मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली
बिहार की सियासत ने एक नया इतिहास रच दिया है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। इसके साथ ही बिहार में 'नीतीश युग' के बाद अब एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत हो गई है। सम्राट चौधरी बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने हैं। यह बदलाव तब हुआ जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने का निर्णय लिया। फिलहाल बिहार विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है। पार्टी हाईकमान ने कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद सम्राट चौधरी पर भरोसा जताया है। यह फैसला बताता है कि सम्राट चौधरी न केवल जमीन पर मजबूत पकड़ रखते हैं बल्कि दिल्ली दरबार में भी उनका कद काफी ऊंचा है।
मुंगेर से सत्ता के शिखर तक का सफर
सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर जिले के लखनपुर गांव में हुआ था। वह राजनीतिज्ञों के परिवार से आते हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं। शकुनी चौधरी सात बार विधायक और सांसद रह चुके हैं। उनकी माता पार्वती देवी भी तारापुर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक रही हैं। सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है लेकिन उन्होंने अपनी पहचान खुद बनाई है। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा गांव से पूरी की और बाद में मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। हालांकि उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर समय-समय पर विवाद भी होते रहे हैं।

राजनीतिक सफर की शुरुआत और दल बदल
सम्राट चौधरी ने 1990 के दशक में सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। उनके करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से हुई थी। मात्र 31 साल की उम्र में वह 1999 में राबड़ी देवी सरकार में कृषि मंत्री बन गए थे। इसके बाद उन्होंने मुंगेर की परबत्ता विधानसभा सीट से साल 2000 और 2010 में चुनाव जीता। 2010 में उन्हें विधानसभा में मुख्य सचेतक बनाया गया था।
साल 2014 में सम्राट चौधरी ने राजद को बड़ा झटका दिया। उन्होंने 13 विधायकों के साथ बगावत की और जनता दल यूनाइटेड (JDU) का दामन थाम लिया। जीतन राम मांझी और नीतीश कुमार की सरकारों में उन्होंने शहरी विकास और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली।
भाजपा में प्रवेश और बढ़ता कद
सम्राट चौधरी 2018 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। भाजपा ने उन्हें तुरंत बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी। 2020 के विधानसभा चुनावों में वह पार्टी के स्टार कैंपेनर रहे। नीतीश कुमार जब एनडीए के साथ थे तब सम्राट चौधरी को भाजपा कोटे से पंचायती राज मंत्री बनाया गया था। उनके कार्यकाल में पंचायती राज विभाग में कई बड़े सुधार हुए। उन्होंने सफाई कर्मियों की भर्ती और ग्राम पंचायतों के डिजिटलीकरण पर जोर दिया। हालांकि सदन के भीतर विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा के साथ उनकी तीखी बहस भी काफी चर्चा में रही थी।
ओबीसी चेहरा और पार्टी नेतृत्व
भाजपा ने सम्राट चौधरी को बिहार का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक बड़ा दांव खेला था। वह कोइरी (कुशवाहा) जाति से आते हैं। बिहार की जातिगत राजनीति में यादवों के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पिछड़ा वर्ग समूह है। पार्टी ने उन्हें नीतीश कुमार के 'लव-कुश' समीकरण में सेंध लगाने के लिए तैयार किया था। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने नीतीश सरकार पर कड़े हमले किए। उन्होंने तब तक पगड़ी पहनने का संकल्प लिया था जब तक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटा नहीं देते। बाद में नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में आने पर उन्होंने अयोध्या जाकर अपनी पगड़ी भगवान राम को समर्पित कर दी थी।

मुख्यमंत्री के रूप में नई चुनौतियां
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार भाजपा के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। 2024 से 2026 तक वह बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उनके पास वित्त और गृह जैसे सबसे महत्वपूर्ण विभाग थे। गृह मंत्री के रूप में उन्होंने बिहार में 'अपराध मुक्त शासन' का मॉडल लागू करने की कोशिश की। उन्होंने अपराधियों को चेतावनी दी और अवैध खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की। उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए 'पिंक पुलिसिंग' और 'अभय ब्रिगेड' जैसे नवाचार किए।
बड़ी जीत और भविष्य की राह
2025 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद सम्राट चौधरी की दावेदारी और मजबूत हो गई थी। उन्होंने तारापुर विधानसभा सीट से 45 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि सम्राट चौधरी के पास प्रशासनिक अनुभव और कड़क नेतृत्व क्षमता दोनों है।
बिहार अब एक ऐसे दौर में है जहां विकास और जातिगत समीकरणों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य में औद्योगिक निवेश बढ़ाना और युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना है। वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने बिहार का अब तक का सबसे बड़ा बजट पेश किया था। अब मुख्यमंत्री के रूप में उनके पास अपनी योजनाओं को सीधे लागू करने का अधिकार है।
बिहार की जनता की नजरें अब अपने नए मुखिया पर टिकी हैं। क्या सम्राट चौधरी बिहार को पिछड़ेपन के टैग से बाहर निकाल पाएंगे? क्या वह भाजपा के 'सुशासन' के दावों को जमीन पर उतार पाएंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे। फिलहाल पटना से दिल्ली तक भाजपा कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है। सम्राट चौधरी ने साबित कर दिया है कि अगर संघर्ष की ताकत और पार्टी का साथ हो तो सत्ता का शिखर दूर नहीं है।
मुख्य बिंदु:
नाम: सम्राट चौधरी (उर्फ राकेश कुमार)
जन्म: 16 नवंबर 1968, मुंगेर (बिहार)
पद: बिहार के मुख्यमंत्री (2026 से प्रभावी)
जाति: कोइरी (कुशवाहा) - भाजपा का प्रमुख ओबीसी चेहरा
पिछला पद: बिहार के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री
खास बात: बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने।