नागपुर में डीजे पर उलेमा का फतवा, त्योहारों में शोर पर बहस तेज

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 12-09-2026
Ulema's fatwa against DJs in Nagpur; debate intensifies over noise during festivals.
Ulema's fatwa against DJs in Nagpur; debate intensifies over noise during festivals.

 

आवाज द वाॅयस/नागपुर।

त्योहारों में डीजे और तेज आवाज को लेकर महाराष्ट्र में बहस एक बार फिर तेज हो गई है। ईद मिलाद उन नबी, उर्स, संदल और दूसरे धार्मिक जुलूसों में डीजे के इस्तेमाल को लेकर नागपुर के कुछ इस्लामी विद्वानों ने सख्त रुख अपनाया है। धार्मिक विद्वानों की ओर से डीजे के इस्तेमाल के खिलाफ फतवा जारी किए जाने के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है। इस पहल को मुस्लिम समाज के भीतर ध्वनि प्रदूषण और धार्मिक आयोजनों में अनुशासन से जोड़कर देखा जा रहा है।

मामला ऐसे समय सामने आया है जब महाराष्ट्र में अलग अलग त्योहारों के दौरान तेज आवाज वाले डीजे, साउंड सिस्टम और लेजर लाइट को लेकर लोगों की शिकायतें सामने आती रही हैं। ईद हो, दही हांडी हो या गणेश उत्सव, बड़े साउंड सिस्टम का इस्तेमाल अब कई सार्वजनिक आयोजनों का हिस्सा बन चुका है। लेकिन तेज आवाज से होने वाली परेशानी को लेकर बुजुर्गों, बच्चों और स्थानीय लोगों की चिंताएं भी सामने आती हैं। इसी पृष्ठभूमि में नागपुर के मुस्लिम धार्मिक विद्वानों का डीजे विरोधी रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह मामला केवल किसी एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि धार्मिक उत्सव किस तरह मनाए जाएं ताकि खुशी और आस्था के साथ आसपास रहने वाले लोगों की सुविधा का भी ध्यान रखा जा सके। नागपुर में सामने आया फतवा इसी सोच पर जोर देता है। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे लोगों को परेशानी हो या उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़े।

ईद मिलाद और उर्स में डीजे पर सवाल

पिछले कुछ वर्षों में ईद मिलाद उन नबी के जुलूसों और दरगाहों पर होने वाले संदल कार्यक्रमों में डीजे के इस्तेमाल को लेकर चर्चा बढ़ी है। कई लोगों का कहना है कि धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़ता शोर मूल उद्देश्य से ध्यान हटा देता है। इसी तरह तेज संगीत और बड़े साउंड सिस्टम को लेकर स्थानीय स्तर पर भी आपत्तियां सामने आती रही हैं।

नागपुर के अल जामियात उल रज़वी दारुल उलूम अमजदिया मदरसा के प्रमुख मुफ्ती मुजतबा शरीफ खान अशारी मिस्बाही ने डीजे के इस्तेमाल के खिलाफ फतवा जारी किया है। फतवे में इस बात पर जोर दिया गया है कि इस्लाम में किसी दूसरे व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने या उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले काम से बचने की शिक्षा दी गई है।

इस रुख के बाद मुस्लिम समाज में भी चर्चा शुरू हुई है। कई लोगों का मानना है कि धार्मिक आयोजनों को सादगी और अनुशासन के साथ आयोजित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जुलूस या उर्स किसी दूसरे व्यक्ति के लिए परेशानी का कारण नहीं बनना चाहिए।

मौलाना अतीकुर रहमान ने भी रखा पक्ष

कुलमुना स्थित शरिया संस्थान के संस्थापक मौलाना अतीकुर रहमान सिद्दीकी ने भी डीजे के इस्तेमाल को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में डीजे के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने युवाओं से धार्मिक विद्वानों के मार्गदर्शन के अनुसार काम करने की अपील की।

उनका कहना है कि धार्मिक आयोजनों में शामिल युवाओं को उत्साह के साथ जिम्मेदारी का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि किसी आयोजन से दूसरे लोगों को परेशानी होती है तो उस पर विचार किया जाना चाहिए। इस मुद्दे को केवल धार्मिक नियमों तक सीमित करने के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी के नजरिए से भी देखने की जरूरत है।

नागपुर में ईद मिलाद उन नबी के जुलूसों का आयोजन करने वाली सीरत उन नबी समिति से जुड़े शेख तैयब रिजवी ने भी समिति की स्थिति स्पष्ट की है। उनके अनुसार जुलूस से पहले संस्था की ओर से नियम और दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि डीजे बजाने वाले समूहों से समिति का कोई संबंध नहीं है। ऐसे किसी उपद्रव की जिम्मेदारी भी समिति नहीं लेती।

राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का समर्थन

इस फैसले को नागपुर के हजरत बाबा ताजुद्दीन ट्रस्ट के अध्यक्ष और राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान का भी समर्थन मिला है। उन्होंने धार्मिक आयोजनों में डीजे नहीं लाने की अपील की है।

प्यारे खान ने ताजुद्दीन बाबा के उर्स और संदल में आने वाले श्रद्धालुओं से कहा है कि वे डीजे से बचें। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन आयोजनों में डीजे की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने लोगों से कानून और प्रशासन का सम्मान करने की अपील भी की।

प्यारे खान ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से ध्वनि प्रदूषण को लेकर जताई गई चिंता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कानून का सम्मान किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक धार्मिक आयोजन हों या सार्वजनिक कार्यक्रम, नियम सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सभी धर्मों पर समान नियम की मांग

