प्रिय पाठकों
हमें अपनी नई श्रृंखला ‘मीज़ान - एक नई मुस्लिम सोच की ओर’ (Mizan- Towards a New Muslim Imagination) के शुभारंभ की घोषणा करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। इस श्रृंखला का मुख्य उद्देश्य हमारे समय के कुछ सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना है।
भारत की विकास यात्रा में मुसलमान पीछे क्यों छूट गए? जब भी हम यह सवाल पूछते हैं, तो हमारा झुकाव अक्सर देश की राजनीति या शासन व्यवस्था को दोष देने की ओर होता है। यह सच है कि बीते दशकों में बदलते राजनीतिक हालातों के कारण मुसलमानों ने खुद को हाशिए पर महसूस किया है। लेकिन यह पूरी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है।
यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही समुदाय की स्थिति सुधारने की एकमात्र दवा होता, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों की हालत आज कहीं बेहतर होती। लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है। सच्चाई यह है कि समुदाय की वर्तमान चुनौतियाँ उसके अपने भीतर से पैदा हुई हैं।
भारतीय मुसलमानों की दयनीय स्थिति का बड़ा कारण तेजी से बदलते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालातों के साथ कदम से कदम मिलाकर न चल पाना है। भारतीय मुसलमानों में हमेशा से एक ऐसे सकारात्मक और रचनात्मक संवाद की कमी रही है, जो उन्हें तरक्की के रास्ते पर आगे ले जा सकता था। शायद अब समय आ गया है कि उन्हें एक नए और विचारशील दृष्टिकोण की जरूरत है।
मुसलमानों ने वैज्ञानिकों, उद्यमियों, न्यायविदों, कलाकारों, सिविल सेवकों, विद्वानों और सैनिकों के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, लेकिन देश की कुल आबादी और बड़े परिदृश्य को देखें तो ये उपलब्धियाँ बहुत छोटी नजर आती हैं। मुसलमानों से जुड़ा सार्वजनिक विमर्श काफी हद तक डर, पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति से तय होता रहा है। शिक्षा, संस्थाओं के निर्माण और समुदाय के आर्थिक विकास जैसी बेहद जरूरी प्राथमिकताएं, राजनीतिक नारों और बयानबाजी की होड़ में पीछे छूट गई हैं।

भविष्य पर चर्चा करते दो मुसलमानः प्रतिकात्मक तस्वीर
इस चुनौती का जवाब खुद पर तरस खाना नहीं हो सकता; बल्कि इसके लिए ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करने और आगे बढ़ने के जुनून की आवश्यकता है।
अधिकांश भारतीय मुसलमानों के लिए मजहब केवल व्यक्तिगत पहचान ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक बोध को भी दिशा देता है। यह खूबी उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती थी, लेकिन आधुनिक समय की हकीकतों के हिसाब से इस्लामिक शिक्षाओं को समझ पाने में नाकाम रहने के कारण एक तरह का ठहराव आ गया है।
आस्था शाश्वत होती है, लेकिन कानून, नियम, रस्म-रिवाज़ और परंपराएं शाश्वत नहीं हैं। उन्हें समय की बदलती सच्चाइयों के साथ बदलना चाहिए। हमारी मजहबी समझ कुरान, सुन्नत और इस्लामिक विद्वानों की समृद्ध बौद्धिक परंपरा से सीधे जुड़ने के बजाय, मुख्य रूप से विरासत में मिली परंपराओं, संप्रदायवादी सोच और सांस्कृतिक प्रथाओं से तय होती रही है। पवित्र मजहबी ग्रंथों की तुलना में इंसानी माध्यम या संस्थाएं नेक इरादों को हासिल करने के लिए अधिक महत्वपूर्ण बन गई हैं।
इसी वजह से गलतफहमियां बनी रहीं, अंदरूनी मतभेद गहरे होते गए और कई मुसलमान खुद इस्लाम की अपनी विचारशील और जीवंत परंपरा से कट गए। इसके नतीजे आज साफ नजर आ रहे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति नाकाफी है, सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित किया जाता है और गुणवत्तापूर्ण संस्थानों का निर्माण नहीं हो पाया है। इन कमियों ने आर्थिक बदहाली को बढ़ाया है और साथी भारतीयों के बीच मुसलमानों के प्रति नकारात्मक धारणाओं को मजबूत किया है।
