यूनुस अल्वी /नूंह-मेवात ( हरियाणा)
कभी मेवात अपनी रूतवाई, सादगी और भाईचारे के लोकगीतों के लिए जाना जाता था। आज वही मेवात सोशल मीडिया पर परोसी जा रही अश्लीलता की गिरफ्त में है। भोजपुरी गानों की बदनामी के चर्चे तो आम थे लेकिन अब मेवाती गानों ने भी मर्यादा की तमाम हदें पार कर दी हैं। यह बदलाव इतना अचानक और खतरनाक है कि अब ये गाने ट्रकों के केबिन से निकलकर सीधे मेवात के ड्राइंग रूम और युवाओं के मोबाइल तक पहुंच गए हैं।
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हाल ही में नूंह पुलिस ने असलम नाम के एक अश्लील गायक को गिरफ्तार किया है। एसपी डॉ. अर्पित जैन की इस कार्रवाई ने एक बड़े गिरोह की पोल खोल दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक गिरफ्तारी से यह सब रुक जाएगा? जवाब फिलहाल 'ना' में नजर आता है। इसकी वजह मेवात की गलियों में मशरूम की तरह उग आए रिकॉर्डिंग सेंटर हैं।
मेवात के कस्बों और गांवों में छोटे-छोटे म्यूजिक स्टूडियो खुल गए हैं। यहाँ चंद रुपयों के लालच में फूहड़ बोल लिखे जाते हैं। लोकल लड़के-लड़कियों को बुलाकर वीडियो शूट किए जाते हैं। फिर इन्हें तुरंत यूट्यूब पर वायरल कर दिया जाता है। अश्लीलता, अवैध हथियारों का प्रदर्शन और दबंगई दिखाना इन गानों का मुख्य फॉर्मूला बन चुका है। युवा पीढ़ी रातों-रात स्टार बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इस दलदल में धंसती जा रही है।

चिंता की बात यह है कि समाज अभी भी इस मुद्दे पर पूरी तरह जागृत नहीं हुआ है। हाल ही में हथीन में एक बड़ी पंचायत हुई थी। इसमें 36बिरादरी के लोग जुटे थे। पंचायत ने दहेज और नशाखोरी के खिलाफ कड़े फैसले लिए। दोषियों पर जुर्माना लगाने तक का ऐलान हुआ। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि किसी ने भी मेवाती गानों में फैल रही अश्लीलता पर बात नहीं की। युवाओं के चरित्र पर हो रहे इस प्रहार को लेकर पंचायत में चुप्पी छाई रही।
आज मेवात में एक पूरी 'मिनी इंडस्ट्री' खड़ी हो गई है। यूट्यूब व्यूज से आने वाला पैसा और स्टेज प्रोग्राम की मांग ने इसे व्यापार बना दिया है। मुजीम, साकिर और बाबूलाल जैसे नाम सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज बटोर रहे हैं। इनके गानों के बोल अक्सर रिश्तों की मर्यादा तार-तार करते हैं। माताओं और बहनों के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल अब आम बात हो गई है।

मेवात की असली पहचान कभी उसकी प्राचीन लोक-संस्कृति थी। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि पहले के गीतों में रिश्तों की मिठास और समाज का मार्गदर्शन होता था। लेकिन आज के डिजिटल दौर में पुरानी जड़ों को उखाड़ा जा रहा है। नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को भूलकर गाली-गलौज वाले कंटेंट को ही मेवात की पहचान मान रही है। इससे न केवल सामाजिक मर्यादा कमजोर हो रही है बल्कि बाहरी दुनिया में भी मेवात की छवि खराब हो रही है।
मेवात विकास सभा के पूर्व अध्यक्ष दीन मोहम्मद मामलिका और वरिष्ठ वकील रमजान चौधरी जैसे जिम्मेदार लोग मानते हैं कि सिर्फ पुलिस डंडा मारकर इसे नहीं रोक सकती। इसके लिए समाज को खुद आगे आना होगा। मस्जिदों और मदरसों के इमामों को जुमे की तकरीर में इस मुद्दे को उठाना होगा। जब तक घर के बड़े अपने बच्चों के मोबाइल चेक नहीं करेंगे और ऐसे गानों का बहिष्कार नहीं होगा तब तक सुधार मुमकिन नहीं है।
नूंह पुलिस अब सख्त मूड में नजर आ रही है। एसपी डॉ. अर्पित जैन ने स्पष्ट कर दिया है कि अश्लीलता फैलाना मनोरंजन नहीं बल्कि अपराध है। साइबर टीम उन सभी यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया अकाउंट्स की लिस्ट बना रही है जो समाज में गंदगी परोस रहे हैं। पुलिस ने ऐसे गानों की स्क्रिप्ट और डिजिटल डेटा भी इकट्ठा कर लिया है। अब केवल गायक ही नहीं बल्कि इन गानों को प्रमोट करने और शेयर करने वाले लोग भी पुलिस के रडार पर हैं।
पुलिस कप्तान का कहना है कि "आपका हर क्लिक आपकी जिम्मेदारी है।" अगर आप किसी गलत चीज को शेयर कर रहे हैं तो आप भी उतने ही दोषी हैं। प्रशासन अपनी तरफ से कानून का शिकंजा कस रहा है। लेकिन असल बदलाव तब आएगा जब मेवात का युवा खुद यह तय करेगा कि उसे बंदूक और गाली वाले गाने सुनने हैं या अपनी गौरवशाली विरासत को बचाना है।

मेवात आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ वो तकनीक है जो उसे दुनिया से जोड़ सकती है। दूसरी तरफ उसी तकनीक का इस्तेमाल समाज को खोखला करने के लिए हो रहा है। अगर समाज, धर्मगुरु और प्रशासन मिलकर काम नहीं करेंगे तो मेवात की आने वाली पीढ़ियां अपनी तहजीब पूरी तरह खो देंगी। अब समय आ गया है कि पंचायतें सिर्फ दहेज पर नहीं बल्कि मोबाइल पर चल रही इस 'सांस्कृतिक नग्नता' पर भी कड़े फैसले लें।