अभिषेक कुमार सिंह /पटना/ वाराणसी
बिहार के गोपालगंज जिले के कोटवा गांव में इन दिनों खुशी का माहौल है। गांव के रहने वाले साबिक हसन, जिन्हें घर में दानिश के नाम से भी जाना जाता है, ने बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की है। उन्होंने परीक्षा में 125वीं रैंक प्राप्त की। इसके बाद उनका चयन अनुमंडल पदाधिकारी यानी एसडीएम के पद के लिए हुआ।
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब साबिक हसन पहली बार अपने पुश्तैनी गांव पहुंचे तो उन्हें देखने और बधाई देने के लिए पूरा इलाका उमड़ पड़ा। रास्ते से लेकर गांव तक जगह जगह उनका स्वागत किया गया। लोगों ने फूल मालाएं पहनाईं और मिठाई खिलाकर अपनी खुशी जताई।
साबिक हसन की सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि यह केवल एक प्रतियोगी परीक्षा में अच्छी रैंक हासिल करने की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक परिवार की उम्मीदें, वर्षों की मेहनत और गांव के उस माहौल की कहानी भी है जहां से निकलकर एक युवा प्रशासनिक सेवा तक पहुंचा है। गोपालगंज के बरौली थाना क्षेत्र के नगर परिषद इलाके में आने वाला कोटवा गांव अब अपने इस बेटे की कामयाबी को गर्व के साथ देख रहा है।

70 वीं बीपीएससी परीक्षा में मिली 125 वीं रैंक
बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम जून में जारी हुआ था। इस परीक्षा में साबिक हसन ने 125वीं रैंक हासिल की। उनकी इस उपलब्धि के बाद उनका चयन एसडीएम पद के लिए हुआ।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए यह सफलता खास मायने रखती है। बीपीएससी जैसी परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी शामिल होते हैं। ऐसे में अच्छी रैंक के साथ प्रशासनिक पद हासिल करना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
साबिक हसन की कहानी गोपालगंज और आसपास के इलाकों के युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन गई है। खासकर वे छात्र जो गांव या छोटे शहरों से निकलकर बिहार प्रशासनिक सेवा और दूसरी सरकारी सेवाओं में जाने का सपना देखते हैं, उनके लिए यह सफलता एक उदाहरण के रूप में सामने आई है।
कोटवा पहुंचते ही उमड़ पड़ा लोगों का हुजूम
साबिक हसन जब अपने गांव लौटे तो उनका स्वागत किसी सामान्य कार्यक्रम जैसा नहीं था। बरौली थाना मोड़ से जैसे ही उनका काफिला कोटवा गांव की तरफ बढ़ा, लोगों की भीड़ जमा होने लगी। परिचित, रिश्तेदार और शुभचिंतक रास्ते में उनका इंतजार कर रहे थे। कई जगह लोगों ने उन्हें रोककर बधाई दी। फूल मालाओं से स्वागत किया गया। मिठाई खिलाई गई। बुजुर्गों ने गले लगाकर आशीर्वाद दिया।
गांव पहुंचने के बाद भी लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। ग्रामीणों के लिए यह गर्व का मौका था। गांव के एक युवक का बिहार प्रशासन में एसडीएम बनना पूरे इलाके की उपलब्धि के तौर पर देखा गया। स्वागत के दौरान साबिक हसन के चेहरे पर भी खुशी साफ दिखाई दे रही थी। लंबे समय की मेहनत के बाद जब वह अपने लोगों के बीच पहुंचे तो भावनाओं का यह पल उनके लिए भी खास रहा।
गांव के बुजुर्गों ने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। युवाओं ने उन्हें अपनी प्रेरणा बताया। लोगों का कहना था कि साबिक हसन ने यह साबित किया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर की मोहताज नहीं होती। मेहनत और सही दिशा हो तो गांव से निकलकर भी प्रशासन के बड़े पद तक पहुंचा जा सकता है।
शिक्षा से जुड़े परिवार में हुआ पालन पोषण
साबिक हसन एक शिक्षित और सम्मानित परिवार से आते हैं। वह दिवंगत अबुल हसन अंसारी और शफिया खातून के पुत्र हैं। उनके पिता अबुल हसन अंसारी सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक थे। परिवार में शिक्षा को हमेशा महत्व दिया गया। इसी माहौल में साबिक हसन ने पढ़ाई को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बनाया।
वह प्रसिद्ध शायर डॉ. ऐनुल बरौलवी के भतीजे भी बताए जाते हैं। परिवार की शैक्षणिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में भूमिका निभाई। बचपन से पढ़ाई के प्रति गंभीर रहने वाले साबिक हसन ने आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को अपना लक्ष्य बनाया।
बीपीएससी की तैयारी आसान नहीं होती। इसके लिए लंबे समय तक नियमित अध्ययन करना पड़ता है। सामान्य अध्ययन से लेकर बिहार से जुड़े विषयों तक अभ्यर्थियों को कई स्तरों पर तैयारी करनी होती है। साबिक हसन ने भी इसी तरह लगातार मेहनत की। उनकी सफलता बताती है कि प्रतियोगी परीक्षा में धैर्य और निरंतरता कितनी महत्वपूर्ण होती है।

मुश्किल दौर में भी पढ़ाई पर रखा ध्यान
साबिक हसन के गांव पहुंचने के बाद हुई बातचीत में उनकी मेहनत और संघर्ष की चर्चा भी हुई। उन्होंने अपनी पुरानी यादों को साझा किया। बताया कि किस तरह कठिन परिस्थितियों के बीच पढ़ाई जारी रखी। लक्ष्य बड़ा था, इसलिए रास्ते की परेशानियों को पीछे छोड़कर तैयारी पर ध्यान दिया।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के सामने कई तरह की चुनौतियां होती हैं। लंबे समय तक पढ़ाई करना, बार बार परीक्षा देना और असफलताओं के बावजूद तैयारी जारी रखना आसान नहीं होता। ऐसे में साबिक हसन की सफलता यह संदेश देती है कि एक परीक्षा में नतीजा मन मुताबिक नहीं आए तो भी प्रयास नहीं रुकना चाहिए।