यह विरोधाभास बेहद चौंकाने वाला है। जिस समुदाय ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान और सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान दिया, वह आज अनिश्चितता, घटते सामाजिक आत्मविश्वास और व्यापक अविश्वास से जूझ रहा है।
बिखराव, कट्टर सोच, खुद को पीड़ित मानने की लगातार बनी रहने वाली भावना और एक साझे विकासवादी दृष्टिकोण के अभाव ने भारतीय मुसलमानों की प्रगति को रोक दिया है।
जब 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट जारी की गई थी, तो उसने भारतीय मुसलमानों के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन को उजागर किया था। रिपोर्ट ने सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया था। दुर्भाग्य से, इसे सामाजिक बदलाव का मार्गदर्शक (रोडमैप) मानने के बजाय, जल्द ही राजनीतिक खींचतान का विषय बना दिया गया।
लगभग दो दशक बाद भी, कई बुनियादी चुनौतियाँ ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। पहचान से जुड़ी बहसों ने शिक्षा, उद्यमिता, संस्थागत उत्कृष्टता और सामाजिक सुधारों जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को दबा दिया है।
भारतीय मुसलमान कोई एक समान (समरूप) समुदाय नहीं हैं। उनकी भाषाएं, जातीयता, संस्कृति और परंपराएं अलग-अलग हैं। इतने विविध समुदाय की हर चुनौती का समाधान किसी एक फार्मूले से नहीं हो सकता। फिर भी, इस विविधता के बावजूद, उनकी कई संरचनात्मक समस्याएं काफी हद तक एक जैसी हैं।
भारतीय लोकतंत्र विकसित हुआ है, राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं और इस नए परिदृश्य में मुसलमानों का चुनावी गणित अब आवश्यक संख्याओं के अनुकूल नहीं बैठता। इन बदलावों के लिए एक नए तालमेल और मुसलमानों की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है।
मिजान के एक कार्यक्रम की झलक .....
यह स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में मुस्लिम समुदाय का भविष्य राजनीतिक संरक्षण पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि यह शिक्षा, बौद्धिक आत्मविश्वास, आर्थिक मजबूती, संस्थागत क्षमता और देश के साथ सकारात्मक जुड़ाव पर कहीं अधिक निर्भर करेगा। यह बदलाव समुदाय के भीतर से ही आना होगा।
इसलिए, यह समय प्रगति की एक नई भाषा अपनाने का आह्वान करता है,एक ऐसी भाषा जो अतीत की पुरानी यादों (नॉस्टैल्जिया) की जगह ले, पीड़ित होने की भावना को आत्मविश्वास में बदले, दिखावे को संस्था-निर्माण में और टकराव को सार्थक भागीदारी में बदले।
इसी विश्वास के साथ 'आवाज़-द वॉयस' (Awaz-The Voice) द्वारा 'मीज़ान' नाम से एक प्रमुख संपादकीय पहल शुरू की जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में, 'आवाज़' की पत्रकारिता ने सचेत रूप से उन घिसे-पिटे दृष्टिकोणों से आगे बढ़ने का प्रयास किया है जिनके जरिए भारतीय मुसलमानों को देखा जाता रहा है। आज भी इस समुदाय की पहचान अक्सर टकराव और पहचान की राजनीति से जोड़ी जाती है। भारतीय मुसलमानों को इस छवि को बदलना होगा और ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देने के बजाय मुख्य रूप से अपने समुदाय के संस्था-निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
'आवाज़' में हमने एक ऐसा रास्ता चुना है जो शोध, साक्ष्यों, समावेशिता और बौद्धिक ईमानदारी पर आधारित है। हमारा उद्देश्य मतभेदों को गहरा करने के बजाय संवाद को बढ़ावा देना रहा है।
