया में लेक्चरर के तौर पर काम किया। उन्होंने सऊदी कल्चरल अटैच ऑफिस में भी अपनी सेवाएं दीं। इतने प्रोफेशनल काम के बावजूद उनके मन में कुछ और करने की तड़प हमेशा बनी रही।

समाज सेवा का यह रास्ता उन्हें बेंगलुरु में मिला। वहां उन्होंने अपने पड़ोस में प्रवासी मजदूरों के बच्चों को देखा। भाषा अलग होने के बावजूद वे उन बच्चों से जुड़ गईं। उन बच्चों के पास स्कूल जाने का कोई जरिया नहीं था। इस बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।

उन्होंने खुद से सवाल किया कि अगर मेरी पढ़ाई किसी का भविष्य नहीं संवार सकती, तो इस डॉक्टरेट का क्या फायदा? उन्होंने उन बच्चों को उनके घरों के पास ही पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन बच्चों का हौसला बढ़ा और डॉ. इफ्फत ने उनका दाखिला स्कूलों में कराया। उन छोटी-छोटी जीत में उन्हें अपना असली मकसद मिल गया।

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साल 2017में डॉ. इफ्फत और उनके पति ने 'कोशिश फाउंडेशन' की शुरुआत की। यह संस्था गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए काम करती है। 'कोशिश' नाम ही उनकी सोच को दर्शाता है कि नेक इरादे से किया गया हर प्रयास बदलाव लाता है।

पिछले 12सालों में उन्होंने सौ से ज्यादा बच्चों को नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएशन तक का रास्ता दिखाया है। वे बच्चों को सिर्फ पढ़ाती नहीं हैं, बल्कि उनमें आत्म-सम्मान भी जगाती हैं। वे अपने छात्रों से कहती हैं कि तुम अपनी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने हौसलों से पहचाने जाते हो।

शिक्षा के साथ-साथ डॉ. इफ्फत ने अपने लिखने के शौक को भी जिंदा रखा। शायरी उनकी पुरानी साथी है। उनका उर्दू शायरी का मजमुआ 'चिराग दिल का' मानवीय भावनाओं और संस्कृति की गहरी समझ पेश करता है। उन्होंने प्रोफेसर रमेश दत्त जी की जीवनी और 'आपकी सुधा' जैसी किताबें भी लिखीं।

उनके लिए शायरी सिर्फ जज्बात नहीं, बल्कि एक तरह की आवाज है। वे कहती हैं कि जब भावनाओं को कहीं और पनाह नहीं मिलती, तो वे कविता बन जाती हैं। आजकल वे गरीब बच्चों के साथ अपने अनुभवों को लिख रही हैं ताकि दूसरे लोग भी प्रेरित हो सकें।

उनकी एक बेहद भावुक कविता है "माँ से दूर क्यों रहते हैं"। इसमें 'माँ' को उर्दू भाषा के रूप में दिखाया गया है। कविता में एक माँ का दुख झलकता है जिसके बच्चे अपनी जुबान और जड़ों से दूर हो गए हैं। माँ पूछती है कि मेरे अपने ही मुझे अपना कहने से क्यों घबराते हैं?

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वे पढ़-लिखकर अमीर तो हो गए हैं, लेकिन अपनी पहचान बताने में उन्हें शर्म आती है। कविता एक चेतावनी भी देती है कि जड़ों से कटा हुआ पेड़ कभी हरा-भरा नहीं रह सकता। माँ अपने बच्चों से गुजारिश करती है कि वे इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। कविता के अंत में माँ कहती है, "मैं इंतजार करूंगी", जो एक उम्मीद है कि एक दिन उसके बच्चे वापस जरूर लौटेंगे।

डॉ. इफ्फत फरीदी का जीवन शिक्षा, सेवा और संवेदनाओं से बुना हुआ है। वे एक कवयित्री, टीचर और मेंटर के रूप में आज भी जीवन के गहरे अर्थ तलाश रही हैं। उनका मानना है कि असली सफलता पद या पुरस्कार नहीं है, बल्कि वह बदलाव है जो आप किसी की जिंदगी में लाते हैं।

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उनके शब्दों में जीवन का मकसद सिर्फ कुछ हासिल करना नहीं, बल्कि खुद को और दूसरों को जगाना है। डॉ. इफ्फत फरीदी अपने काम और अपनी बातों से आज भी दिलों में मशाल जला रही हैं।