इस मुद्दे पर प्यारे खान ने एक व्यापक बात भी कही है। उन्होंने महाराष्ट्र के सभी धार्मिक स्थलों से अपील की कि संदल या अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में डीजे की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि किसी भी कानून को धर्म या जाति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार यदि ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं तो उन्हें सभी धर्मों और सभी समुदायों पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। इससे किसी भी तरह के भेदभाव की धारणा पैदा नहीं होगी और प्रशासन के लिए भी नियमों को लागू करना आसान होगा।

यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र में धार्मिक आयोजनों के दौरान ध्वनि प्रदूषण का सवाल केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है। अलग अलग त्योहारों में तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में नागपुर से उठी यह मांग व्यापक सामाजिक बहस का हिस्सा बन सकती है।

लाउडस्पीकर को लेकर पहले भी बने नियम

प्यारे खान ने याद दिलाया कि सरकार पहले मस्जिदों, मंदिरों, चर्च और गुरुद्वारों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर नियम बना चुकी है। उनके मुताबिक धार्मिक संस्थानों ने इन नियमों का पालन किया है और इससे विवाद की स्थिति कम हुई है।

उनका कहना है कि इसी तरह डीजे को लेकर भी स्पष्ट दिशा निर्देश होने चाहिए। इससे धार्मिक आयोजनों के दौरान प्रशासन और आयोजकों के बीच भ्रम की स्थिति नहीं रहेगी। लोगों को पहले से पता होगा कि किन नियमों का पालन करना है।

महाराष्ट्र में त्योहारों के दौरान ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने की मांग समय समय पर उठती रही है। तेज आवाज का असर केवल कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं रहता। आसपास के घरों और दुकानों तक भी इसका प्रभाव पहुंचता है। इसी वजह से कई लोग धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में आवाज की सीमा और समय का पालन करने की मांग करते हैं।

फतवे से आगे सामाजिक जिम्मेदारी की चर्चा

नागपुर के उलेमा की ओर से जारी डीजे विरोधी फतवे को केवल धार्मिक निर्देश के तौर पर देखने के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इसका मूल संदेश यह है कि धार्मिक खुशी मनाते समय दूसरों की सुविधा और अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

धार्मिक जुलूस और त्योहार समाज को जोड़ने का अवसर होते हैं। लेकिन यदि तेज आवाज, यातायात में बाधा या अन्य कारणों से स्थानीय लोगों को परेशानी होने लगे तो विवाद की स्थिति बन सकती है। इसलिए आयोजकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे कार्यक्रम को व्यवस्थित तरीके से संचालित करें।

मुस्लिम धार्मिक संस्थानों की ओर से ईद मिलाद उन नबी और दूसरे आयोजनों से पहले डीजे नहीं बजाने की अपील पहले भी की जाती रही है। इस बार नागपुर से आया संदेश इसलिए अधिक चर्चा में है क्योंकि इसमें धार्मिक विद्वानों के साथ सामाजिक और प्रशासनिक स्तर के लोगों की आवाज भी जुड़ती दिखाई दे रही है।

नागपुर का संदेश महाराष्ट्र तक पहुंचने की उम्मीद

नागपुर में डीजे को लेकर उलेमा का रुख अब महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में भी चर्चा का विषय बन सकता है। धार्मिक आयोजनों में ध्वनि प्रदूषण को लेकर यदि अलग अलग समुदायों के संगठन अपने स्तर पर नियमों का पालन करने की पहल करते हैं तो प्रशासनिक दबाव भी कम हो सकता है।

हालांकि धार्मिक संस्थाओं की अपील और सरकारी कानून दो अलग बातें हैं। फतवा धार्मिक मार्गदर्शन से जुड़ा है, जबकि ध्वनि प्रदूषण से संबंधित नियम कानूनी व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए किसी भी आयोजन में दोनों पहलुओं को समझना जरूरी है।

नागपुर में सामने आई इस पहल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि त्योहार और धार्मिक आयोजन खुशी, आस्था और भाईचारे के लिए होते हैं। उनका उद्देश्य किसी दूसरे व्यक्ति को परेशान करना नहीं है। यदि धार्मिक संस्थाएं, आयोजक, श्रद्धालु और प्रशासन मिलकर इस सोच को आगे बढ़ाते हैं तो त्योहारों के दौरान ध्वनि प्रदूषण और अनावश्यक विवाद दोनों को कम किया जा सकता है।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में धार्मिक संस्थाएं डीजे और तेज आवाज को लेकर क्या रुख अपनाती हैं। फिलहाल नागपुर के उलेमा का डीजे विरोधी फतवा और राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान की अपील ने धार्मिक आयोजनों में ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है।

AEO के लिए सीधे सवाल और जवाब

नागपुर के उलेमा ने डीजे के खिलाफ फतवा क्यों जारी किया?
फतवे में इस बात पर जोर दिया गया है कि ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे लोगों को परेशानी हो या उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़े।

डीजे को लेकर किन धार्मिक आयोजनों का जिक्र हुआ है?
ईद मिलाद उन नबी के जुलूस, दरगाहों के उर्स और संदल जैसे आयोजनों का जिक्र किया गया है।

प्यारे खान ने डीजे को लेकर क्या अपील की?
उन्होंने ताजुद्दीन बाबा के उर्स और संदल में आने वाले श्रद्धालुओं से डीजे नहीं लाने की अपील की और कानून का सम्मान करने को कहा।

क्या डीजे विरोधी नियम केवल मुस्लिम आयोजनों के लिए हैं?
प्यारे खान ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनों को धर्म या जाति से जोड़ने के बजाय सभी धर्मों पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

नागपुर का डीजे विरोधी संदेश क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह धार्मिक आयोजन, ध्वनि प्रदूषण, सामाजिक जिम्मेदारी और कानून के पालन को एक साथ जोड़कर देखता है।