राष्ट्रीय सुरक्षा में हार के लिए कोई जगह नहीं: अजीत डोभाल

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 15-04-2026
There is no room for failure in national security: Ajit Doval
There is no room for failure in national security: Ajit Doval

 

आवाज द वाॅयस /गांधीनगर

गुजरात की धरती और मौका राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय का पाँचवाँ दीक्षांत समारोह। मंच पर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मौजूद थीं। इसी गरिमामय माहौल में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया। इस सम्मान को स्वीकार करते हुए डोभाल ने जो बातें कहीं, वे सिर्फ छात्रों के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ा संदेश हैं। उन्होंने सुरक्षा के पारंपरिक पैमानों को चुनौती दी और बताया कि एक देश असल में ताकतवर कब बनता है।

डोभाल ने अपने संबोधन की शुरुआत एक कड़े सच के साथ की। उन्होंने कहा कि सुरक्षा के मैदान में 'सिल्वर मेडल' जैसा कुछ नहीं होता। यहाँ सिर्फ दो ही नतीजे मुमकिन हैं। या तो आप जीतते हैं या आप हार जाते हैं। अगर आप जीत गए तो इतिहास रच देंगे। लेकिन अगर हार गए तो खुद ही इतिहास बन जाएंगे। आपका वजूद खत्म हो जाएगा। उन्होंने युवाओं को आगाह किया कि सुरक्षा का क्षेत्र सबसे ऊँचे दर्जे के समर्पण और अनुशासन की मांग करता है। यहाँ मामूली सी चूक की कोई गुंजाइश नहीं है।

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अजीत डोभाल ने युद्ध के पीछे के असली मनोविज्ञान को समझाया। उनके मुताबिक किसी भी युद्ध का आखिरी मकसद सिर्फ जमीन जीतना नहीं होता। युद्ध का असली उद्देश्य दुश्मन का मनोबल तोड़ना होता है। जब विरोधी का हौसला पस्त हो जाता है, तभी वह आपकी शर्तों पर संधि करने के लिए मजबूर होता है।

उन्होंने दुनिया के बड़े उदाहरण देते हुए अपनी बात को पुख्ता किया। डोभाल ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों सोवियत संघ जैसा शक्तिशाली देश अफगानिस्तान से पीछे हटा? क्यों अमेरिका जैसा सुपरपावर वियतनाम और फिर बाद में अफगानिस्तान में अपने मकसद पूरे नहीं कर पाया?

इन नाकामियों की वजह हथियारों या तकनीक की कमी नहीं थी। डोभाल ने साफ किया कि इन देशों के पास दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीक और संसाधन थे। फिर भी वे नहीं जीत पाए क्योंकि सामने वाले देश के लोगों की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत थी।

उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्र की शक्ति को आंकते समय सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब लोग वहां की जनता की अंतर्निहित ताकत और उनके जज्बे को कम आंक लेते हैं। तकनीकी श्रेष्ठता अपनी जगह है, लेकिन निर्णायक कारक हमेशा वहां के लोगों की भावना और प्रतिबद्धता ही होती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित करते हुए उन्होंने इसे एक बेहद जटिल और बहुआयामी विषय बताया। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग समझते हैं कि सुरक्षा का मतलब सिर्फ सीमाओं पर खड़ी सेना है। लेकिन हकीकत इससे बड़ी है।

एक राष्ट्र की सुरक्षा उसकी सैन्य ताकत के साथ-साथ उसकी तकनीकी क्षमता, प्राकृतिक संसाधनों, कूटनीतिक कौशल और मानव पूंजी पर टिकी होती है। डोभाल ने एक खास शब्द का इस्तेमाल किया 'राष्ट्रीय इच्छाशक्ति'। उनके अनुसार यही वह ताकत है जो किसी भी संकट के समय देश को टूटने से बचाती है।

इस संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने आम जनता की भूमिका पर बात की। डोभाल ने कहा कि भारत में आज एक नई जागृति देखने को मिल रही है। इतिहास में लंबे समय के बाद अब लोग यह समझने लगे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ फौज, पुलिस या खुफिया एजेंसियों का काम नहीं है।

यह पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब देश का हर नागरिक अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होता है, तभी राष्ट्रीय मनोबल ऊँचा होता है। यही सामूहिक शक्ति भारत को एक अभेद्य दीवार बनाती है।

सुरक्षा के क्षेत्र में कदम रख रहे नए पेशेवरों के लिए उन्होंने 'मानसिक शक्ति' को सबसे बड़ा हथियार बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ-साथ एक टीम की तरह काम करने की क्षमता ही आपको मैदान में टिकने की ताकत देती है। डोभाल ने चरित्र और अनुशासन पर विशेष जोर दिया। उनके अनुसार प्रतिबद्धता ही वह तीसरा सबसे जरूरी तत्व है जो किसी भी सुरक्षा पेशेवर को भीड़ से अलग करता है।

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अंत में अपनी मानद डॉक्टरेट की डिग्री स्वीकार करते हुए उन्होंने बेहद विनम्रता दिखाई। उन्होंने कहा कि वे इस सम्मान के लिए दिल से आभारी हैं। डोभाल का यह पूरा भाषण एक सबक की तरह था। यह सबक उन लोगों के लिए था जो सुरक्षा को सिर्फ सरकारी फाइलों और हथियारों का खेल समझते हैं।

उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा एक भावना है जो देश के हर घर और हर दिल से शुरू होनी चाहिए। जब सवा सौ करोड़ लोग एक इच्छाशक्ति के साथ खड़े होते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत उस देश का मनोबल नहीं तोड़ सकती। आज का भारत इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है जहाँ सुरक्षा एक जन-आंदोलन बन चुकी है।