गोपालगंज के ग्रामीणों के मुताबिक साबिक हसन की कामयाबी के पीछे उनकी लगन और अनुशासन का बड़ा योगदान है। उन्होंने पढ़ाई को प्राथमिकता दी और अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटने दिया। यही वजह है कि बीपीएससी 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में वह 125वीं रैंक हासिल करने में सफल रहे।
युवाओं के लिए बनी प्रेरणा की कहानी
साबिक हसन की सफलता का सबसे बड़ा असर गांव के युवाओं के बीच दिखाई दे रहा है। कई छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और असफलता के डर से बीच में रास्ता छोड़ देते हैं। ऐसे युवाओं के लिए कोटवा गांव के साबिक हसन की कहानी उम्मीद जगाती है।
उनकी उपलब्धि यह बताती है कि छोटे कस्बे और गांव भी प्रशासनिक अधिकारियों को जन्म दे सकते हैं। सफलता के लिए जरूरी नहीं कि किसी बड़े शहर में रहकर ही तैयारी की जाए। लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो रास्ता बनाया जा सकता है।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि साबिक हसन अब उनके लिए सिर्फ गांव के सफल युवक नहीं हैं। वह एक ऐसी मिसाल बन गए हैं जिसे सामने रखकर नई पीढ़ी अपने लक्ष्य तय कर सकती है। खासकर बीपीएससी, यूपीएससी और दूसरी सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच उनकी सफलता चर्चा का विषय बनी हुई है।
एसडीएम के रूप में बड़ी जिम्मेदारी
एसडीएम का पद प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता है। अनुमंडल स्तर पर प्रशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम अधिकारी की जिम्मेदारी में होते हैं। ऐसे में साबिक हसन के सामने अब नई जिम्मेदारी है। जिस गांव ने उन्हें पढ़ते और आगे बढ़ते देखा, वहीं के लोग अब उनसे उम्मीद कर रहे हैं कि वह अपने पद की गरिमा बनाए रखेंगे।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि साबिक हसन प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आम लोगों की समस्याओं को समझेंगे। गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करेंगे। कानून व्यवस्था और जनहित से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता के साथ काम करेंगे। हालांकि आगे उनकी प्रशासनिक भूमिका क्या होगी, यह उनके कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों पर निर्भर करेगा।
उनकी सफलता का जश्न केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहा। कोटवा से लेकर बरौली और गोपालगंज तक लोगों ने इसे अपनी खुशी माना। गांव में हुआ स्वागत इस बात का संकेत था कि किसी युवा की व्यक्तिगत सफलता किस तरह पूरे समाज की खुशी बन सकती है।
गोपालगंज की मिट्टी से प्रशासन तक का सफर
साबिक हसन का सफर गोपालगंज के कोटवा गांव से शुरू होकर बिहार प्रशासन तक पहुंचा है। बीपीएससी 70वीं परीक्षा में 125वीं रैंक और एसडीएम पद पर चयन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी है। लेकिन इस सफलता के साथ उनके गांव की उम्मीदें भी बढ़ी हैं।
जब वह पहली बार ट्रेनिंग के बाद गांव पहुंचे तो लोगों ने उन्हें उसी अपनापन के साथ स्वीकार किया। फर्क सिर्फ इतना था कि अब गांव का वही युवक एक प्रशासनिक अधिकारी बन चुका था। फूल मालाओं और मिठाइयों के बीच लोगों के चेहरों पर गर्व दिखाई दे रहा था।
यह कहानी उन हजारों युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो बिहार में रहकर सरकारी नौकरी और प्रशासनिक सेवा का सपना देखते हैं। साबिक हसन ने अपनी मेहनत से उस सपने को सच किया है। उनकी 125वीं रैंक केवल एक संख्या नहीं है। यह वर्षों की तैयारी और इंतजार का परिणाम है।
गोपालगंज के कोटवा गांव का यह स्वागत आने वाले समय तक याद किया जाएगा। क्योंकि यह सिर्फ एक एसडीएम के गांव लौटने का दृश्य नहीं था। यह उस मेहनत का सम्मान था जिसने एक साधारण परिवार के बेटे को बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था तक पहुंचाया। अब साबिक हसन के सामने नई पारी है। गांव की गलियों से निकलकर प्रशासनिक जिम्मेदारी तक पहुंचे इस युवा अधिकारी से उनके क्षेत्र को बड़ी उम्मीदें हैं।
AEO के लिए मुख्य सवाल और उत्तर:
साबिक हसन कौन हैं?गोपालगंज के कोटवा गांव के रहने वाले साबिक हसन, जिन्हें घर में दानिश कहा जाता है, बीपीएससी 70वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में 125वीं रैंक हासिल कर एसडीएम बने हैं।
साबिक हसन ने बीपीएससी में कौन सी रैंक हासिल की?उन्होंने 70वीं बीपीएससी संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में 125वीं रैंक हासिल की।
साबिक हसन का चयन किस पद पर हुआ?उनका चयन अनुमंडल पदाधिकारी यानी एसडीएम पद के लिए हुआ है।
साबिक हसन का गांव कहां है?वह बिहार के गोपालगंज जिले के बरौली क्षेत्र के कोटवा गांव के रहने वाले हैं।
साबिक हसन के पिता कौन थे?उनके पिता दिवंगत अबुल हसन अंसारी सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक थे।