समुदाय के सामने चुनौती यह नहीं है कि वह इस्लाम और आधुनिकता में से किसी एक को चुने, बल्कि यह साबित करने की है कि कैसे इस्लाम के शाश्वत नैतिक सिद्धांत इक्कीसवीं सदी की जटिलताओं से निपटने में हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।
उतना ही महत्वपूर्ण हमारे साथी नागरिकों के साथ बेहतर जुड़ाव और संवाद है। आने वाला समय अलगाव के बजाय सहयोग, संदेह के बजाय बातचीत और समानांतर जीवन जीने के बजाय राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदारी की मांग करता है। भारत का बहुलवादी लोकतंत्र ऐसे अवसर प्रदान करता है जिन्हें केवल आत्मविश्वास, भागीदारी और आपसी विश्वास के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है।
इसी सोच के साथ, 'मीज़ान' श्रृंखला भारत और विदेश के प्रमुख विद्वानों, विचारकों, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों के लेखों, बातचीत और पॉडकास्ट को एक साथ लाती है, ताकि समुदाय के सामने मौजूद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर गहराई से विचार किया जा सके।
यह श्रृंखला कोई ऊपरी या सतही समाधान पेश नहीं करती और न ही राजनीतिक हवा के हिसाब से इस्लाम को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश करती है। इस्लाम अपनी नैतिक और आध्यात्मिक बुनियाद में पूर्ण है। इसे लगातार किसी नए बदलाव की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें इसकी शिक्षाओं की सही समझ और बदलती सामाजिक सच्चाइयों में उनके सही उपयोग की आवश्यकता है।
तालीम के रास्ते आगे की चिंता करती मुस्लिम बच्चियांः प्रतिकात्मक तस्वीर
अतीत में भी मुसलमानों ने कुरान के शाश्वत संदेश और पैगंबर मोहम्मद साहब के आदर्शों के प्रति वफादार रहते हुए, अपने समय के संदर्भ में इस्लामिक मार्गदर्शन की व्याख्या की है। हमारी पीढ़ी भी इसी तरह के विचारशील प्रयास की हकदार है और वास्तव में उसे इसकी आवश्यकता भी है।
'मीज़ान' के पीछे का विचार भारतीय मुसलमानों के उत्थान के लिए एक सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत शुरू करना है। यह एक निमंत्रण है: अधिक गहराई से सोचने का, उन पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाने का जो हमें सुस्त बनाती हैं, इस्लाम की नैतिक ऊर्जा को फिर से हासिल करने का और भारत के भविष्य को आकार देने में अपनी भूमिका निभाने का।
हजारों युवा मुसलमान विश्वविद्यालयों, स्टार्ट-अप्स, सिविल सेवाओं और विभिन्न पेशों में चुपचाप अपनी सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। उनकी उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि समुदाय के सामने आने वाली बाधाएं न तो स्थायी हैं और न ही ऐसी हैं जिन्हें पार न किया जा सके।
चूंकि भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, ऐसे में भारतीय मुसलमानों के पास इस राष्ट्रीय यात्रा में सक्रिय भागीदार बनने का अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। समुदाय को नेताओं की एक नई पीढ़ी की जरूरत है, न केवल राजनीति में, बल्कि शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञान, कानून, मीडिया, नागरिक समाज और धार्मिक विद्वता के क्षेत्र में भी।
भविष्य कोई ऐसी चीज नहीं है जो भारतीय मुसलमानों के साथ अपने आप घटित होगी। यह एक ऐसा मार्ग है जिसे बनाने में उन्हें खुद मदद करनी होगी।हम अपने पाठकों को आमंत्रित करते हैं कि वे हमारी इस सामग्री पर अपनी प्रतिक्रिया [email protected] पर अवश्य भेजें।

आतिर खान
प्रधान संपादक ,आवाज़ द वॉयस
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