BRICS में भारत की बड़ी कामयाबी, दुनिया ने देखा दम

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 14-09-2026
India's major success at BRICS; the world witnessed its strength.
India's major success at BRICS; the world witnessed its strength.

 

राजीव नारायण

ब्रिक्स की मेजबानी करना भारत की वास्तविक उपलब्धि केवल यह नहीं है कि उसने एक प्रभावशाली सम्मेलन आयोजित किया। असली उपलब्धि यह है कि भारत ने दुनिया को यह दिखाया कि वह ऐसे देशों को एक साथ ला सकता है, जिनके बीच गहरे मतभेद हैं। वह खुद किसी एक खेमे का हिस्सा बने बिना ऐसा कर सकता है और साथ ही अपने हितों को भी महत्व दे सकता है। अपने आप में यह एक बड़ी उपलब्धि है।

नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के लिए आए मेहमानों की सूची भी अपने आप में काफी कुछ कहती है। चीन, रूस, ईरान, खाड़ी देश, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अन्य देश उस समय एक ही मेज पर बैठे, जब दुनिया पहले की तुलना में कम सहयोगी, अधिक बंटी हुई और कहीं ज्यादा अनिश्चित होती जा रही है। भारत के लिए केवल इतना ही तथ्य कूटनीतिक दिखावे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने यह दिखाया है कि भारत एक साथ कई रणनीतिक मोर्चों पर काम करने की क्षमता रखता है। भारत अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी मजबूत कर सकता है और क्वाड का हिस्सा बना रह सकता है।

वह रूस के साथ सहयोग कर सकता है। चीन के साथ बातचीत कर सकता है। ईरान और खाड़ी देशों के साथ संबंध बनाए रख सकता है। साथ ही ग्लोबल साउथ की चिंताओं को खुलकर सामने रख सकता है।

यह सब वह इस तरह कर सकता है कि इनमें से किसी एक रिश्ते को दूसरे रिश्ते का विकल्प न बनाए। इसे किसी एक पक्ष के बीच संतुलन साधने की मजबूरी नहीं कहा जा सकता। यह रणनीतिक स्वायत्तता का ऐसा रूप है, जो ऐसी दुनिया के लिए तैयार है जहां अब केवल दो खेमे नहीं हैं।

इस सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक उपलब्धि भी रही। विस्तारित ब्रिक्स समूह अपनी असाधारण विविधता और सदस्य देशों के बीच मौजूद मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा जारी करने में सफल रहा। भारत केवल मेज पर मौजूद नहीं था। वह मेज तैयार करने की भूमिका में था।

चीन से मिला लाभ

शायद यह बात सबसे ज्यादा शी जिनपिंग की मौजूदगी में दिखाई दी। चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा महत्वपूर्ण थी। वर्ष 2019 के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा थी। हालांकि नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात को दोनों देशों के बीच संबंधों का पूरी तरह नया दौर कहना जल्दबाजी होगी।

सीमा विवाद अभी भी सुलझा नहीं है। रणनीतिक अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दोनों देश पूरे एशिया में प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा भी कर रहे हैं।लेकिन कूटनीति हमेशा किसी बड़ी सफलता के साथ शुरू नहीं होती। कई बार इसकी शुरुआत केवल बातचीत बहाल होने से होती है।

ब्रिक्स ने भारत और चीन को बातचीत के लिए वह जगह उपलब्ध कराई। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति, व्यापार असंतुलन, कारोबारी संबंधों और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर चर्चा की।

भारत के लिए ये मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। चीन के साथ मुश्किल रिश्ते को केवल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, हर मतभेद को पूरे रिश्ते पर हावी होने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती।

ब्रिक्स का महत्व यह नहीं है कि वह भारत और चीन को दोस्त बना देगा। उसका महत्व यह है कि उसने दोनों देशों को एक ऐसा संस्थागत माध्यम दिया है, जिसके जरिए प्रतिस्पर्धा को संभाला जा सकता है और दुश्मनी को रिश्तों की सामान्य स्थिति बनने से रोका जा सकता है।यह भारत के लिए एक उपयोगी लाभ है। निश्चित रूप से।
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घोषणाओं से आगे

ब्रिक्स से मिलने वाला दूसरा लाभ ज्यादा ठोस है। हालांकि इसे वास्तविक रूप लेने में अधिक समय लगेगा।आर्थिक चर्चाओं में साझा ब्रिक्स मुद्रा की चर्चा से हटकर कुछ ज्यादा व्यावहारिक मुद्दों पर जोर दिया गया। इनमें सीमा पार भुगतान को आसान बनाना, अलग अलग भुगतान प्रणालियों के बीच तालमेल की संभावनाएं तलाशना और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तथा निवेश को बढ़ावा देना शामिल है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक को स्थानीय मुद्रा में वित्त पोषण बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। ब्रिक्स ने निवेश और जोखिम प्रबंधन से जुड़े तंत्र पर भी काम आगे बढ़ाया है।

इनमें से कोई भी पहल रातों रात वैश्विक वित्त व्यवस्था को नहीं बदलने वाली है। इसी तरह ब्रिक्स की हर नई पहल को ऐसा संस्थान मानना भी सही नहीं होगा, जो कल सुबह से ही अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने लगेगा।

लेकिन वैकल्पिक व्यवस्थाएं इसी तरह बनती हैं। बड़े और नाटकीय ऐलानों से नहीं, बल्कि उस बुनियादी व्यवस्था को धीरे धीरे तैयार करने से, जो पूरी प्रणाली को चलाती है।

भारत की इसमें स्पष्ट रुचि है। अगर दुनिया में भुगतान के ज्यादा विविध विकल्प हों, आपूर्ति श्रृंखलाएं मजबूत और लचीली हों, निवेश के रास्ते व्यापक हों और महत्वपूर्ण तकनीकों पर सहयोग बढ़े, तो भारत के पास आगे बढ़ने के लिए ज्यादा विकल्प होंगे।

भारत के पास इस क्षेत्र में दुनिया को देने के लिए कुछ खास भी है। यह डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान और बड़े पैमाने पर तकनीक के इस्तेमाल का अपना अनुभव साझा कर सकता है।

शिखर सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संचालन और नियमन, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे तथा औद्योगिक सहयोग पर जोर दिया गया। इससे भारत के सामने एक और अवसर पैदा हुआ है।

भारत ऐसे मॉडल की वकालत कर सकता है, जो न तो पूरी तरह निजी क्षेत्र और बाजार आधारित अमेरिकी मॉडल हो और न ही पूरी तरह राज्य केंद्रित चीनी मॉडल। दोनों के बीच मौजूद यह जगह भविष्य में रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।

ग्लोबल साउथ

ब्रिक्स से भारत को एक कूटनीतिक लाभ भी मिला है।पिछले कई वर्षों से ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भाषा का लगभग केंद्रीय हिस्सा बन गया है। इसका इस्तेमाल अक्सर किया जाता है।

कभी कभी इसकी बात सुनी भी जाती है। लेकिन बहुत कम ऐसा होता है कि ग्लोबल साउथ को अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय करने में वास्तविक भूमिका मिले।भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ने इस शब्द को अधिक वास्तविक अर्थ देने का अवसर दिया है। और यह अर्थ काफी व्यापक हो सकता है।

ब्रिक्स के विस्तार से भारत को बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और ऊर्जा उत्पादक देशों तक पहुंच मिली है। लेकिन इसका महत्व केवल 11 सदस्य देशों तक सीमित नहीं है।ब्रिक्स अब ऐसा मंच बन रहा है, जिसके जरिए विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं उन संस्थानों में अपनी आवाज मजबूत कर सकती हैं, जिनकी मौजूदा संरचना काफी हद तक एक अलग दौर में तैयार की गई थी।

भारत इस तर्क को मजबूती से सामने रख सकता है। इसकी एक वजह यह भी है कि भारत पश्चिम का विरोधी बनकर यह बात नहीं कह रहा है।यह अंतर महत्वपूर्ण है।भारत संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग कर सकता है, लेकिन वह मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने की मांग नहीं कर रहा।

भारत एकतरफा प्रतिबंधों और संरक्षणवाद पर आपत्ति जता सकता है। इसके बावजूद वह पश्चिमी निवेश और तकनीक हासिल करने की कोशिश जारी रख सकता है।भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अधिक भूमिका की मांग कर सकता है। साथ ही दुनिया की स्थापित शक्तियों के साथ अपनी साझेदारी भी बनाए रख सकता है।

इसी वजह से भारत की आवाज ज्यादा उपयोगी हो सकती है। यह आवाज केवल तेज या वैचारिक होने के बजाय व्यावहारिक है।

असली परीक्षा

दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यही है।भारत को ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी समूह बनाने की जरूरत नहीं है। वास्तव में अगर ब्रिक्स ऐसा समूह बन गया, तो इससे भारत का अपना रणनीतिक लाभ कम हो सकता है।

भारत का हित ऐसे ब्रिक्स में है, जो व्यावहारिक हो, वैचारिक नहीं। प्रभावशाली हो, टकराव पैदा करने वाला नहीं। ऐसा ब्रिक्स जो ग्लोबल साउथ को मजबूत आवाज दे सके, लेकिन खुद एक और भू राजनीतिक खेमे में तब्दील न हो जाए।इसी वजह से अगला चरण दिल्ली में खिंची तस्वीरों से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

अब भारत के सामने कूटनीतिक पूंजी को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने की चुनौती है। उसे निवेश आकर्षित करना होगा। तकनीकी साझेदारियां बढ़ानी होंगी। आपूर्ति श्रृंखला के अवसर पैदा करने होंगे। ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी। साथ ही विस्तारित ब्रिक्स समूह के साथ आर्थिक संपर्क को भी बढ़ाना होगा।

भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भुगतान, वित्त, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उद्योग और विकास से जुड़ी पहल का वास्तविक फायदा कारोबारियों और आम नागरिकों तक पहुंचे।

शिखर सम्मेलन की मेजबानी करना आसान हिस्सा था। असली चुनौती यह होगी कि भारत ब्रिक्स को अपने लिए उपयोगी बनाए, लेकिन ब्रिक्स को अपनी पहचान और नीतियों को परिभाषित करने की अनुमति न दे।यही नई दिल्ली से मिलने वाला वास्तविक लाभ है।

भारत को किसी एक प्रतिस्पर्धी दुनिया का चुनाव करने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय उसे इतना प्रभाव और वजन हासिल करना है कि वह सभी के साथ काम कर सके।
और कभी कभी ऐसी स्थिति भी पैदा कर सके, जिसमें ये देश एक दूसरे के साथ भी काम करने के लिए तैयार हों।

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